हमारी बात

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हमारी बात 

कितना कहा जा चुका, जाने कितना और कहा जाना बाकी है,शब्दों से रचनाकारों ने बुने हैं कई सपने एक बेहतर भविष्य के,एक सुनहरे कल के....  लेकिन आसपास सब कुछ तेज़ी से नियंत्रण से बाहर होता जा रहा। परिस्थितियाँ विषम से बदतर होती जा रही और सबसे भयंकर बात है कि हमें इस बिगड़ते हालत की आदत पड़ती जा रही है । ऐसा लगता है कि सुबह का अखबार उठाते या टीवी में न्यूज़ लगाते हम कहीं न कहीं मानसिक रूप से तैयार रहते हैं कि कुछ बहुत बुरा कानों से टकराने वाला है । हर बार यही लगता है कि इससे भयंकर,इससे बदतर कुछ नहीं हो सकता और हर बार समय हमारी इस धारणा को गलत सिद्ध कर देता है । तो क्या सच में निष्पंद होते जा रहे हम ? आस पास के जलते समय में भी अपने घर की सुविधाओं के बीच बैठे ईश्वर को शुक्रिया कहते कि हम अब तक सही हैं कि हमारा नंबर अब तक नहीं आया है ! ऐसे विकट समय में जब जीवन भी एक प्रश्न चिन्ह हो , शब्दों की क्या भूमिका हो सकती है भला ! लेकिन अब भी शब्दों से प्रेम करने वाले जानते हैं कि शब्द भले ही थोड़े समय के लिए ढक जाएँ कोहरे की चादर में , उनमें इतनी शक्ति है कि एक दिन वह आपने आस पास फैली दिशाहीनता को रास्ता दिखाने के लिए उजाला लाते ही हैं । शब्दों की साधना करने वाले जानते हैं कि एक दिन यही बदलाव लाएँगे हमेशा की तरह । आस पास फैल रही निष्पंदता, आत्ममुग्धता टूटेगी और शब्द माध्यम बनेंगे लोगों को एक दूसरे से जोड़ने के और बढ़ती हैवानियत से टक्कर लेने में समर्थ बनेगी मानवता । लेकिन उसका माध्यम, उसका हथियार होगी कलम और उससे सृजित अविजित शब्द ।
युवा पीढ़ी के बीच रहते उनके सपनों,उनकी संभावनाओं की आहट मिलती रहती है । यूं ही तो नहीं हम सबसे युवा देश । हमारे युवा चाहे तो इतिहास लिख दें जिसमें सबसे सुनहरे अक्षरों से नाम हो हमारे देश का ही , लेकिन दुर्भाग्य ही है कि इस भटके हुए समय में हमारा युवावर्ग भी दिशाहीनता से लड़ रहा । उनकी संभावनाएं बिना किसी उचित मार्गदर्शन, बिना किसी सिद्धान्त के बस खाओ पियो और ऐश करो के सूत्र वाक्य के साथ नष्ट होती जा रही । शब्द, साहित्य कला जो उन्हे इस विकट समय में रास्ता दिखा सकते थे , इंसान होने के मायने सीखा सकते थे, उनसे बहुत दूर हैं और इसके लिए मैं उन्हे कतई दोषी नहीं मानती । दस साल पहले अपना छात्र जीवन याद करती हूँ और याद आता है कि किस तरह एक विशेष साँचे में गढ़ा जाता है हमें, एक स्पेशल मोल्ड और जहां से भी रोशनी आ सकती है उस दरार को सीलबंद कर दिया जाता है ताकि नए विचारों , नयी सोच के लिए कोई गुंजाइश ही नहीं बची रह जाए।
यह वेबसाइट “ मेराकी” एक अंकिचन प्रयास है ऐसे युवाओं को एक प्लेटफॉर्म देने का जहां उन्हे बेहतर साहित्य पढ़ने को मिले जो उनके विचारों को आकार देने में सहायक सिद्ध हो सके । साहित्य , कला जैसे तत्व जो उनके जीवन से विलुप्त होते चले गए हैं, वह उनसे फिर जुड़ पाएँ और एक बेहतर समाज के निर्माण में अपना सक्रिय योगदान दे सके क्योंकि जीवन बस एक अच्छा करियर बना लेने और पाँच अंको की सैलरी पा लेने में ही नहीं सिमट जाता । जीवन के मायने इससे कहीं बढ़कर हैं,जीवन इससे कहीं आगे जाता है .... कहाँ तक और उसका लक्ष्य क्या है बस इस खोज की ललक भर पैदा हो जाए तो मैं समझुँगी कि मेरा उद्देश्य सफल हुआ , “मेराकी” का उद्देश्य सफल हुआ....
 मेराकी ग्रीक भाषा का एक शब्द है,एक विशेषण जिसका अर्थ है रचनात्मकता से किया गया कोई भी कार्य । कोई भी कार्य जिसे हम अपनी आत्मा से करें ,पूर्ण समर्पण और प्रेम के साथ करें । इस वेबसाइट के लिए मुझे इस विशेषण से बेहतर कोई नाम नहीं मिला क्योंकि कला और साहित्य की दुनिया में विचरने वाले जानते हैं कि अपनी आत्मा को समर्पित किए बिना अधूरी ही रहती है हर रचना। यह एक द्विभाषीय वेबसाइट होगी जिसमें हिन्दी और अँग्रेजी दोनों ही भाषाओं में रचे जाने वाली बेहतर रचनाएँ आपके समक्ष लाने का प्रयास रहेगा हमारा ।
आभार
संपादकीय टीम



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Congratulations. Doing well. My Good Wishes..
Jagdish Kinjalk.
Bhopal. M.P.


बेहद सुन्दर ब्लॉग, बेहद स्तरीय सामग्री ! शुभकामनाएं एवं बधाईयाँ !!!

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