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'जंगल है हमारी पहली पाठशाला' : पूनम विश्वकर्मा वासम की कविताएँ


पूनम विश्वकर्मा वासम की कविताओं में बस्तर की मिट्टी की सुगंध है। आदिवासी जीवन के विविध रंगों से भरी ये कविताएँ अपनी ताज़गी, टटके बिंबों और अलहदा विषयों की वजह से हमारा ध्यान खींचती हैं और स्मृति में बनी रहती हैं। ये कविताएँ जानती हैं कि बस्तर होने का मतलब क्या है, इंद्रावती नदी क्यों चुपके से रोती है और 'नम्बी जलप्रपात' की सबसे ऊंची चोटी से गिरते तेज पानी के धार का अनसुना संगीत हमसे क्या कहता है। हाशिए पर पड़े जीवन को कविता में बुनकर उस कठिन जीवन की चुनौतियाँ और समस्याएँ हमारी आँखों के आगे चित्रित करने में कवि सक्षम हुई हैं। 

 
पूनम की कविताएँ सागौन की तरह मज़बूती से साहित्य की मिट्टी में अपनी जड़ें जमा सके, इसी आशा के साथ प्रस्तुत है ये रचनाएँ जिनके सोंधेपन से गुजरना आपको भी निस्संदेह सुखद लगेगा

'जंगल है हमारी पहली पाठशाला'

माँ नही सिखाती उंगली पकड़कर चलना
सुलाती नही गोद में उठाकर लोरिया गाकर
चार माह के बाद भी दाल का पानी सेरेलेक्स ज़रूरी नही होता हमारे लिए

जॉन्सन बेबी तेल की मालिश और साबुन के बिना भी
हड्डियां मज़बूत होती है हमारी

हम नही सीखते माँ की पाठशाला में ऐसा कुछ भी
जो साबित कर सके कि हम गुजर रहे हैं
बेहतर इंसान बनने की प्रक्रिया से!

स्कूल भी नही सिखा पाता हमे 'अ से अनार' या 'आ से आम' के अलावा कोई दूसरा सबक

ऐसा नही है कि हममें सीखने की ललक नही, या हमे सीखना अच्छा नही लगता

हम सीखते है
हमारी पाठशाला में सबकुछ प्रयोगिक रूप में
'नम्बी जलप्रपात' की सबसे ऊंची चोटी से गिरती तेज पानी की धार
हमे सिखाती है संगीत की महीन धुन,
'चापड़ा' की चटपटी चटनी सिखाती है
विज्ञान के किसी एसिड अम्ल की परिभाषा!

अबूझमाड़ के जंगल सबकुछ खोकर भी
दे देते हैं अपनी जड़ों से जुड़े रहने के 'सुख का गुण-मंत्र'

तीर के आखरी छोर पर लगे खून के कुछ धब्बे सुनाते है 'ताड़-झोंकनी' के दर्दनाक क़िस्से!

बैलाडीला के पहाड़ संभाले हुए हैं
अपनी हथेलियों पर आदिम हो चुके संस्कारों की एक पोटली
धरोहर के नाम पर पुचकारना, सहेजना, संभालना और तन कर खड़े रहना
सीखते है हम बस्तर की इन ऊँची ऊंची पहाड़ियो से!

कुटुम्बसर की गुफा में,
हजारों साल से छुपकर बैठी अंधी मछलियों को देखकर 
जान पाएं हम गोंड आदिवासी अपने होने का गुण-रहस्य!

माँ जानती थी सब कुछ
किसी इतिहासवेत्ता की तरह

शायद इसलिए
माँ हो ही नही सकती थी हमारी पहली पाठशाला
जंगल के होते हुए!


जंगल समझता है हमारी जंगली भाषा माँ की तरह


पटेल पारा नैमेड़ के बच्चे

पटेल पारा नैमेड़ के
बच्चे जानते है
झुनकी ,पायकी, मनकी,
और सुकली के घर
खाने में क्या
पका है

कैसे बनता है
तालाब कि मछलियों का
स्वादिष्ट पुड़गा!
खूब खाना जानते है
ताड़ी झाड़ का कांदा !

पीते है सल्फ़ी का रस
नही डरते लांदा और हंड़िया
का नशा करने से
इन्हें पता है
महुये को सुखाकर
दारू बनाने और
बेचने की कला!

बोड़ा ,फुटू ,बास्ता और
छिंद खानें का लेते है
असली मज़ा
पटेल पारा नैमेड़ के बच्चे
बस्ते में भरकर नही लाते
कॉपी -क़िताब और पेन्सिल
बल्कि उठा लाते है
मध्यान्ह भोजन की थाली

क्योंकि मालूम है इन्हें
भूख की तड़प हल कर लिया है
इन्होंने छोटी सी उमर में
पेट की आग को
क्षुब्ध करने का सबब

पृथ्वी गोल हैं, क्या करना जानकर
कि खुश है ये तो बस,

रोटी की गोलाई नापकर



बस्तर होना


नही बचा रहेगा ऐसा कुछ भी
आने वाले समय में,
कि इतिहास बतायेगा बस्तर का सच
कि अभी जहाँ जिस मिट्टी पर
तुम्हारे महंगे जूतों की थाप है
वहाँ से लेकर उस रेतीली नदी के बीचो-बीच
खुदे हुयें हैं हजारों-हज़ार कुएँ
खोदोगें ग़र कुदाल उठाकर तो अब भी
रेतीली नदी के भीतर
उबलती खून की हांडियाँ मिलेगी!
यहाँ जहाँ खड़ी है आज तुम्हारी चमकती गाड़ी
वहीँ उसके पहिए के नीचे दफन है
एक दुल्हें की शेरवानी,
बहन की रेशमी राखी
माँ के हाथों की बनी गुदड़ी
और हाँ ग़र तौल सको तो तौल कर देखना
कई किलो सिंदूर की डिबिया भी होगी
एक सुनहरे बालों वाली मटमैली सी गुड़िया की कहानी भी
दम तोड़ चुकी होंगी
अरे हाँ, यहीँ नीचे तुम्हारें आलिशान बंगले के आस-पास
खूब सारी संवेदनाओ ने आत्महत्या कर ली थी
गुणा-भाग
और आंकड़ो का खेल भी गजब का था
तीस, चालीस, सौ, हजार
फिर पता नही कितने!
तुम्हें भी शायद ही याद हो.
वैसे भी खून का तिलक करने
और देश पर मरने वाले
इतिहास बन जाते हैं
और इतिहास आज के समय का सबसे
उबाऊ विषय है


बांस: जीवन का झुरमुट


१-

घर के बाड़े में उग आये बाँस के झुरमुट किसी पिता की तरह लगते है
जो बिना कुछ कहे उठा लेते हैं
अपने कंधों पर आधा बोझ

बाँस के झुरमुट जानते हैं
सूखे भात को गले से नीचे सरकने में कितना वक़्त लगता है
फिर भी शिकायत नही करते बाड़े के भीतर रहने वाले लोग
मोटी बेस्वाद हो चुकी जीभ भी कुछ नही कहती

गले की नली भी मोटे चावल के दानों को पहुँचा देती है
अंतड़ियों तक बिना कुछ कहें
इस आस पर कि
बाँस के झुरमुट से फूटेंगे नवांकुर
जो लगाएंगे अपनी कीमत हाट बाजारों में
उस एक दिन सुकसी झोर के साथ
भात का स्वाद दुगुना हो जायेगा

२-

बाँस के झुरमुट में
तगड़ी हस्त रेखाओं के सहारे
कोपलों को मुंह चिढ़ाती
निश्चितता के भ्रम में खोए मदमस्त
कुछ बाँस बढ़ते हैं तेजी से
अपने आस-पास के बाँसों को छोड़कर पीछे
पर परिपवक्त बाँस भी,
कहाँ दे पाते हैं धोखा उन ठेकेदारों को
जिन्हें पता है इनके गदरायें बदन की कीमत।

३-

बाँस के झुरमुट से ढूंढ़ ही लेती है मनकी
बेहद नाज़ुक उजला स्वादिष्ट बास्ता
टोकनी में भरते वक्त,
मनकी की आँखे कर आती है भविष्य का मुआयना
सम्भल जाती है मनकी
और भी सतर्कता से काम करने लगते हैं
उसके दोनों हाथ,
ऐसे जैसे टोकरी में बास्ता नही
कोई सुनहरा स्वप्न भर रही हो
आने वाली पीढ़ी के लिए,

कभी-कभी बाँस का यह झुरमुट मनकी को किसी कल्पवृक्ष की तरह लगने लगता है।

४-

झुरमुट में
ऊँचे खड़े कुछ बाँस मुस्कुराते हैं
कभी-कभी खिलखिलाकर हँस भी लेते है
कभी-कभी रोते भी हैं
अपनी जमीन से उखाड़े जाने का दर्द समझते है

बाड़े में उग आयें बाँस को पता है
कि अंतिम बोझ लादने की जिम्मेदारी
इन्हीं के कंधो पर है।

५-

सत्य तो यही है
कि बाड़े के भीतर उग आये
बाँस के झुरमुट केवल झुरमुट नही
बल्कि मनकी की हलक में,
कब से अटकी हुई एक आधी अधूरी कहानी है

एक कुरा नमक
एक कुरा हल्दी के बदले
बास्ता का सौदा करते वक्त
मनकी का दिल दहल जाता है

बाड़े में उग आये बाँस के झुरमुट से
चुन-चुनकर
मनकी जब नवांकुर बाँस बेचती है
तब पता होता है मनकी को
कि भूख से बड़ी कोई दूसरी बात,
इस धरती पर हो ही नही सकती
कि किसी की कोख़ की फसल काटकर
अपनी कोख को सूखने से बचाने का अपराध
मनकी हर साल करती है

आंसू की एक बूंद का बोझ
और भूख के गणित का समीकरण हल करना
कोई मामूली बात थोड़े ही है

मनकी सोचती तो ज़रूर होगी
कि बास्ता की सब्जी इतनी स्वादिष्ट क्यों बनती है ?


घूमता है बस्तर भी


पृथ्वी घूमती है अपनी धुरी पर
कि पृथ्वी का घूमना तय क्रम है
अँधेरे के बाद उजाले के लिए
कि घूमती है पृथ्वी तो घूमता है
संग-संग बस्तर भी
पृथ्वी की धुरी पर !

पृथ्वी घूमती है अपनी धुरी पर तेजी से
कि घूमता है बस्तर भी उतनी ही तेजी से
इसकी, उसकी तिज़ोरी में
गणतंत्र का उपहास उड़ाता,
काले धन की तरह
छिपता-छिपाता ।
पहाड़ों की तलहटी और जंगलों की ओट से
जब भी झांकता, दबोच लिया जाता है
किसी मेमने की तरह !

पृथ्वी घूमती है अपनी धुरी पर
कि घूमता है बस्तर भी
इसकी, उसकी कहानियों में
चापड़ा, लांदा, सल्फ़ी घोटुल, चित्रकूट के
बहते पानी में बनती इंद्रधनुष की परछाइयों सा
जब भी कोशिश की बस्तर ने
सूरज से सीधे सांठ-गाँठ की...
निचोड़कर सारा रस
तेंदू, साल, बीज की टहनियों पर तब-तब
टाँग दिया गया बस्तर को सूखने के लिए !

पृथ्वी घूमती है अपनी धुरी पर
कि घूमता है बस्तर भी देश-विदेश में
उतनी ही तेजी से
किसी अजायब घर की तरह...
जिसे देखा ,सुना और पढ़ा तो जा सकता है
किसी रोचक किस्से-कहानी में
बिना कुछ कहे निःशब्द होकर !

पृथ्वी घूमती है अपनी धुरी पर
कि घूमता है बस्तर भी
अपने सीने में छुपाये पक्षपात का ख़ूनी खंज़र !
न जाने वह कौन सी ओजन परत है...
जिसने ढक रखा है
बस्तर के हिस्से का
सारा उजला सबेरा ?


सागौन


सागौन के वृक्ष बस्तर भूमि पर उग आए
दो मजबूत हाथ है
जिनकी हथेलियों पर
लिखा भूमकाल का विद्रोह
धीरे-धीरे दम तोड़ रहा है

सागौन की चौड़ी पत्तियाँ समेटना चाहती है
जल,जंगल,जमीन की दुनिया
अपनी रेशों में
टहनियों में बांध कर लाल मिर्च
बनाना चाहती है
डारामिरी सा कोई प्रतिक चिन्ह
चूस कर छोड़ दी गई हरियल  छाती के लिए

सागौन की मोटी जड़ें भीतर ही भीतर
जमा कर रही है दर्द का मवाद
गीली मिट्टी की नमी में
आँसू छुपाती सुबक रही जड़ें
अब लिखना चाहती है
उपेक्षा का एक पूरा का पूरा इतिहास

सागौन के दोनों हाथ चाहते हैं एक बार फिर
शोषण के खिलाफ़ लामबंद होना
एक बार फिर चाहते हैं
अपनी इस धरती पर
गुण्डाधुर जैसा
कोई नन्हा बीज बोना।



इंद्रावती


भद्रकाली के अंतिम छोर पर
घुटनों तक डूबकर
इंद्रावती नदी के पानी में
मैं महसूस कर लेती हूं
बस्तर का सारा सच !

मुझे पता है
इंद्रावती नदी सबकुछ जानती है
जानती है इंद्रावती
कि रोती है चुपके- चुपके
जब उस पर सवार होकर
गुजर जाता है
लाल आतंक का साया
ठहर जाती है सिहर कर
वही दुबकर
कि पता है अब,
उसकी कोख़ का रंग हो
जायेगा लाल !

ठिठक कर रुक जाती है
इंद्रावती नदी
बहते -बहते अटक जाते हैं
उसके कई साज
कि पता है अब,
बांधी जायेगी वो जंजीरो में
और ठहर जायेगा उसका
यूँ अनवरत बहते रहना !

शांत शीतल बहते- बहते
चौक कर नींद से अचानक
जाग उठती है इंद्रावती
कि पता है अब,
होगा शोर बहुत शोर
रौंदी जायेगी मसली जायेगी
और फिर उठाकर
पटक दी जायेगी
कही किसी महासागर में !

कितना कुछ सहती है
इंद्रावती नदी
कालाहांडी से भद्रकाली  के
अंतिम छोर तक !

तभी तो घुटनों तक डूबकर
इंद्रावती नदी के बहते पानी में
मैं महसूस करती हूँ
बस्तर का सारा सच!
बस्तर का सारा सच!

पूनम वासम
नाम-- पूनम विश्वकर्मा वासम
शिक्षा -एम. ए.(समाजशात्र, अर्थशात्र) 
सम्पति- शिक्षिका बीजापुर 
साहित्यिक परिचय- कविता लेखन, विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित, युवा कवि संगम 2017 , बनारस हिन्दू यूनिवर्सिटी में प्रतिभागी.
ईमेल - pvasam@rediffmail.com
निवासी - बीजापुर बस्तर ( छतीसगढ़)
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