तुम्हारा प्रेम , मेरे गले में अटका हुआ माछ का कांटा ! - आयुष झा आस्तीक की कुछ कविताएँ

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पेशे से मेकैनिकल इंजीनियर आयुष के लिए कविताएँ जुनून हैं, कुछ इस हद तक कि अगर वे कविताएँ ना भी लिख रहे होते तो कविता न लिख पाने की वजहों पर कुछ रच ही रहे होते। उनकी कविताओं की विशेषता है देशज शब्द जिन्हें आप कुछ हद तक गँवई भी बुला सकते हैं लेकिन जिसे पढ़ते ही आप गाँव की सोंधी मिट्टी की महक से सराबोर हो जाते हैं। एक कसबाई लड़के के महानगर के आधुनिक जीवन की विषमताओं से कदमताल करते हुए अपने अस्तित्व को बचाए रखने के संघर्ष की दास्तान है ये कविताएँ।
बक़ौल आयुष

"कविता स्वयं से स्वयं का संवाद है। मौन संवाद के दौरान मेरा पागलपन बाध्य करता है मुझे दिन को दिन और रात को रात कहने के लिए। मेरी जिज्ञासा उकसाती रहती है मुझे कविता लिखने के लिए मैं अनसुलझे हालात को गुदगूदाता रहता हूँ ख्वाहिशों की पीपनी में उम्मीदों की पोटली टाँग कर मैं नाकामयाबी की पीठ थपथपाता रहता हूँ । लिखता हूँ शायद इसलिए जिंदा हूँ, यकीनन मैं लिखने के लिए ही जिंदा हूँ । ना लिख सकने की स्थिति में भी मैं लिखते रहना चाहता हूँ शायद मैं मरने के बाद भी जिंदा रहना चाहता हूँ । यानि लिखना मेरा स्वार्थ है, यकीनन यह स्वार्थ भी निःस्वार्थ है. अब यह सवाल उठना भी लाजिमी है कि गर मैं कविता नही लिखता तो मैं क्या कर रहा होता मुझे लगता है कि कविता नही लिखने की स्थिति में भी मैं कविता ही लिख रहा होता कविता ना लिख पाने की वजह पर अनगिनत कविताएँ "
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एहसासों की पगडंडी

चरवाहा नहीं
बल्कि हरवाहा की तरह
मैं बरसों से जोतता
आ रहा हूँ
तुम्हारे यादों को...

ख्वाहिशों के कंधे
पर
पालो बाँध कर,
हालात को पुचकारते हुए
जोत लेता हूँ मैं
अढाई डिसमील...

मगर फिर भी
यह तन्हाई
नींद में उठ कर
चरने लगती है रात को!
अन्यथा इस डरावनी रात
का रंग
काला तो नही होता...

जब तुम स
होती थी
तो हरे-भरे घास
लहलहाते थे रात भर...

जब एक नीलगाय
तुम्हारी आँखों में
दौड़ती थी इधर से उधर...
कुछ हिरणों को
बाँध दिया था हमने खूँटे से
एक नदी बहती थी
एहसासों की पगडंडी पर...

और मेरे होठ
से
तुम्हारी नाभी तक
बिलबिलाने वाली
वो नीली मछलियाँ
याद है ना तुम्हें !

जब अपनी साँस
रोक कर तुमने
कई बार उन्हें
आक्सीजन प्रदान किया था..

एक कछुआ
अपनी पीठ पर
लालटेन जलाया करता था...
रात इंन्द्रधनुष बनने
लगी थी धीरे-धीरे...

सुनो,
खिड़कियाँ खोल कर झाँको
आसमान में दूर तलक...
चाँद चभर-चभर करके
जुगाली करता है आज भी....

पर तुम्हारी अनुपस्थिति में
देखो यह तन्हाई
अब बकरी बन कर

चरने लगी है रात को ...


अनुशासन
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अनुशासन लेसन है!
सुसूम दूध में खसा कर
दही जमाने हेतु उपयुक्त ।

अनुशासन आंच है!
धैर्य की अंगीठी पर
आशंका को सीझा कर
संभावना परोसने हेतु प्रत्युक्त ।

गर आप अनुशासन
का मतलब
गदहे की तरह हाँ में सर हिलाना
समझते हैं
तो यकीनन गलत हैं आप !

दरअसल गदहा से
घोड़ा बनने
की
जैविक प्रक्रिया में उपस्थित
उत्प्रेरक है अनुशासन ।

अनुशासन दिन को
दिन और
रात को रात कह सकने की
ज़िद/सनक/पागलपन है ।

साग और घास
में फर्क
महसूसने हेतु

आवश्यक कला है अनुशासन ।


Picture Credit: http://mithilapaintingtraining.blogspot.in/
तुम्हारा प्रेम

तुम्हारा प्रेम ,
मेरे गले में अटका हुआ
माछ का कांटा !
सहलाता रहता हूँ
जीभ से
ताकि स्वाद बना रहे ।

तुम्हारी बेरूखी ,
मेरे चेहरे पर पसरा हुआ
अनंतकालीन सन्नाटा !
जिसे मैं धूंकता हूँ
सिगरेट में भर के
तो टूटती है तुम्हारी चुप्पी ।

सोचो !
फिजाओं में छाए हैं घने कोहरे
मगर बरसात क्यूँ नही होती ?

सुनो!
हाँ मैं जानता हूँ कि
ठंड की आहट सुन कर
सुरीली हो जाती हो तुम ।

देखो !
तुम्हारी खामोशी को
बहलाने के लिए ही मैंने
इस ठंड को बुलाया है ।

कहो !
तुम्हारे बाम हथेली में
कैसी है मेरी भाग्य रेखा !
मेरी हस्तरेखा तो
बतलाती है
कि यह सुर्यास्त का वक्त है ...

पर मुझे यकीन है
कि तुम्हें अब तलक है
मेरे यकीन पर यकीन ।

वरना
सुर्यास्त के पश्चात भी हमेशा
एक नया सवेरा क्यूँ होता ?



बरसाती नदियों में
जमीन से उखड़ने वाली
मछलियां ।

जैसे लट्टा बगलट्टा
गैंची
बामी और पटैया ।

स्वादिष्ट होती है
सामान्य से कुछ ज्यादा ...

अल्लुआ-सुथनी उखाड़ने
के लिए
जरूरी होता है मिट्टी को कोड़ना ..

दरअसल
दफनाए गए लोग
पुनः जीवित  हो सकते हैं ।
जरूरी यह है कि
फूंक मार कर तूफान पैदा करो ..

परिस्थितीयों पर मिट्टी डालो
और भूत को कोसने के बजाए
स्वस्थ वर्तमान पैदा करो ...

अरे किस्मत बदलने
के लिए
जरूरी होता है कर्तव्यनिष्ठ होना ।

सुनो !
लोगों में यह रूझान पैदा करो ..



समय चाभी का गुच्छा है

समय चाभी का गुच्छा है
और परिस्थिति
एक जंग लगा हुआ ताला ।
जंग लगना
एक आॅक्सीकरण अभिक्रिया है ।
नाउम्मीदी उत्सर्जीत करता है
आॅक्सीजन !
और धैर्य में आॅक्जेलीक एसीड का
होता है संवहन ...

किसानों को उम्मीद है कि
इस बार आलू की पैदावर होगी अच्छी ।
आलू में आॅक्जेलिक एसिड की
होती है प्रचूरता ।
जरूरी यह है कि
ख्वाहिशों के पिटारा को
खोलने के लिए !
सर्वप्रथम परिस्थिति को
उम्मीदों की किरोसीन से
नहलाया जाए .....

समय चाभी का गुच्छा है !
सुलझ जाती है हरेक उलझन
वक्त के साथ-साथ ...
जैसे मैदानी क्षैत्र में
बरसाती नदियाँ उगलती है बालू ।

धीरे धीरे ससरने लगता है
बाढ का पानी !
और धटने लगता है
नदियों का जलस्तर ।

फलस्वरूप उर्वराशक्ति के बढने से
तथाकथित बंजर जमीन
हो जाती है हरी भरी ....

समय चाभी का गुच्छा है !
सुलझ जाता है हरेक उलझन

वक्त के साथ साथ ....


Picture Credit: https://www.behance.net
जंगल राज
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वो गड़ेड़िए के लिवास में
छिपा हुआ भेड़ियाँ !
भेड़ के दूध में
शिलाजीत मिला कर
पीने लगा ।

भेड़ से ऊन
उतार कर
उसे अर्द्धनंग करके
सियारों में बाँटता रहा...

सियार स्वयं को
शेर समझने लगा ।
और भेड़िए
कसाई बनते गए ।

बकरियाँ कसाई खाने
में
टंगने लगी ।

मेमने के अस्थियों
पर
जंगल राज लहलहाने लगा ....

सुनो,
अब तो जागो !
क्युंकी
अब निर्बलों और असहाय को
आगे लाने के लिए
हाथ बढाना होगा ।

मेमने के बिखरे
हुए रक्त
में
भिंगो कर
लाल पताका फहराना होगा ....




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बहुत गहन और भावप्रवण कवितायेँ

intense poems laced with folk effects..

बेहतरीन...........

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