साहित्य को स्वर देने की एक नयी कवायद : अविधा - जेएनयू में श्री लीलाधर मंडलोई का काव्यपाठ

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"चार मित्रों ( Sayeed Ayub, मृदुला शुक्ला, Sanjay Shepherd और मैं) ने तकरीबन एक महीना पहले मिलकर यह सोचा कि हमारा साहित्य जिन नए किस्म के प्रश्नों से टकराते हुए विकसित हो रहा है, उन प्रश्नों की व्यापक परिधि को साहित्यिक मानदंडों के अनुरूप समझने का प्रयास किया जाना चाहिए| निश्चित तौर पर, यह साहित्यक मानदंडों में तोड़-फोड़ और बदलाव का गहन दौर है| इतनी तोड़-फोड़ कि साहित्य की तमाम विधाएँ एक-दूसरे को लील जाने के लिए आतुर हैं| और, मेरी प्रार्थना है कि इस आतुरता को साहित्य का नया पराभव न समझा जाए|
अभी इतनी ज़ल्दी, समकालीन साहित्यिक प्रतिमानों को किसी आंदोलन की शक्ल दे देने की न तो हमारी चाह है और न ही आयुवत योग्यता| हम सीख रहे हैं, सीखने की कोशिश कर रहे हैं| सच तो यह है कि साहित्यिक प्रतिदर्श के प्रति हमारी समझ 'बिल्कुल एक' नहीं है| हम स्वतंत्र होकर विचारने और एक-दूसरे के विचारों को ईमानदारी से समझने के पक्षपाती हैं| इस भावबोध पर आकर हम एक हो जाते हैं| यही हमारा प्रस्थान बिंदु है|
हमने मिलकर तय किया कि साहित्य की नई कोशिशों को (और साहित्य के नए 'उत्पातों' को भी) स्वर देने के लिए तथा उन स्वरों को अपने जातीय साहित्य की परंपरा से परिचित कराने के लिए फ़िलहाल एक न्यास का गठन करना चाहिए| हम इस दिशा में प्रयासरत हैं और हमने अपने न्यास का नाम 'अविधा' चुना है| इस नाम के पीछे बहसों और एक ग़लतफ़हमी का बढ़ियाँ रोल है, जिसकी पोल कभी सईद अय्यूब अपनी 'गालीदार' कहानीकला में आप सबके सामने खोलेंगे|
'अविधा' शब्द आपको हिंदी के किसी शब्दकोष में नहीं मिलेगा| हो सकता है, 50 साल बाद मिल जाए| यह बाकायदा गढ़ा हुआ शब्द है| मेरी गुज़ारिश है कि इस शब्द के अर्थ को अकहानी और अकविता जैसे साहित्यिक पदों के बरक्स न रखें| यह पूर्ववर्ती प्रतिमानों का पूर्ण नकार नहीं है| 'अविधा' तरल होती जा रहीं सोशियो-पोलिटिकल परिभाषाओं का साहित्यिक सच है| विधाओं का आपस में धँस जाना इसका केवल बाह्य रूप है|
09/01/2015, शुक्रवार को हमने 'अविधा' न्यास के रूप में पहला प्रायोगिक कार्यक्रम किया| हमने अपने दौर के प्रमुख कवि श्री लीलाधर मंडलोई को एकल काव्य-पाठ के लिए आमंत्रित किया (SSS-2, जे.एन.यू., समिति कक्ष)| अगर ईमानदारी से कहूँ तो यह कवि और श्रोताओं के आपसी तालमेल की अपार सफलता थी, हमारे न्यास की नहीं| कवि ने अपने श्रोताओं को लगभग ढाई घंटे तक स्तब्ध रखा, और श्रोता थे कि कवि को छोड़ने के लिए तैयार ही नहीं थे| लेकिन, कवि को अन्य कर्तव्य के निर्वाह के लिए जाना था.. और श्रोताओं के पात्र आधे ख़ाली थे|
इस कार्यक्रम में हमने बहुत जानबूझकर श्रोताओं की संख्या सीमित रखी थी| केवल 52 गहरी साहित्यिक समझ वाले श्रोताओं को मोबाइल या प्राइवेट मेल द्वारा आमंत्रित किया गया था| उनमें से 37(+2) उपस्थित थे| चूँकि यह 'अविधा' न्यास का पहला कार्यक्रम था, इसलिए साहित्यिक गरिमा के ख्याल से हमने इस 'विरेचन' पद्यति को अपनाया| हम भरोसा दिलाते हैं कि अब ऐसा कोई 'विरेचन' हम नहीं करेंगे| साहित्य की जनतांत्रिक भूमिका के हम सब हिमायती हैं| समकालीन साहित्य दुनिया की आम जनता के पक्ष में ही संभव है, किसी पैट्रो-एथिकल राजा के पक्ष में नहीं|


आनंद कुमार शुक्ल 

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"एक बीमार आईने से शहर" में गुजरी एक शाम कुछ जीवंत कविताओं के साथ ..... जेएनयू में श्री लीलाधर मंडलोई का काव्यपाठ 

एक गरिमामयी श्रोताओं की उपस्थिति में 40 कविताओं का मंडलोई जी द्वारा कविता पाठ सुनना श्रोताओं का सौभाग्य था . हर विषय पर मंडलोई जी द्वारा कविता पाठ करना श्रोताओं को मंत्रमुग्ध करता रहा फिर वो प्रेम कविता हों , राजनीति हो , अपने जीवन के पल हों जहाँ उन्होंने आरंभिक जीवन गुजारा सतपुरा के इलाके से उनका गहन लगाव उनकी कविताओं में परिलक्षित हो रहा था . जिसकी बानगी उनकी पहली कविता से ही झलकनी शुरू हो गयी थी :

मेरी उम्र ४२ से आगे की परछाइयाँ हैं 
जब अब डर रही हैं बिल्ली के रोने से
वहीँ कक्का जी को याद करते हुए जो कान साफ़ करना , नाखून काटने आदि का काम करते थे और पर्दा प्रथा जोरो पर थी उस वक्त , वो शख्स जिसके आगे घर की औरतों को भी जाने की पाबन्दी नहीं थी बल्कि उनके लिए एक खास इज्जत थी घर के मर्दों के दिल में उसे बड़ी खूबसूरती से सहेजा कुछ इस तरह :

एक गुदगुदी है जो अभी तक बसी है कानों में
वहीं 'कस्तूरी ' कविता उस ज़माने में एक औरत होने की सच्ची तस्वीर है तो दूसरी ओर इस पुरुषवादी समाज की वो घिनौनी तस्वीर जहाँ स्त्री का स्वतंत्र अस्तित्व उसे स्वीकार्य नहीं जिसकी कुछ पंक्तियाँ सोचने को न केवल मजबूर करती हैं बल्कि उस व्यक्तित्व की गरिमा और सोच को दर्शाती हैं जो कि एक सच्ची घटना से प्रेरित है :

मैं एक औरत नहीं , मानुष हूँ
प्रेम को गुलामी की 

वो पहली सीढ़ी मानती थी
मैं लिंग पूजन नहीं 

न ही शिव की न ही किसी और की
कि उसका एक बार होना बार बार होना है
'स्त्री का कंकाल ' रौंगटे खड़ी करती सीता की वेदना का तीन हिस्सों में वो वर्णन है जिसे उतनी ही वेदना से कवि ने व्यक्त किया है चंदलफ़्ज़ों में 

इतना दुःख इतना अपमान इतनी घृणा 
कि 
नहीं ब्याहते मिथिला के लोग 
बेटियां अयोध्या में अब
' गिरगिटान ' एक ऐसा व्यंग्य है जो आज के मानव पर सटीक बैठता है जिसे एक पंक्ति में कुछ यूं व्यक्त किया जा सकता है 

शुक्र है कि नहीं देखा उसने 
रंग बदलना आपका
शहर पर कविता कहते हुए पुलिस व्यवस्था पर एक पंक्ति आज के समाज में पुलिस की छवि दिखा देती है 

क्या मालूम नहीं था 
वर्दी का जिस्म 
किसी कातिल में तब्दील हो जाता है
वहीँ दिल्ली शहर पर भी एक ऐसा दर्द उकेरा जो आज का ऐसा सच है जिसे झुठलाया नहीं जा सकता कैसे इन्सान अकेला होता जा रहा है और यदि बेल बजती है तो किसी आत्मीय सम्बन्धी द्वारा नहीं बल्कि अनावश्यक तत्वों द्वारा जिनका हमसे हमारे जीवन से कोई लेना देना नहीं :

ये शहर एक बीमार आइना है 
जिसमें फैलने लगता है स्याह अँधेरा 
कोई नहीं आता यहाँ
ये तो कुछ कविताओं की एक बानगी भर है वर्ना हर कविता ऐसी जो अपने साथ आपको बहा ले जाने में सक्षम थी और अंतिम कविता हर श्रोता की फरमाइश थी .......'हत्यारे' जो एक कालजयी कविता की श्रेणी में आती है. ये मंडलोई जी की कविताओं का तिलिस्म था जो श्रोताओं को और सुनने पर विवश किये जा रहा था. बायीं तरफ के लोग, घरेलु मक्खी, चीटियाँ, मधुमक्खियाँ, अनबोला, कीट, पशुओं के प्रेम पर आधारित एक प्रेम कविता अपने आप में अद्भुत थी, एक माँ का होना दिल को झंझोड़ती वो कविता थी जिस पर हर दिल से एक आह निकल पड़ी. शिकस्तों के बीच, इम्तिहान, घोडा नक्कास , उम्मीद, दोस्त, पत्थर की कोमलता, कर्ज, ममता, स्त्री, अमीर आदमी , हाथ मिलाने की प्रथा, पैर व् जूते पर एक कविता तथा ४-५ प्रेम कवितायेँ और राजनीति पर मारक कवितायेँ फिर वो व्यंग्य रूप में हों या अन्य बेजोड़ थीं जिसमे ' वे आ गए ' ऐसी कविता थी जिसने हर पाठक का मन मोहा.
इस तरह एक सफल काव्य गोष्टी का आयोजन हुआ जहाँ जाकर हर श्रोता को लगा कि आना सार्थक हुआ और यही किसी भी गोष्ठी की सफलता की पहचान है. सईद अयूब, संजय शेफ़र्ड, आनंद कुमार शुक्ल और मृदुला शुक्ल की पूरी टीम बधाई की पात्र है.

वंदना गुप्ता 






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मेराकी पर प्रस्तुति देने के लिए हार्दिक आभार रश्मि :)

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