प्रियंका ओम की कहानी -'लास्ट कॉफ़ी'



प्रियंका ओम नयी हिन्दी के रचनाकारों में एक चर्चित नाम हैं और युवाओं में ख़ासी लोकप्रिय हैं। इनकी कहानियों के विषय और उनका ट्रीटमेंट अलहदा होते हैं और वह नए प्रयोग करने से भी झिझकती नहीं हैं। बच्चों के यौन शोषण पर केन्द्रित यह कहानी एक बेहद  संजीदा विषय पर ज़रूरी सवाल खड़े करती है। वरिष्ठ रचनाकर धीरेन्द्र अस्थाना के अनुसार : 'इस कहानी को पढ़कर मैं इतना विचलित हुआ कि बहुत देर तक कमरे में बदहवास घूमता रहा।' 

मेराकी पर पढिए प्रियंका ओम की कहानी 'लास्ट कॉफ़ी'। 




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उस दिन पहली बार उसे लिफ्ट में देखा।
इक्कीसवें फ्लोर से ग्राउंड फ्लोर तक आते-आते कुछ तीन-चार मिनट तक उसके साथ रही। उसके हाथ में लैपटॉप था, जो उसके साइ़ज के अनुपात का ही था... स्लीक और छोटा सा। B का बटन पहले से दबा हुआ था। शायद उसे कहीं दूर जाना था, और उसकी कार बेसमेंट में थी। उसपे ज़्यादा ध्यान नहीं दिया मैंने; या फिर उसमें ध्यान आकर्षित करने वाला कण नहीं था।
उसके स्ट्रांग परफ्यूम की ख़ुशबू से लि़फ्ट का क्यूबिकल प्रदूषित हो गया था... हाँ वो एक तरह का प्रदूषण ही था, क्यूँकि उस ख़ुशबू में मेरा दम घुट रहा था। पता नहीं पुरुषों का परफ्यूम इतना स्ट्रांग क्यूँ होता है... और वो तो पानी से नहीं, शायद परफ्यूम से नहाकर निकला था।
ये संयोग ही था, कि अगले दिन शाम को ब़गल के सुपर मार्केट से जब मैं ग्रॉसरी़ज लेकर आ रही थी, घर से पहले वाले मोड़ पर वो फिर से दिख गया। मैं उसके पीछे थी। वो बहुत ते़ज-ते़ज चलकर आगे निकल गया। मैं लि़फ्ट के पास पहुँची, तो वो वहीं खड़ा दिखा। लि़फ्ट, मेरे पहुँचने के बाद आई। पहले वो, फिर मैं अंदर गई। उसने ‘तेईस’ प्रेस किया, और मैंने इक्कीस। उसने लि़फ्ट के अंदर लगे स्टेन्लेस स्टील की रेलिंग को पकड़ रखा था; शायद बहुत थका हुआ था।
फिर बहुत दिनों बाद मिला था। मैं जैसे ही लि़फ्ट में दाख़िल हुई, उसने स्माइल से मेरा स्वागत किया। रॉयल ब्लू कलर का टेलर्ड सूट पहने, अलहदा लग रहा था।
अच्छा पहनावा हमेशा ही व्यक्तित्व में चार चाँद लगा देता है; कई बार साधारण सा दिखने वाला इंसान भी असाधारण लगने लगता है। वो भी आज असाधारण लग रहा था।
मैंने उसके चेहरे की तऱफ देखा, और एक बार फिर हमारे बीच स्माइल का आदान-प्रदान हुआ, और उसने फट् से अंग्रे़जी में पूछ लिया ‘‘मैं कैसा लग रहा हूँ?''
मैंने फिर से उसकी तऱफ देखा। उसकी उम्र चौबीस पच्चीस से ज़्यादा नहीं होगी; और इस कहानी को उसकी उम्र से कोई लेना-देना भी नहीं है।
उसके बाल गीले थे। शायद आज परफ्यूम से नहीं, पानी से नहाकर निकला था, जिसकी ख़ुशबू में मेरा दम नहीं घुट रहा था। चेहरे पर उगी सुनहरी दाढ़ी मूँछें, उसे बहुत आकर्षक बना रही थीं, और निश्चित ही आकर्षक दिखने के लिए ही उसने कई दिनों से शेव नहीं किया था, और इससे उसके आकर्षित करने वाले कण जागृत हो गए थे। दारसिटी के नीले समंदर सी उसकी नीली आँखें मुझे बहुत गहरी लग रही थीं। डूबने या तैरकर पार कर जाने से पहले ही कहा, ‘‘very attractive.''
जवाब में उसने कटरीना कै़फ वाली हिंदी में शुक्रिया कहा।
हिंदी में शुक्रिया कहकर उसने मुझे चौंका दिया था। कहीं ये भी हिंदी राइटर तो नहीं! सोचकर मुझे मन ही मन हँसी आ गई। हम हिंदी राइटर, पाठकों पर धौंस जमाने के लिए चाहे जितनी अंग्रे़जी बोल लें, लेकिन आभार, शुक्रिया कहकर ही व्यक्त करते हैं। शुक्रिया कहना, जैसे हमारे हिंदी राइटर होने का स्टांप होता है।
लेकिन ये हिंदी राइटर नहीं होगा; ये तो किसी विदेशी मूल का है; और कोई भी विदेशी, हिंदी में सबसे पहले नमस्ते और शुक्रिया बोलना सीखता है। इसने भी दार एस सलेम आकर सीख लिया है। दार में तो आधी जनसंख्या भारतीय मूल की है... यहाँ के अफ्रीकन भी आते-जाते हम भारतीयों से ‘कैसे हो?' पूछ लेते हैं।
खैर... ग्राउंड फ्लोर आ गया, और मैं लि़फ्ट से बाहर निकल गई। उसे आज भी पार्विंग में जाना था; लिफ्ट बेसमेंट में चली गई।
उस दिन, रात को खाने की टेबल पर मैंने हज़्बैंड से पूछा, ‘‘आपको रॉयल ब्लू कलर कैसा लगता है?’’
‘‘नील जैसा लगता है।’’ हज़्बैंड ने मुँह बनाते हुए कहा।
मैं मुस्कुरा दी।
उस दिन सुपर मार्केट में फिर मिल गया। किसी फ़िरा़क के सिलसिले में वो मुझसे बार-बार टकरा रहा था।
मैं किताबें देख रही थी, और वो वाइन। मुझपे ऩजर पड़ते ही मेरे पास आ गया।
‘‘तुम्हें किताबें पढ़ने का शौ़क है?’’
‘‘हाँ, ख़ास तौर से साहित्य।’’
‘‘क्या तुमने अफ्रीकन  साहित्य भी पढ़ा है?’’
मुझे उसके मुँह से ये सुनकर बहुत अजीब लगा। एक फ़िरंगी, भारतीय से, अफ्रीकन साहित्य पढ़ने की बात कह रहा था।
‘‘अफ्रीकन साहित्य में क्या ख़ास है?’’
‘‘क्यूँकि अफ्रीकन साहित्य प्रकृति के साथ जुड़े ज़िन्दगी के अनुभव सुनाते हैं; आदिवासी साहित्य में पूर्वजों के ज्ञान-विज्ञान, कला-कौशल, और इंसानी बेहतरी के अनुभवों का दर्शन मिलता है, जीवन के प्रति ख़ास जिजीविषा दिखती है; इनका बा़जारवाद से कोई सम्बन्ध नहीं।’’
मुझे उसकी बातें रूमानी लग रही थीं। मैंने अफ्रीकन साहित्य की एक किताब उठा ली। वो बस मुस्कुराया था; इस बात से बे़खबर; कि उस व़क्त, मुस्कुराते हुए वो मुझे घोर ज्ञानी लग रहा था। उसके चेहरे से एक ते़ज टपक रहा था, और उसकी नीले रंग की आँखें प्रकाशमय थीं।
अडोल़्फ जर्मन है, और पेशे से hair dresser है। उसे लगता है, हर रो़ज अलग-अलग हेयर स्टाइल से अलग-अलग दिखा जा सकता है। अक्सर बढ़ती उम्र में छोटे बाल आपकी उम्र कम कर देते हैं।
अब मुझे पक्का य़कीन हो गया था कि ये राइटर नहीं है। इतिहास गवाह है कि आज तक एक भी बार्बर राइटर नहीं हुआ है।
उसने आगे बताया कि दारसिटी में अपने प्रवास के दौरान उसके जर्मन पिता, एक भारतीय अफ्रीकन के प्रेम में पड़ गये थे, जिसका अंत विवाह के रूप में परिणत होकर हुआ था। उसकी मॉम के ग्रेट ग्रैंड पेरेंट्स गुजरात से माइग्रेट होकर दारसिटी आ गए थे।
अडोल़्फ को दारसिटी बहुत पसंद है, क्यूँकि उसे समंदर पसंद है; इसलिये अक्सर छुट्टियाँ बिताने यहाँ आता रहता है। उसे ज़िन्दगी में दो ची़जें बहुत पसंद हैं; एक समंदर, दूसरा एकांत। कई बार वो किसी टापू पर सारा दिन एकांत में बिताकर, शाम ढले वापस आता है। उसे शान्त समन्दर पसंद है; हाई टाइड को वो समंदर का ग़ुस्सा कहता है। उसे य़कीन है कि समंदर अपने अंदर बहुत से रा़ज छुपाए हुए है, और वो राज उसे अपनी ओर बुलाते हैं; इसलिये समंदर और एकांत के अतिरिक्त उसे स्कूबा डाइविंग बहुत पसंद है।
मुझे वो, अजीब लड़की-सा अजीब लग रहा था। उसे समंदर के रा़ज बुलाते हैं; मुझे उसकी अजीबियत बुला रही थी। उसकी बातों में समंदर की तरह ही रा़ज छुपे थे, जिन्हें, बातों वाली स्कूबा डाइविंग से उसके मन के गुप्त तह़खाने से बाहर निकाल लेना चाहती थी, जिसे छुपाने की उसकी असमर्थ कोशिशों की उछलन मुझे लुभा रही थी।
मैंने कॉ़फी के लिये पूछा, क्यूँकि मुझे बातें करते हुए कॉ़फी पीना बहुत पसंद है; लेकिन उसने सीधे-सीधे शब्दों में मना कर दिया।
उसका कॉ़फी के लिये मना करना बहुत रूड लगा, और तत्काल मुझे ग़ुस्सा आ गया; लेकिन उसने अपने बास्केट से toblerone देते हुए कहा, ‘‘ये तुम्हारे लिये।'' और chocolate देखते ही मेरा ग़ुस्सा, फूल पर बैठी तितली की तरह उड़ गया।
हालाँकि मैं भी उसे मना करके ग़ुस्सा जता सकती थी, लेकिन थैंक्स कहकर अपने well behaved होने का प्रमाण देते हुए पूछा, ‘‘chocolate क्यूँ?''
‘‘क्यूँकि तुम ग़ुस्से में हो।’’
‘‘तुम्हें कैसे पता मैं ग़ुस्से में हूँ?’’
वो हँसा था, ‘‘तुम ग़ुस्से में कऩ्फ्यू़ज लगती हो।''
‘‘और जब मैं कऩ्फ्यू़ज लगती हूँ तो chocolate खाना पसंद करती हूँ।’’ कहते हुए मैं chocolate खाने लगी।
‘‘और chocolate खाते हुए बच्ची बन जाती हो।'' उसने मुझे देखते हुए कहा।
‘‘हर इंसान के अंदर एक छोटा बच्चा होता है, जो कभी बड़ा नहीं होता!’’ मैंने बच्चे जैसे ही आँखें मटकाते हुए कहा।
‘‘हाँ; और chocolate देखकर वो बच्चा बाहर निकल आता है।’’ उसने हँसते हुए कहा।
मेरे, ‘‘हाँ शायद'' कहते ही इक्कीसवाँ फ्लोर आ गया था। लि़फ्ट का ऑटोमैटिक दरवा़जा खुला, और मैं उसे बाय कहकर निकल गई।
मैं लि़फ्ट से निकल आई थी, लेकिन वो मेरे जेहन से नहीं निकला।
ये किस तरह का श़ख्स है! अब तक जितनी बार भी मिला है, हर बार अलग-अलग लगा है... एक साथ कितनी ज़िंदगियाँ जीता है... कहीं multiple personality disorder का शिकार तो नहीं!
मैं एक उपन्यास लिख रही थी, और मुझे एक ऐसे किरदार की तलाश थी, जो कथानक का संपूर्ण ब्रह्मांड हो। लेकिन आजकल जो भी मिलता है, वो क़िश्तों में मिलता है; और जो ची़ज क़िश्तों में मिलती है, वो सम्पूर्ण नहीं होती।
एक श़ख्स मिला है, मूकबधिर सा। मैं कहती रहती हूँ, वो सुनता रहता है। मेरे शब्द उसकी चुप्पी को तोड़ नहीं पाते, और इशारों वाली भाषा मुझे आती नहीं।
मैं अपनी तलाश से थक गई थी, इसलिए आजकल youtube पर फ़िल्में देख रही थी। कुछ अलग तरह की फ़िल्में, जो बड़े पर्दे पर नहीं आतीं; जिनकी शूटिंग विदेशी लोकेशन्स पर नहीं हुई होती है, और जिसके किरदार डायलॉग़्ज नहीं, बल्कि ज़िन्दगी के क़िस्से सुनाते हैं।
इन दिनों मेरा लैपटॉप, छोटा सा थियेटर बन गया है। मुझे हेडफोन लगाकर लैपटॉप पर फ़िल्म देखना ठीक वैसा ही लगता है, जैसे किताब हाथ में लेकर पढ़ना... किरदार से वन टू वन कनेक्शन। और आजकल किरदार से वन टू वन कनेक्शन का नशा हो गया था मुझे। लेकिन जिस तरह बा़की का नशा उतरता है, ठीक उसी तरह ये नशा भी उतर गया, और अडोल़्फ, मुझे मेरा वही किरदार लगने लगा, जिसकी मुझे तलाश थी... मेरे उपन्यास का सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड।
फिर एक दिन वो मार्केट में दिखा। बहुत ते़ज-ते़ज चला आ रहा था। मुझे लगा, शायद मेरी ओर; लेकिन उसने तो मुझे देखकर अनदेखा कर दिया, और मेरी स्माइल बेकार गई।
दुनिया में पुरुषों की कई क़िस्म होती हैं; लेकिन हम महिलाओं की एक ही क़िस्म होती है। जब हमें कोई देखता है, तब problem होती है, और जब कोई नहीं देखता है, problem तब भी होती है। सो मुझे उसके न देखने से प्रॉब्लम हो गई, और मैंने तय कर लिया था, कि अब मैं भी उसे देखकर नहीं देखूँगी... तब पता चलेगा, किसी का अनदेखा करना कैसा लगता है।
उसके बाद जब भी बाहर निकलती; इधर-उधर देखती, कि शायद वो दिख जाये... फिर मैं ऩजरें घुमा लूँगी, और हिसाब बराबर।
लेकिन क्या वा़कई ये सि़र्फ ग़ुस्सा था? और हिसाब बराबर करने के लिए सुपर मार्केट में मेरी आँखें उसे ढूँढ़ती थीं; और जब वो नहीं दिखता तो निराश हो जातीं।
अक्सर महिलाएँ उन पुरुषों की तऱफ आसानी से आकर्षित हो जाती हैं, जो उनके जीवन में पहले से मौजूद पुरुष से बेहतर होते हैं। लेकिन फिर मेरा अडोल़्फ की तऱफ आकर्षित होना भी अजीब था। ‘वो अजीब लड़की' के जैन साहब की तरह मुझे उसकी ‘अजीबियत’ आकर्षित कर रही थी।
लैपटॉप ऑन करती, तो डेस्कटॉप पर मेरा उपन्यास, मुझसे क़िस्से माँगता; मेरे इर्द-गिर्द शब्दों का बवण्डर, कहानी को कहीं दूर ले जाना चाहता। लेकिन कीबोर्ड पर उँगलियाँ चलतीं; फिर ठहरकर, जहाँ से चलतीं, वापस वहीं पहुँचकर रुक जातीं।
कॉलबेल की आवा़ज ने चौंकाया नहीं था, बल्कि चिढ़ा दिया था। अभी-अभी जेहन में आये ख़यालों को शब्दों में ढालने की ग़ऱज से लैपटॉप ऑन किया था... जिसे आना था थोड़ी देर पहले आ जाता।
जेहन में ख़याल भी आसमान में बि़खरे बादल की तरह होते हैं; एक ज़रा से हवा के झोंके से उड़ जाते हैं... सोचते हुए दरवा़जा खोला, तो सामने अडोल़्फ खड़ा था। अपनी बेतहाशा बढ़ी हुई दाढ़ी मूँछ में देवदास लग रहा था; लेकिन उसके हाथ में शराब की बोतल नहीं थी, और वो नशे में भी नहीं था।
मुझे देखते ही उसके होंठों पर एक फीकी सी मुस्कान, और आँखों में मद्धम सी चमक तैर गई, जो उसके निराशा की अधूरी कहानी थी, लेकिन मेरी आँखों के सामने मेरा उपन्यास मुकम्मल था।
...सम्मोहन में, अंदर आने को कहा।
लेकिन उसने कहा, अगर मैं कुछ ख़ास नहीं कर रही, तो वो मेरे साथ कहवा में कॉ़फी पीना चाहता है; वो मुझसे बातें करना चाहता है... असल में उसे कॉ़फी पीते हुए बातें करना अच्छा लगता है।
कॉ़फी के लिए मैं भी मना कर सकती थी; लेकिन उसने बातों का लालच दे दिया था।
बातें...! बातों में क़िस्से होते हैं; और क़िस्सों से कहानियाँ बनती हैं।
कॉ़फी पीते हुए उसने कहा, कि वो मेरे नाम को उच्चरित नहीं कर पा रहा है... क्या वो मुझे किसी और नाम से पुकार सकता है।
मैंने कहा, ‘‘नाम में क्या रखा है, तुम्हें जो पसंद हो।’’
‘‘नाम में क्या रखा है!’’ उसने मेरी बात को दुहराया... खैर... मैं तुम्हें Pia पुकारना चाहता हूँ; क्यूँकि संभव है, तुम्हारे नाम का सूक्ष्म स्वरूप हो।’’
ये सूक्ष्मतम है; सूक्ष्म तो प्रिया है... वैसे हिंदी में प्रिया और पिया का अर्थ एक ही है, क्या तुम जानते हो?’’
‘‘लेकिन अभी तो तुमने कहा, नाम में क्या रखा है।’’ उसने मेरे चेहरे पर ऩजरें गड़ाये हुए, उदासी भरे लहजे में कहा।
मेरे पास कोई जवाब नहीं था, ‘‘तुम्हारी सहूलियत के लिये कहा था।’’ मैं अपना बचाव करना जानती थी।
‘‘मेरे बारे में सोचने के लिए शुक्रिया मोहतरम; वैसे जर्मन में Pia बाइबल के pious से लिया गया है, जिसका अर्थ from (pure / holy) होता है।
‘‘और हिंदी में beloved होता है।’’ मैंने उसे चौंकाते हुए कहा।
‘‘क्या वा़कई?’’
हाँ।’
‘‘लेकिन तुम मेरी प्रेयसी नहीं हो।’’ उसने मेरी आँखों में देखते हुए कहा।
एक पल के लिये लगा, जैसे मैं उसकी गहरी नीली आँखों में डूब जाऊँगी; दूसरे ही पल मैंने बात बदल दी।
‘‘क्या ही आश्चर्य की बात है, कि मेरा beloved मुझे agnes (french word) पुकारता है और agnes का अर्थ भी pia (pure/ holy) होता है।’’
‘‘तुम फ्रेंच जानती हो?’’
‘‘नहीं; भाषाओं में मेरी रुचि कम है; बहुधा शब्द आकर्षित करते हैं।’’
कॉ़फी के साथ फ्रेंच टोस्ट आ गया था।
मैंने कहा, ‘‘bon appetite .../ enjoy your food.’’
उसने मुस्कुरा के देखा बस।
‘‘मुस्कुराते हुए तुम देवदास लग रहे हो।’’ मैंने उसे कुरेदते हुए कहा।
‘‘मुझे लगा, मैं जीजस क्राइस्ट लग रहा हूँ।’’
‘‘नहीं, देवदास लग रहे हो।’’
‘‘लेकिन मैं समंदर से प्रेम करता हूँ।’’
‘‘प्रेम तो बस प्रेम है; स्वरूप अलग होता है।’’
‘‘हाँ सही; लेकिन इंसानी प्रेम का वास्ता शरीर से है, जबकि समंदर से प्रेम का अर्थ गहराई है।’’
‘‘प्रेम अगर शारीरिक हो, तो वो प्रेम नहीं वासना है; लेकिन प्रेम में शरीर गहराई का पर्याय है अडोल़्फ।’’
‘‘मेरे ग्रैंड फ़ादर भी मुझसे बहुत प्रेम करते थे।’’
अच्छा।’ मुझे Grand father के प्रेम का ज़िक्र करना अजीब लगा था।
‘‘मैं तुम्हारे लिए कुछ लाया हूँ।’’ कहते हुए उसने अपनी जेब में हाथ डाला। शायद वो समझ गया था कि मुझे उसके ग्रांड फ़ादर के प्रेम में कोई ख़ास दिलचस्पी नहीं थी।
‘‘ये तो पर्ल है!’’ मैंने बहुत ख़ुश होकर कहा।
‘‘हाँ, र्मैं zanzibaar गया था, वहाँ समंदर में मिला।’’
‘‘यह तो बहुत क़ीमती है।’’
‘‘क़ीमत किसी ची़ज की नहीं होती Pia; क़ीमत व़क्त और इंसान की होती है; क्या ये व़क्त क़ीमती नहीं, जिसमें तुम मेरे साथ कॉ़फी पी रही हो?’’
मैं हतप्रभ होकर बस उसे देखती रही, और वो फिर से बस मुस्कुरा दिया।
‘‘तो तुम्हें समंदर के रा़ज ने बुला ही लिया!’’
मेरे शब्द ने उसकी चुप्पी तोड़ दी। ‘‘क्या तुम किसी दिन मेरे साथ scuba diving पर चलना पसंद करोगी? समंदर के भीतर की दुनिया बहुत ख़ूबसूरत है।’’
‘‘नहीं, मुझे पानी से बहुत डर लगता है।’’
वो हँस दिया, ‘‘पानी से डर? पानी तो जीवन है।’’ उसे य़कीन नहीं हो रहा था। आज पहली बार वो खुलकर हँसा था।
मुझे उसका हँसना अच्छा लगता है। मैं मुस्कुराते हुए कहती हूँ, ‘‘हाँ, बचपन से ही... पता नहीं क्यूँ।’’
‘‘जब तुम समंदर के क़रीब जाओगी, तब तुम्हारा पानी से डर ख़त्म हो जायेगा; छोटे-छोटे डर को भगाने के लिए बड़े डर का सामना करना पड़ता है।’’
क्या बताती मैं उसे, कि अब तो पानी से डर की आदत हो गई है; और मैं समंदर के भीतर जाकर अपनी आदत बदलना नहीं चाहती थी।
और भी ग़म है ज़माने में समंदर की गहराई के सिवा ।
मेरे घर की बाल्कनी से नीचे झाँकने पर स्विमिंग पूल दिखता था। आज झाँका, तो पूल में वो दिखा। पानी में पैर डालकर कुछ पढ़ रहा था। मैं थोड़ी देर तक उसे देखती रही। उसने ऊपर मेरी ओर देखा। शायद उसे आभास हो गया था, कि कोई उसे देख रहा है। एक तो इतनी दूर; ऊपर से बढ़ी हुई घनी दाढ़ी मूँछ के कारण, पता नहीं चला कि वो मुझे देखकर मुस्कुराया या नहीं; लेकिन हाथ ऊपर उठाकर पुकारना स्पष्ट था।
मैंने जर्मन में उसे hello कहा, उसने हिंदी में नमस्ते कहा।
दो अलग-अलग भाषा बोलने वाले; संवाद की सम्भावना को बढ़ाने के लिए एक दूसरे की भाषा सीखने लगते हैं। मैं जर्मन शब्द सीखने लगी थी; उसे तो पहले से टूटी-फूटी हिंदी आती थी।
उसने कहा, कल सपने में समंदर उसके कमरे में आया था; फिर रुक कर पूछा, ‘‘क्या तुमने कभी बच्चों की कार्टून मूवी doremon देखी है?’’
‘‘नहीं, क्यूँ?’’
‘‘उसमें doremon एक रोबोटिक cat है; उसके पास कई तरह के गैजेट्स हैं; एक गैजेट तो ऐसा है, कि वो जब चाहे, समंदर को अपने घर बुला सकता है।’’
‘‘काश! वो गैजेट मेरे पास होता।’’ उसकी आवा़ज में फिर से निराशा थी; बेइंतहा निराशा।
‘‘क्या तुमने समंदर से अलग दुनिया देखने की कोशिश की है?’’ मेरा लहजा शायद थोड़ा बे़जार था, इसलिए उसने पास रखे रेड वाइन का गिलास उठाते हुए कहा, ‘‘समंदर बहुत विशाल है Pia.''
मुझे कुछ डूबता सा लगा।
‘‘red wine पियोगी?’’ उसने बात बदलते हुए पूछा था।
‘‘मुझे red wine ख़ून जैसा लगता है; इंसानी ख़ून।’’ मैंने तल़्ख लहजे में कहा।
‘‘इसीलिए तो मुझे पसंद है।’’ इस बार उसकी उसकी आवा़ज बहुत तल़्ख थी।
मैंने उसे अपनी पसंद और नापसंद कभी नहींr बताया; लेकिन जब दो लोग दोस्त बनते हैं, तो एक दूसरे की पसंद, बातों ही बातों में जान लेते हैं; जैसे उसने जान लिया था, कि मुझे कॉ़फी बहुत पसंद है; इसलिये वो मुझे फ़ूड लव़र्ज लेकर आया था।
अच्छा; बातों ही बातों में अभी-अभी मैंने उसे दोस्त कहा, तो एक बात जान लीजिये... जिन रिश्तों के नाम नहीं होते, उन्हें दोस्ती का नाम दे दिया जाता है ।
ज़्यादातर लोग, जिन्हें हम दोस्त कहते हैं, वे दोस्त नहीं होते हैं; कुछ और होते हैं, या कुछ नहीं होते हैं।
खैर... मैं उसके साथ यायावर बनती जा रही थी। घुमक्कड़ प्रवृत्ति की नहीं थी, लेकिन मेरा मन शुरू से बंजारा रहा है; एक जगह टिकता नहीं था; हमेशा से बेहतरी की तलाश में भटकता रहा है। आजकल भी अडोल़्फ के साथ भटक रही हूँ, क्यूँकि ये कहानी मैं अपनी पिछली कहानियों से बेहतर लिखना चाहती हूँ।
food lovers के गंदे पांड में लाल,पीले, हरे और ब्लू रंग की मछलियाँ देखकर वो मचल गया। ‘‘मुझे food lovers की ये रंग बिरंगी मछलियाँ बहुत पसंद हैं।’’ उसने बच्चों जैसे ख़ुश होकर कहा।
‘‘हाँ, और इसलिये तुम मुझे कॉ़फी के बहाने से यहाँ ले आये।’’
‘‘तुम्हें तो यहाँ कॉ़फी के लिये लेकर आया हूँ, लेकिन मैं इन मछलियों के लिये आया हूँ।’’ वो गंदे पानी के पांड में हाथ डालकर बहुत देर तक मछलियों और कछुओं से खेलता रहा। जब भी कोई मछली उसे छू लेती, वो खिलखिलाकर हँसने लगता।
अचानक ही उसने कहा, ‘‘ज़रा देखो! कितने गंदे पानी में ये रहते हैं, लेकिन इन्होंने अपना रंग नहीं छोड़ा है; जबकि हम इंसान, गंदगी के साथ जीते हुए कुछ दिनों में ही गंदे हो जाते हैं।’’
मैं यहाँ इससे पहले भी कई बार आई थी, लेकिन इन मछलियों के बारे में कभी इतना नहीं सोच पाई थी; हाँ पिक्चर लेकर सोशल मीडिया पर अपलोड ज़रूर कर दिया था।
उसका चेहरा देखने लगी। अडोल़्फ की सोच, उसे सबसे अलग और बेहतर बनाती थी।
लेकिन उसकी बेहतरी में निराशा भरी अजीबीयत थी; उसकी हँसी में बारिश में भीगी हुई मिट्टी जैसा गीलापन था, और आँखों में नमी।
‘‘मैं भी बहुत गंदा हूँ।’’
‘‘तुम गंदे हो?’’ मुझे आश्चर्य हुआ था।
‘‘हाँ बहुत गंदा; लेकिन तुम इस मछली जैसी हो।’’ उसने पांड से एक स़फेद रंग की मछली को निकालकर मुझे दिखाते हुए जर्मन में कहा ‘‘Fromm - Pious - Pia!’’
‘‘क्या तुम मुझे अपने गंदे बनने की कहानी सुनाओगे?’’ मैंने उसकी आँखों में आँखें डालकर संजीदगी से पूछा।
वो थोड़ी देर तक मुझे वैसे ही देखता रहा; फिर मुँह फेरकर कहा, ''du wirst mich hassen!''
इंसान जब दिल की गहराई से बोलता है, तब अपनी मातृभाषा में बोलता है। उसने जर्मन में कहा था, ‘‘तुम मुझसे ऩफरत करने लगोगी।’’
‘‘मैं इतनी आसानी से किसी से ऩफरत नहीं करती।’’
‘‘मेरे बुरे बनने की कहानी भी आसान नहीं।’’
‘‘मुझे मुश्किलों के साथ रहना अच्छा लगता है।’’
‘‘किसी और दिन; यहाँ नही... किसी एकांत में; जहाँ तुम मेरे शब्द में घुले दर्द भी सुन सको।’’
‘‘य़कीन मानो, जिस दिन बोलोगे, उस दिन तुम्हारा दर्द, तुम्हारी आवा़ज से अलग होकर कहीं दूर चला जायेगा।’’
कुछ दर्द हमसे दूर नहीं होते; दर्द से हम दूर रहते हैं।’’
‘‘मेरा दर्द मेरे साथ जायेगा जानेमन।’’ खोखली हँसी के साथ उसने अपनी बात ख़त्म की।
मेरी कहानी अपनी ऱफ्तार से आगे बढ़ रही थी, और आजकल लगने लगा था, ये जल्द ही पूरी हो जायेगी; कि एक दिन उसने कहा, कल वो जर्मनी जा रहा है। अचानक ऐसा लगा, जैसे किसी ने सबकुछ देकर, फिर वापस छीन लिया हो, कि इस पर तुम्हारा ह़क नहीं।
मेरा मन कह रहा था उसे रोक लूँ; लेकिन क्या कहकर रोकती...! कोई जहनी वजह नहीं थी।
उसके जाने के बाद फिर से मेरी कहानी अधूरी रह गई, और मैंने ये मान लिया, कि कुछ कहानियों की क़िस्मत में मुकम्मल होना नहीं लिखा होता।
उसे अधूरा ही छोड़, मैं दूसरी कहानी लिखने लगी; मासूम बच्चों की कहानी, उनके अकेलेपन की कहानी। अकेले बच्चे बहुत अकेले होते हैं, और उनका अकेलापन, बहुत मीठे chocolate भी दूर नहीं कर सकते।
बच्चों की कहानी लिखने के लिये आजकल मैं कार्टून मूवी देखने लगी थी... ख़ास कर डोरेमोन; लेकिन उसके पास ऐसा कोई गैजेट नहीं था, जो अडोल़्फ को वापस बुला सके, और मेरा उपन्यास पूरा करा सके।
इसी बीच डाक से Sidney Sheldon की एक नॉवल मिली। हालाँकि tell me your dream मैं पहले भी दो बार पढ़ चुकी थी, लेकिन पता नहीं इस किताब में ऐसी क्या ख़ास बात है, कि अडोल़्फ ने मुझे जर्मनी से भेजा... सोचकर फिर से पढ़ने लगी।
मुझसे यहीं कह देता तो मैं ख़रीद लेती; या वो ख़ुद मुझे यहीं दे सकता था; जर्मनी से भेजने का क्या मतलब है। मैंने नॉवल को उलट-पुलटकर कई बार देखा; कुछ ख़ास लिखा हो, जो दो बार मेरी ऩजरों से ओझल रहा; लेकिन निराशा हाथ लगी। फिर दिमा़ग, नॉवल के नाम पे अटक गया... tell me your dream.
मेरे ह़ज्बंड ने पहला गि़फ्ट, ‘मैंने प्यार किया' मूवी की डी वी डी दी थी, जिसका नाम मात्र ही प्रासंगिक था। तो क्या अडोल़्फ ने tell me your dream देकर, मुझसे मेरा ड्रीम पूछा है।
नहीं, नहीं; अडोल़्फ और मेरी मित्रता अभी इतनी गहरी नहीं हुई है, और न ही कभी हमने सपने के बारे में कोई बात की है। असल में, मैं सपने को पूरा करने में बिलीव नहीं करती। मेरा मानना है कि सपने के पीछे मत भागो... सपने बदल लो। अक्सर हम stupid सपने के पीछे भागते रहते हैं, जबकि कोई स्मार्ट सपना हमारे पीछे होता है, और हम उसे ऩजरअन्दाज करते हैं।
मैंने भी नॉवल के नाम को ऩजरअन्दा़ज करके उसे पढ़ना शुरू किया। शुरू के कुछ पन्नों के बाद ही मुझे Ashley और Adolf  एक दूसरे से जुड़े लगे... आपस में connected. कुछ तो था, जो उन दोनों को जोड़े हुए था। जैसे जैसे मैं आगे पढ़ती गई, वैसे-वैसे मुझे अडोल़्फ का हर बार अलग होना Ashley के MPD (multiple personality disorder) जैसा ही लगा। कभी Alette की तरह हार्स, तो कभी Toni की तरह सौम्य और शांत।
     Ashley का बचपन में यौन शोषण हुआ था, और शोषण करने वाले उसके अपने पिता थे, जिसका पता उसे कहानी के अंत में मालूम होता है। एक ओर उसके पिता उसका यौन शोषण करते हैं, तो दूसरी ओर उसकी माँ उससे घृणा करती है। इस घृणा और घृणित प्रेम से उसके अंदर का ग़ुस्सा और विद्रोह Toni  के रूप में बाहर निकलता है, जिसे पुरुषों से ऩफरत है। वहीं Alette उसका डरा सहमा और शर्मिंदा रूप है। Alette अक्सर Toni के ग़ुस्से को शांत करने की कोशिश करती है।
शायद मैं समझ गई थी, कि अडोल़्फ ने मुझे ये नॉवल क्यूँ भेजा; लेकिन उसने तो कभी किसी बात का ज़िक्र नहीं किया।
हाँ याद आया; एक बार उसने कहा था, उसके ग्रांड फ़ादर उससे बहुत प्रेम करते थे; और मैंने बहुत ज़्यादा इंट्रेस्ट नहीं लिया था।
मुझे उसकी story of evil का पता चल गया था; लेकिन evil का समंदर से क्या सम्बंध! बहुत सोचने पर भी मैं किसी नतीजे पर नहीं पहुँच पाई।
उसने कहा था, मैं उससे ऩफरत करूँगी; लेकिन जैसा कि आम तौर पर होता है, मुझे उस पर दया आ रही थी।
उस दिन मैं लगभग दो ढाई महीने बाद अकेले ही कॉ़फी पीने food lovers चली गई। वहाँ के माहौल में एक अजीब सा सुकून मिलता है... एक अलग तरह की शांति है, जिसकी खोज में लोग हिमालय और जंगलों में भटकते हैं।
ऐसी शांति, ऐसा सुकून... एक कप कॉ़फी; और मेरी उँगलियाँ लैपटॉप के की-बोर्ड पर दौड़ने लगती हैं। कॉ़फी पीने से अगर मूड अच्छा होता है; तो फ़ूड लवर्ज में बैठकर कॉ़फी पीने से मूड बहुत अच्छा हो जाता है।

उस व़क्त मेरा मूड भी बहुत अच्छा था, जब अडोल़्फ ने hello कहा। कोई और दिन या व़क्त होता, तो मुझे बहुत ग़ुस्सा आता; लेकिन जैसा कि मैंने कहा, मेरा मूड बहुत अच्छा था, इसलिए मुझे ज़रा भी ग़ुस्सा नहीं आया।
अंतिम बार मुझे उसपे दया आई थी; और दया जैसी भावना टिकाऊ नहीं होती है; दया व़क्ती होती है।
सच पूछिए तो अब वो मेरे ़जेहन से निकल चुका था, क्यूँकि मेरी कहानी पूरी हो चुकी थी। आप सोच रहे होंगे, क्या उसका जर्मनी जाना और मेरा उसकी सच्चाई जानना ही कहानी का अंत है, तो आप ग़लत समझ रहे हैं; उस कहानी को मैंने प्रेम कहानी में परिणत कर दिया।
लेकिन कहानी और ज़िन्दगी में बड़ा फ़र्क होता है दोस्तों! कहानी में अंत में सब ठीक हो जाता है; ज़िन्दगी में कुछ ठीक नहीं होता। काश! ज़िन्दगी भी कहानी सी होती; edit करने का आप्शन होता, तो मैं अडोल़्फ की कहानी से ग्रांड फादर का प्रेम edit out कर देती, और अपनी ज़िन्दगी से उसे; लेकिन वो मेरे सामने बैठा था और बुझे हुए स्वर में पूछ रहा था, ‘‘तुम मुझसे ऩफरत करने लगीं न! ‘‘ऩफरत नहीं, I feel pity on you.; मुझे तुमपे तरस आ रहा है।’’
‘‘pity क्यूँ?’’
मैं अब तक ग़ुस्सा नहीं करने का दिखावा कर रही थी, लेकिन असलियत बाहर आ ही जाती है; और मेरी असलियत बाहर आ गई थी।
‘‘क्यूँकि तुम फट्टू हो, प्राब्लम़्ज से भागते हो; जानते हो, औरतें भरोसा करती हैं कि पुरुष ही उन्हें प्राब्लम़्ज से बचायेगा; लेकिन तुमपे कौन भरोसा करेगी? तुम तो बिना बताये भाग जाते हो... भगोड़े कहीं के।’’
अगर आप पढ़ते-पढ़ते कहानी में खो गये, और ये भूल गए कि अडोल़्फ जर्मन है, तो बता दूँ कि उसकी हिंदी vocabulary बहुत छोटी है, जिसमें अधिकांश शब्द औपचारिक हैं। फट्टू और भगोड़े जैसे शब्द मैं यहाँ लिखने के लिये इस्तेमाल कर रही हूँ, जबकि मैंने उसे escapist abscond और coward कहा था।
‘‘तुम अपने आप को प्रॉब्लम तो मत कहो; तुम तो हर समस्या का समाधान हो।’’ उसने हँसते हुए कहा। मसखरी पर उतर आया था वो।
लेकिन उस व़क्त कॉ़फी पीने के बावजूद मैं मसखरी के मूड में नहीं थी, ‘‘ख़ुद से भागने वाले ही प्रॉब्लम होते हैं।''
‘‘मैं भागता नहीं, डील करता आ रहा हूँ बचपन से; ग्रांड फ़ादर और उनके बिस्तर से; पापा और उनकी ऩफरत से।’’ ये कहते-कहते उसकी आवा़ज गीली हो गई, और मैं अपराधबोध से भर गई।
‘‘आज इंसानी ख़ून नहीं पियोगे?’’ मैंने बात बदलने की कोशिश की।
‘‘अब तुम भाग रही हो।’’ उसने ग़ुस्से से कहा। शायद उसके अंदर की toni जागृत हो गई थी, ‘‘मेरी मॉम भी भागती थी; और एक दिन तो मुझे अकेला छोड़कर हमेशा के लिए भाग गई।
क्या विदेशी मॉम भी ऐसी situation को avoid करती हैं! मैं सोचने लगी थी।
‘‘मेरी भारतीय मॉम कभी जर्मन नहीं बन पाई, और न मुझे जर्मन बेटा बना पाई।’’ उसने जैसे मेरे मन की बात सुन ली थी।
उसकी मॉम भारतीय थी; मेरी तरह। दरख़्त कहीं चले जायें, जड़ें जमीन से जुड़ी रहती हैं; और उसकी ज़मीनी मॉम, ऐसी situation को avoid करती थी।
फ़िलहाल, अडोल़्फ ने avoid किया, ‘‘क्या तुमने Azania Lutheran चर्च के बारे में सुना है?’’
‘‘ज़्यादा नहीं, बस इतना कि जर्मन मिशनरीज ने बनाया है।’’
‘‘हाँ... मैं अक्सर वहाँ कऩ्फेशन के लिए जाता हूँ।’’
मेरा अनुमान है, जब toni कुछ ग़लत करती है, तब Alette कऩ्फेशन करती है; शायद वो यही कहना चाहता था।
दादी-नानी की कहानी वाली परियाँ अब एंजल बन गई हैं। पहले बच्चे बहल जाते थे, अब अपने दुःख से स्वयं ही लड़ना पड़ता है। अडोल़्फ अपने दुःख से लड़ रहा था। उसने कहा, मैं एंजल हूँ; मैं छड़ी घुमाकर उसका दर्द दूर नहीं कर सकती; लेकिन जब वो मुझसे बात करता है, उसका दर्द उससे दूर हो जाता है।
गरमी का मौसम अपने आखिरी दिन गिन रहा था, और बारिश के मौसम का आगमन, हल्की-हल्की बूँदों के साथ हुआ था। भीनी-भीनी मिट्टी की ख़ुशबू से घर महक उठा था। अचानक ही मुझे अडोल़्फ का ख्याल आया। अडोल़्फ का खयाल आते ही, समंदर की यादों के हाई टाइड में मेरा मन सौतेला हो गया।
मैं slip way की तऱफ निकल गई। समंदर का इतना ख़ूबसूरत ऩजारा और कहाँ हो सकता है इस व़क्त! हाँ, ओशन रोड पर नमकीन साँसें, और नारियल पानी लोगों को बहुत भाता है; लेकिन मुझे तो पानी के साथ पानी का कॉम्बिनेशन बहुत अजीब लगता है।
slipway में coffee के साथ मैं तू़फानी लहरों को देख रही थी। अडोल़्फ ठीक कहता है,  high tide की लहरें समन्दर का ग़ुस्सा ही हैं। उसपर पानी की बूँदें... ऐसा लग रहा था मानो ये बूँदें समंदर में छेद कर उसके भीतर चली जाएँगी, और समंदर का ग़ुस्सा शांत हो जायेगा; लेकिन उन बूँदों की क़िस्मत में टूटकर बिखरना ही लिखा था।
मैं अपने बिखरे हुए शब्द समेट लेना चाहती थी; अपनी उस कहानी का अंत बदल देना चाहती थी; लेकिन मुझे समझ में नहीं आ रहा था, कि क्या लिखूँ। मेरा लैपटॉप; जिस तरह लेकर आई थी, अब भी उसी तरह टेबल पर मेरे सामने पड़ा, मुझे चिढ़ा रहा था। मेरा मन कर रहा था कि आधे एप्पल को पूरा खा लूँ... कि हुक्का पीती हुई एक लड़की ने मेरे मन के लगाम कस लिए। उसके बाल बहुत लम्बे थे; शायद घुटनों तक लम्बे, जिन्हें उसने chair के बैक के पीछे रखा था, इसलिये मुझे सि़र्फ उसके बाल ही दिखाई दे रहे थे, जो बहुत घने और सुलझे हुए थे, लेकिन नीचे आते-आते वे बाल उलझने लगे थे; सारी सुलझी हुई सिराएँ आपस में उलझ गई थीं।
बारिश थम गई थी। सुहाने मौसम की हसीन शाम धीरे-धीरे अँधेरे की गिऱफ्त में जाने लगी थी। अँधेरी शाम का कालापन, मेरे काजल की तरह फैल रहा था, कि सामने से अडोल़्फ आता दिखा।
उसके दिखने से मुझे कोई ख़ास ख़ुशी नहीं हुई, लेकिन वो बहुत ख़ुश दिख रहा था। शायद आज से पहले मैंने उसे इतना ख़ुश कभी नहीं देखा था... और उसकी ख़ुशी देखने के चक्कर में उसने मुझे देख लिया।
     ‘‘hey! wie geht es dir!’’ उसने जर्मन में पूछा, कैसी हो? आज फिर आवा़ज उसके दिल की गहराई से आ रही थी; और दिल की गहराई से इंसान तभी बोलता है, जब या तो वो बहुत दुखी होता है, या बहुत ख़ुश; और अडोल़्फ बहुत ख़ुश था।
‘‘मैं ठीक हूँ... तुम बेहद ख़ुश लग रहे हो।’’
‘‘हाँ, मैं बहुत ख़ुश हूँ; तुम सि़र्फ ठीक क्यूँ?’’
‘‘बस यूँ ही... शायद मेरे बाल बहुत उलझ गये हैं।
‘‘हाँ, समंदर की नमकीन हवाएँ बालों के लिये अच्छी नहीं हैं; देखो मैंने अपनी दाढ़ी की कितनी ख़ूबसूरत चोटी बनाई है।’’ कहकर उसने अपनी दाढ़ी की चोटी मेरी तऱफ बढ़ा दी।
मुझे उसकी हरकत पर बहुत हँसी आई, और मैं बेसा़ख्ता हँस दी।
‘‘तुम कऩ्फ्यू़ज बिलकुल अच्छी नहीं लगती; हमेशा हँसती रहो; तुम्हें पता है न, तुम एंजल हो!’’ बहुत गम्भीर था वो।
मैंने उसकी बात का कोई जवाब नहीं दिया, बस उठकर खड़ी हो गई। ‘‘अब चलना चाहिये।’’ मेरे पीछे वो भी उठ गया था।
आज सब उलटा था। वो ख़ुश था, और मैं उदास... शायद उसका रोग मुझे लग गया था।
कुछ दिन तक तो बहुत अच्छा लगा। मेरी निराशा, मेरी उदासी; सब... और इस उदासी में मेरी क़लम ख़ूब चली; मैंने क़िस्से से क़िस्से बुन डाले, कहानी दर कहानी लिख डाली; लेकिन उस कहानी का अंत मुझे खाये जा रहा था। न वो बता रहा था, न मैं पूछ रही थी... और इस तरह रोगी बनके जीना भी मुझे ढोंग जैसा लग रहा था।
मैंने तय कर लिया कि आज उस कहानी का ctrl + alt + delete एक साथ। सोचा एक आ़खरी बार पढ़ लूँ। food lovers में उसने कहा, वो बहुत गंदा है, और बाहर निकलने पर वहीं बाहर, हाथ से बना एक बहुत ते़ज चा़कू लिया था उसने।
मैंने कहा, ‘‘बहुत शार्प है ये।''
‘‘हाँ, मीट काटने के लिये।’’ उसने रहस्यमय लापरवाही से कहा।
उस वा़कये को मैं भूल जाती; अगर आज फिर से इस कहानी को नहीं पढ़ा होता; और य़कीन मानिये, ये याद आते ही मेरे रोंगटे खड़े हो गये। तो क्या अडोल़्फ भी Toni की तरह ही castrated और मर्डर करता है? हाँ, ये भी यही करता होगा, तभी उसने कहा था... मीट काटने के लिये।
लेकिन नहीं; अडोल़्फ के अंदर का टोनी रूड है; और रूड सि़र्फ बदतमीज होते हैं, ख़ूनी नहीं। लोगों को सही पहचानना भी एक कला है; और इस कला में सभी माहिर भी नहीं होते; मैं भी माहिर नहीं हूँ, लेकिन माहिर से एक पायदान नीचे को आप जो कहते हों, मुझे वही समझ लीजिए!
कई साल सेल़्ज और मार्केटिंग में काम करने की वजह से मुझे इंसानों की सही पहचान करना और बाजारवाद के नियमों पर खरा उतरना, लगभग माहिर होने तक आ गया था।
फिर भी, चा़कू और समंदर दोनों अब भी मेरे लिए रहस्य थे। मैंने अडोल़्फ से कहा, ‘‘क्या हम कहीं एकांत में मिल सकते हैं?’’
अडोल़्फ ने कहा, ‘‘Gilbert की तरह तुम्हें मुझसे प्यार तो नहीं हो गया ?’’
(अब ये Gilbert कौन है, ये सोचने से पहले ही आपको बता दूँ; ये ‘tell me your dream’ वही डॉक्टर है, जो पागलखाने में Ashely का इलाज करते-करते उसके प्रेम में पड़ जाता है।)
‘‘हाँ शायद; कह सकते हो... लेकिन प्रेम को हमेशा प्रेम ही मिले, ये ज़रूरी नही; तुम थोड़ा समय ही दे दो।’’ मैंने भरमाने की कोशिश की थी।
‘‘नहीं लेखिका साहिबा! प्रेम धोखा है; प्रेम के आवरण में आपको आपकी कहानी का अंत चाहिये।’’ वो अब समझ गया था।
‘‘र्मैं sea cliff चलने की तैयारी कर रही हूँ।’’
‘‘समंदर बहुत ग़ुस्से में होगा।’’
‘‘मैं सह लूँगी।’’
‘‘लेकिन तुमने कहा, एकांत में मिलना है।’’
मैं चुप हो गई। वो समंदर को मुझसे बेहतर जानता था।
उसने कहा, कुछ और मत करो, सि़र्फ मेरा इंत़जार करो।
इंत़जार के पल वैसे भी बहुत असहनीय होते हैं। मैं घर में इधर से उधर टहलते हुए सोच रही थी, बात शुरू कैसे करूँगी? क्या सीधा-सीधा पूछ लूँ, या घुमा-फिराकर शब्दों के जाल बुनूँ? लेकिन अगर वो उस जाल में उलझकर रह गया तो फिर!?
मैं कोई मछुआरा तो नहीं।
अभी मैं सोच भी नहीं पाई थी, कि उसका बुलावा आ गया।
वो बहुत बड़ी जीप लेकर आया था; लैंड क्रू़जर की V8, जो उसकी पर्सनैलिटी से बिलकुल मैच नहीं कर रही थी।
मैंने उसके चेहरे की तऱफ देखा। वो बहुत ख़ुश था। ये ख़ुशी मेरे साथ की वजह से बिलकुल नहीं थी, बल्कि जब से वो जर्मनी से आया है, तब से इतना ही ख़ुश है। शायद अपने अंदर के टोनी को दफनाकर आया है, या किसी Allette के दिल में घर कर लिया है।
उसने अपनी जीप slip way के पास खड़ी कर दी।
‘‘यहाँ बहुत धूप होगी अभी, और मुझे टैनिंग हो जायेगी।’’ मैंने दुखी होकर कहा था।
‘‘don't worry! मैं सन प्रूफ अम्ब्रेला लेकर आया हूँ; वैसे भी हम Bongoyo island चलेंगे।
     Bongoyo का नाम सुनकर मैं दुखी नहीं हुई थी, बल्कि डर गई थी। आज weekday में तो एकदम सुनसान होगा वो; और अभी तक ये भी कऩ्फर्म नहीं हुआ है, कि टोनी सि़र्फ रूड है या ख़ूनी; इसलिये तो मैंने थोड़ी भीड़-भाड़ वाली जगह चुनी थी... लेकिन मैंने एकांत शब्द का इस्तेमाल करके शायद ग़लती कर दी थी।
     मैंने अभी ख़ुद को कोसना बंद भी नहीं किया था, कि उसने जर्मन में कहा ''dank fur das Vertrauen ich.'' सच पूछिए तो उस व़क्त उसका जर्मन में बोलना बहुत नागवार गु़जरा। मैंने ग़ुस्से में पूछा, ‘what?’
     ‘‘मुझपे य़कीन करने के लिए शुक्रिया।'' बहुत ही शान्त लहजे में स्माइल के साथ कहा उसने।
     मेरा ग़ुस्सा अचानक शर्म में तब्दील हो गया। एक पल के लिए मुझे ख़ुद से जैसे घृणा हो गयी; और इस शर्म और घृणा वाली स्थिति के मिले जुले भाव में 'yea'  के सिवा कुछ और नहीं बोल पाई, क्यूँकि मैं जानती थी, अगर कुछ ज़्यादा बोला, तो वो मेरे मन के भाव समझ जायेगा।
खैर... इस बार उसने अपनी पर्सनालिटी से मैच करती हुई बोट ली, जबकि मुझे डर लग रहा था, और वो समझ गया।
‘‘डरो नहीं, मैं यही हूँ... समंदर इतना निर्दय नहीं।’’
फिर भी मेरे चेहरे पर डर का पीला रंग उभर गया था; तब दूसरे कोने पर बैठे-बैठे ही उसने मेरा हाथ पकड़ लिया।
‘‘मैं तुम्हें साँप केकड़े को खाने नहीं दूँगा, डरो नहीं।’’
मुझे हँसी और ग़ुस्सा एक साथ आया था। ‘‘मुझे अगर कुछ हुआ, तो तुम्हें पाप चढ़ेगा।’’
‘‘मैं Lutheran चर्च में confess कर लूँगा।’’ उसने ज़ोर से हँसते हुआ कहा।
इस बार मुझे सि़र्फ हँसी आई, ग़ुस्सा नहीं।
हम bongoyo island पर पहुँच गये थे। आसपास क्या, दूर-दूर तक कोई नहीं था। सामने शांत समंदर पड़ा हुआ था। हाँ, पड़ा हुआ ही था। हलचल विहीन समंदर पड़ा हुआ ही मालूम होता है; ठीक वैसे ही, जैसे सोया हुआ कुत्ता, मरा हुआ लगता है।
एक तो मेरा आशंकित मन; ऊपर से मरघट सा माहौल; मेरा दम घुटने लगा था।
लेकिन वो पूरी तैयारी करके आया था। उसने ice बास्केट से ठंढी कॉ़फी निकाली। ठंढे माहौल में ठंढी कॉ़फी... लेकिन अगर कॉ़फी गर्म होती तो, शायद उमस बढ़ जाती, और सचमुच ही मेरा दम घुट जाता।
पहली सिप लेते ही अचानक से मौसम बदल गया। शायद बदला तो मन का मौसम था, लेकिन उसका असर बाहरी मौसम पर भी दिखने लगा था।
सब सुहाना हो गया था। ठंढी कॉ़फी, शांत समंदर, और चुपचाप हम। मैंने ख़ामोशी को, समंदर में एक कंकड़ फेंककर तोड़ दिया। उसने रोका, ‘‘समंदर अभी सो रहा है; और किसी की नींद ख़राब करना ठीक नहीं।’’
‘‘अगर तुमने अंत नहीं बताया, तो मैं सो जाऊँगी; फिर तुम मुझे भी मत जगाना... हाई टाइड आये तो डूब जाने देना।’’
‘‘ये अंत नहीं है।’’
‘‘तो फिर अंत क्या है?’’
एक बात बताओ; क्या अंत ज़रूरी है? और अगर ज़रूरी है तो भला वो अंत क्यूँ नहीं, जो तुम तय करो?’’
‘‘मुझमें इतना साहस नहीं।’’ मैंने संक्षिप्त सा उत्तर दिया।
‘‘हाँ, क्यूँकि तुम सच से भागती हो।’’
‘‘मैं भागती नहीं, डरती हूँ; कुछ अंत बहुत भयानक होते हैं।
‘‘उस त्रासदी जैसा भयानक तो नहीं, जो पूरी कहानी झेलती है।’’ उसकी डूबी हुई आवा़ज मुझे अंदर तक डुबा गयी।
मैंने उसकी आँखों में देखा था। उनमें समंदर का पानी उतर आया था। आज उसने चेहरा नहीं घुमाया। उसकी आँखों के समंदर की लहरें उठकर मेरी आँखों में भी आ गयीं।
उसने मेरी आँखों की कोर का आँसू अपनी उँगली में लेकर कहा, ‘‘इन्हें जाया मत करो; बहुत क़ीमती हैं ये।’’
‘‘ये मेरे नहीं हैं; तुम्हारी आँखों में जो समंदर है, उसके छींटे हैं।’’
‘‘तुम्हें मैं हमेशा ही क़ीमती सौ़गात देता हूँ।’’
‘‘क़ीमत तो उसकी होती है, जिसके बदले हमें कुछ देना पड़ता है; और मैंने तुम्हें आज तक कुछ दिया ही नहीं।’’
‘‘तुम मुझे सुकून देती हो; हमेशा ही।
‘‘मैं तो ख़ुद ही बेचैन हूँ।’’
‘‘क्यूँकि तुम दूसरों की बेचैनी को आत्मसात कर लेती हो।’’
‘‘और मैं ऐसा कैसे कर पाती हूँ।’’
‘‘वो इसलिये, क्यूँकि तुम Fromm हो; तुम्हें Jesus ने भेजा है।’’
‘‘मैं क्रॉस पर नहीं मरना चाहती।’’
‘‘लेकिन जब से तुम मिली हो, मैं चर्च नहीं गया हूँ।’’
‘‘क्यूँकि तुमने शायद कोई पाप नहीं किया होगा।’’
‘‘पाप तो मैं हर रो़ज करता हूँ... तुम्हें अपनी बेचैनी देकर।’’
अब एक बार फिर मैं और वो चुप।
हवा ते़ज हो रही थी। समंदर की छोटी-छोटी लहरें किनारे से मिलकर फिर वापस लौट रही थीं; समंदर ने अँगड़ाई ली थी।
मेरे Grand father अक्सर मुझे कैंडी या कुकी़ज देकर गोद में बिठा लेते थे... मुझे कैंडी से घिन आने लगी। Grand father ने कहा, बच्चों को ये सब बहुत पसंद आता है; मैं बीमार हो गया हूँ... रात में जब सब सो जायेंगे... तब वे मुझे ठीक कर देंगे।
बिस्तर पर, मेरे ऊपर बैठकर वो मेरा इलाज करते थे। मुझे दर्द होता था। मॉम ने कहा, मुझे किसी से नहीं कहना चाहिये। मॉम मुझे अपने साथ सुलाने लगीं, और डैड मुझसे ऩफरत करने लगे।
उस दिन मॉम ने कहा, वो अकेला नहीं छोड़ना चाहती है, लेकिन उसे जाना होगा, क्यूँकि Jesus बुला रहे हैं। Jesus को मॉम की ज़रूरत थी... मुझसे ज़्यादा; और एक दिन डैड अपनी ज़रूरत के लिए दूसरी मॉम ले आये।
अडोल़्फ बच्चों की तरह रोने लगा था। मैं उसे चुप नहीं कराना चाहती थी। अगर वो चुप हो गया, तो फिर ये ख़ामोशी हमेशा के लिए ख़ामोश हो जायेगी।
फिर?’ मैं आगे सुनना चाहती थी।
‘‘मैं उन दिनों tell me your dream पढ़ रहा था। university में छुट्टियाँ चल रही थीं। मैं घर आया था। मेरी स्टेप मॉम किचन में पैन केक बना रही थी। मेरा छोटा भाई, Grand father की गोद में था, और वे उसे कैंडी खिला रहे थे।
उसी व़क्त मेरे अंदर टोनी का जन्म हुआ। alette टोनी को समझाता रहा, लेकिन टोनी पर तो जैसे ख़ून सवार था। उस रात जब सारे सो गये; टोनी उठा, और उसने Grand father र्को desex  कर दिया।
‘‘और फिर टोनी की तरह मर्डर...’’ मैंने डरते हुए पूछा।
‘‘नही, ich wolte, dass er leidet.’’ उसने जर्मन में कहा था। उसकी आवा़ज उत्तेजना से भरी हुई थी, वो आवेशित था। फिर उसने कहा, ‘‘ मैं उसे दु:ख भोगते हुए देखना चाहता था।''
‘‘लेकिन तुम भी तो दर्द सह रहे हो।’’
‘‘हाँ, लेकिन उस दुःख से बेहतर है, जो पहले सहे; और इस दर्द में एक सुख है... saviour बनने का सुख; I saved my brother.’’
लहरें ते़ज होने लगी थीं, समंदर धीरे-धीरे बड़ा होता जा रहा था; शायद जाग गया था। मुझे डर लगने लगा था। मेरा डर समंदर से ज़्यादा विशाल हो रहा था। साँप की तरह फ़न फैलाये वो पास आता जा रहा था, और मेरा डर काला होता जा रहा था, और मैं जड़ हो गई थी।
मैं कुछ कहती, इससे पहले ही उसने मेरा हाथ पकड़कर कहा, ‘‘चलो; मैं तुम्हें साँप का ग्रास नहीं बनने दूँगा।''
मैं जैसे नींद से जागी थी, ‘क्या?’
‘‘तुम क्या वा़कई सो गई थी?’’
‘‘नहीं; अब मैं बेचैन नहीं।’’
‘‘तुम्हारी कहानी का अंत मिल गया तुम्हें?’’
‘‘हाँ, शायद।’’
‘‘लेकिन तुम वो लिखना, जो तुम्हें ख़ुशी दे।’’
‘‘मुझे ख़ुशी इस बात की है, कि अब तुम आ़जाद हो।’’
‘‘वो चा़कू मैंने इसी समंदर में फेंका था।’’
‘‘क्या वा़कई!’’
‘‘हाँ; मेरी नई मॉम उसी से सब्जियाँ काटती थी; और मैं जब भी खाना खाता, मुझे उल्टी आती थी; इस बार मैं नई मॉम को नई चा़कू देकर, जर्मनी से वो चा़कू ले आया था, समंदर में दफ्न करने के लिये।
छोटी सी बोट हिचकोले खा रही थी। मैं एक बार फिर से डर गई। उसने दोनों हाथों से मेरे हाथ थाम लिये थे। उसके हाथ बहुत मुलायम थे। इन्हीं ना़जुक हाथों से उसने चा़कू थामा होगा। मैंने उसके हाथ कसके पकड़ लिए। वो शायद समझ गया था। उसने मुझे एक स्माइल दी।
बोट किनारे पर पहुँच गई।
उसने अपने वॉलेट से एक तस्वीर निकालकर देते हुए कहा, ‘‘मेरी फ़ैमिली''
उस तस्वीर में अडोल़्फ के साथ एक बु़जुर्ग महिला, और एक जवान लड़का था। मैं समझ गई कि अडोल़्फ, तस्वीर में अपनी नई मॉम और भाई के साथ था।
‘‘तुमने भाई को देखा?’’
‘‘हाँ देखा; तुम अपनी मॉम पर गये हो शायद।’’
उसने तुरंत ही एक और तस्वीर मुझे दी, ‘‘ये मेरी मॉम और मेरे पिता की है।’’
‘‘तुम अलग हो; सबसे अलग।’’
‘‘हाँ, मैं अलग हूँ; क्यूँकि मैंने दुःख सहे हैं... लेकिन अपने भाई को बचा लिया।’’
‘‘हाँ; तुम्हारा दर्द ही उसकी दवा बना।’’
‘‘लेकिन अब मैं दु:ख से आ़जाद हो गया हूँ।’’
''because you had been sent to save me out of grave (क्यूँकि Jesus ने मुझे नर्क से निकालने के लिये तुम्हें भेज दिया)।
मैं उसकी आँखों में देखना चाहती थी; लेकिन उसकी ऩजरें रास्ते पर थी। शायद कहानी का अंत वो नहीं था, जिसके लिये मैं बेचैन थी।
‘‘तुम्हारे पिता नहीं हैं फ़ैमिली पिक्चर में!’’
‘‘वो अब इस दुनिया में नहीं।’’
‘‘मुझे दुःख है।’’
‘‘मुझे नहीं; क्यूँकि अब हम हैप्पी फ़ैमिली हैं।’’
‘‘बधाई हो।’’
शुक्रिया।’ हिंदी में कहा उसने।
‘‘vergnugen’’ मैंने जर्मन में, ‘मुझे ख़ुशी हुई’, कहा।
मैंने कहानी का अंत बदल दिया। मैंने वैसा ही लिखा, जैसा घटा था। अगर वा़कई में अंत ऐसा हो, तो अंत ही बेहतर है... कुछ कहानियों के अंत ख़ूबसूरत होते हैं।
‘‘लास्ट कॉ़फी?’’ अंतिम बार कहवा में कॉ़फी का पहला सिप लेते हुए उसने पूछा था।
‘‘हाँ लास्ट; शायद।’’
‘‘क्या तुम कभी जर्मनी नहीं आओगी?’’
‘‘आऊँगी भी तो तुम्हें कहाँ ढूँढ़ूँगी; तुम तो दार आओगे न?’’
‘‘हाँ; लेकिन क्या तब भी तुम यहीं मिलोगी?’’
‘‘हाँ; शायद; नहीं भी... जानते हो न, ज़िन्दगी बंजारों सी है।
‘‘भटककर कहीं दूर निकल जाओ, तो रुककर पीछे देखना; जो पीछे छूट जाता है न, वही ज़िन्दगी है।’’ वो फ़िलॉसॉ़फिकल हो रहा था।
‘‘जो पीछे छूट जाता है, वो यादें होती हैं; और यादों को जिया जा सकता है, यादों में लौटा नहीं जा सकता है।’’ मैंने उसी के लहजे में जवाब दिया।




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रचनाकर परिचय 


प्रियंका ओम
जन्म तिथि - 5 मई 
email - pree.om@gmail.com 
रहवास - तंज़ानिया (अफ्रीका ) 
स्थाई पता - Jamshedpur ( Jharkhand )

प्रकाशित किताबें :- "वो अजीब लड़की  (कहानी संग्रह, जनवरी 2016 )
 “मुझे तुम्हारे जाने से नफ़रत है “ ( कहानी संग्रह जनवरी 2018 ) 

"धूप के रंग  (19 July 2014 ) “ साझा कविता संकलन में दस कविताओं का सहयोग !

"लफ़्ज़ों से परे ( लघु कथा संकलन )” अतिथि लेखण सहयोग के अतिरिक्त विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में कहानी / लेख का प्रकाशन ।















4 comments:

  1. कहानी हालाँकि शाब्दिक फिज़ूलखर्ची की शिकार है, कुछ चमत्कृत करने की कोशिश भी है, फिर भी पाठक अंत तक पहुँचना चाहता है यही इस कहानी की सफलता है। बीच में अंग्रेज़ी के शब्दों का रोमन में लिखा जाना खूब अखरता है... पर आप कुछ भी करने को स्वतंत्र हैं। बधाई।

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  2. हिंग्लिश से बचो भाई। हिंदी खतरे में है।

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  3. एक बढ़िया कहानी! कहानी में बेवजह के विवरण कहानी को लंबा बनाते हैं, एक कुशल संपादन इस कहानी को बहुत शानदार बना सकता है।

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  4. अच्छी कहानी। अंत शानदार। कुछ संपादित कर और अच्छी बनाई जा सकती है।

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