कविता में स्त्री - कुछ तुम्हारी नज़र, कुछ हमारी

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कोई महिमामंडन नहीं करूंगी , किसी विशेषण , किसी अलंकरण से नहीं सजाऊँगी। स्त्री , तुम मानुषी हो , खुल कर सांस ले पाओ , जी पाओ हर ग...

नटई तक माड़ भात खाने वाली लड़की और बूढ़ा लेखक : युवा कथाकार शिवेंद्र की कहानी

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       मारकेज़ के जादुई यथार्थवाद के बारे में कथाकार प्रियदर्शन अपने एक आलेख मे लिखते हैं , “मारक़ेज़ वह क्या करते हैं कि उनके छूते ही जा...

क्यों नहीं कह सकते - माइ चॉइस? - रश्मि भारद्वाज

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देह मेरी , मेरा दिमाग , मैं चुनूंगी मैं चुनूंगी अपनी पसंद के लिबास तब भी मेरी आत्मा रह सकती है निर्वस्त्र मैं चुनूंगी मे...

'जंगल है हमारी पहली पाठशाला' : पूनम विश्वकर्मा वासम की कविताएँ

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पूनम विश्वकर्मा वासम की कविताओं में बस्तर की मिट्टी की सुगंध है। आदिवासी जीवन के विविध रंगों से भरी ये कविताएँ अपनी ताज़गी , टटके बिंबो...

पलायन एक पराजित का - सौरभ पांडेय की कविताएँ

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सौरभ पांडेय की कविताओं का स्वर  व्यक्तिपरक  है । कविताओं में निजी दुख , प्रेम और विरह का स्वर प्रभावी है लेकिन इनकी ताजगी आकर्ष...

The last train to the moon - Poems of Edina Barna

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Edina Barna Words alone can not make a poem if they are not accompanied by emotions that pierce the soul and ravage the spirit –...

मैं जब एक दूब की तरह सिर उठाता हूँ : संजय कुमार शांडिल्य की कविताएँ

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संजय की कविताओं में आम आदमी का संघर्षपूर्ण जीवन और पूंजीवाद के शोर में उसकी गुम होती जा रही पहचान को सहेजने की बेचैनी है । ये प्रतिरोध की ...

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