कुरु वंश की आदि विद्रोहिणी- शर्मिष्ठा



राजीव कुमार प्रशासनिक अधिकारी हैं और निरंतर लेखन-पठन में सक्रिय हैं। इनकी कविताओं और समीक्षा ने इधर सबका ध्यान आकृष्ट किया है। उन्होंने युवा लेखिका अणुशक्ति सिंह के पहले मिथकीय उपन्यास ‘शर्मिष्ठा’ पर बहुत ही सुचिन्तित समीक्षा लिखी है। पुस्तक वाणी प्रकाशन से आई है।
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युवा लेखिका अणु शक्ति सिंह का प्रथम उपन्यास "शर्मिष्ठा" उपन्यास लेखन के परंपरागत विधान से ही विद्रोह है। इतिहास और मिथक के उपेक्षित और कतिपय कम चर्चित पात्रों को केंद्र में रखकर वृहद आख्यान का निर्माण अपने आप में बड़ी चुनौती होती है, जिसे लेखिका ने स्वीकार किया है और इसके निर्वहन की अद्वितीय कोशिश की है। इतिहास, मिथक या लोक मानस में रची बसी कहानियां लेखक से साहित्य कर्म की प्राथमिक प्रतिबद्धता का आवाहन करती हैं। रूढ़ प्रतीकों और पात्रों की सहस्त्राब्दियों से सुनाई जाती रही कहानी से अपने अभीष्ट पात्र के लिए प्रसंगों का चयन करना और उनका कथानक में माला की तरह गूंथने और सुगंध और सौंदर्य बचाए रखने के उपायों का उचित प्रयोग कर पठनीयता और मुख्य नायिका से हृदय से जुड़े रहने का मजबूत आग्रह लेखिका ने तन्मयता से साध लिया है।

शर्मिष्ठा, जो कथा में क्षत्राणी असुर कुल राजकुमारी और नायिका रूप में परिकल्पित है, पात्र रूप में पुरुषोचित शौर्य, अतुल युद्ध कला की निपुणता, व्यावहारिक राजकीय कार्यों की समझ, मुश्किल घड़ी में वीरोचित निर्णय लेने की क्षमता और कलाप्रियता का अद्भुत संगम है । शर्मिष्ठा अपने निर्णय लेने की क्षमता और त्याग करने का शिखर प्राप्त का लेने की तपस्या के कारण वास्तविक और न्यायोचित्त श्रद्धा की अधिकारिणी बनती है। उपन्यास में अंकित घटनाएं एवम प्रसंग शर्मिष्ठा के जीवन के आत्मीय एवम सकारात्मक पक्षों को उभारने में कामयाब हुए हैं।

रूढ़ मिथकीय कहानी - प्रसंग से विचलन पात्र की मानसिक बनावट को कसने का काम करता है। यह विचलन और प्रयोजन युक्त लेखिका का आग्रह उपन्यास की सीमा नहीं उसकी ताकत है। स्वाबलंबी नारी, शिशु का भविष्य निर्माण, आत्म सम्मान से समझौता नहीं, प्रेम और स्मृति - संरक्षण का अतिशय आग्रह , कला के चित्रकारी स्वरूप का भव्य निरूपण उपन्यास का पार्श्व - संगीत है जो महज सुमधुर रागिनी प्रारंभ से अंत तक नहीं बिखेरता बल्कि कथानक को नए आयाम देता है।

कच देवयानी प्रसंग, देवयानी ययाति प्रसंग, शुक्राचार्य वृषपपर्वा प्रसंग, शर्मिष्ठा का परंपरा और सत्य से विद्रोह ग्रंथ सम्मत प्रामाणिक और तर्कपूर्ण व्यौरे हैं जो उपन्यास को सशक्त बनाते हैं। लेखक की प्रतिबद्धता, इच्छा और संकल्प के साथ जिस कलात्मक प्रभाव की अपेक्षा एक ऐतिहासिक और मिथकीय उपन्यास में होती है "शर्मिष्ठा" में उसका पूर्ण निर्वहन हुआ है। लेखिका की रचनात्मक दृष्टि में कहीं विचलन नहीं आता और संक्षिप्त होना कथानक के विस्तृत फलक के बावजूद उपन्यास की आत्मा है। वृहदकाय कथानक को उसके मौलिक संरचना में अराजक होने से बचाने का लेखिका अणुशक्ति सिंह का प्रयास सराहनीय है।

पात्र

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शर्मिष्ठा इस उपन्यास की नायिका है, जिसे दो सहायक पात्र जो इतिहास और मिथक के महानायक हैं और एक खलनायिका देवयानी, जो मिथकों में हजारों साल से सौन्दर्य की अधिष्ठात्री है, शर्मिष्ठा को बड़ी नायिका के रूप में कथा जगत में प्रतिस्थापित करते हैं। लेखिका ने देवयानी और शर्मिष्ठा की लोकमानस में रूढ़ आत्मीय और विश्वसनीय छवियां बहाल रखी हैं। एक सबसे प्रसिद्ध नृत्यांगना हैं तो दूसरी धनुर्विद्या की निपुण सुंदर राजकुमारी। दोनों प्रसिद्ध नारी पात्रों के सौन्दर्य से जुड़े सारे मिथकों को लेखिका स्वीकृति देती चलती हैं, सौन्दर्य के उपालंभ से शर्मिष्ठा के किरदार में कई जगह अचानक करुणा रुपायित करने में लेखिका ने बड़ी उपलब्धि हासिल की है । उपन्यास में नारी के विभिन्न रूपों और स्त्री मर्यादा से जुड़े बिंबों का बाहुल्य है।

शर्मिष्ठा का निर्णय जहां उसके किरदार को बड़ा करता है वहां उसके पिता और राजा वृषपर्वा के चरित्र को छोटा "पिता श्री असुर कुल का पितृ और मातृ ऋण है मेरे ऊपर. यह मेरा सौभाग्य है कि मुझे आज उस ऋण का कुछ अंश चुकाने का अवसर मिला है. इस कटार से आपको बेध कर मैं अपना जीवन तो बचा लूंगी, सम्पूर्ण असुर कुल से किये गए विश्वासघात के पाप से कैसे बचाऊँगी स्वयं को?

मैं भी अभी देवयानी के साथ ही प्रस्थान करुँगी पिता श्री."

देवयानी और शुक्राचार्य खलनायक सिद्ध होते हैं।

ययाति स्वयं दोनों स्त्री पात्रों की समीक्षा यह मानकर कर लेता है कि मेरे युग की कहानी की धुरी दो स्त्रियों के सापेक्ष घूम रही थी. विजयी सखी को ऐश्वर्य हासिल हुआ था, और स्वयं को प्रस्तुत कर कुल बचा लेने वाली पराजित सखी को जीवन भर की दासता.
कच का पूरा किरदार स्त्री मर्यादा के परंपरा जनित आग्रह से बंधा हुआ है। इन्हीं आग्रहों में वह शापित भी होता है और शर्मिष्ठा के पुत्र को भयानक शाप से मुक्त भी करता है।

एक मामूली सा दिखनेवाला पात्र उत्तानपाद, जो राजा ययाति का सारथी भी है , और अपने रहस्य , कौतूहल और कथानक के निर्णायक मोड़ पर स्वयं की उपस्थिति से उपन्यास का महत्त्वपूर्ण पात्र बन जाता है। वह हर उस जगह पर विनम्रता से विद्यमान है जहां कथा गति पकड़ ले और कथानक के कई मोड़ एक साथ लेखिका के संयोजन में हों।

येती, पुरू , दिशा और चित्रलेखा कथानक में अपनी मामूली उपस्थिति दर्ज कराते हैं पर अपनी चारित्रगत त्वरा में बहुत ही निर्णायक हैं। येति का पिता नहुष के शापग्रस्त होने के पश्चात सन्यास और हिमालय की कंदराओं में भटकने का दुराग्रह विस्तृत कथा फलक पर अवांतर तो है पर शर्मिष्ठा को कच से पुनः मिलवाने का हेतु भी। बाद की घटनाएं न सिर्फ कथानक को गति देती हैं बल्कि हस्तिनापुर का इतिहास बदल देती हैं। लेखिका ने इस प्रसंग को अपनी पूर्ण आत्मीयता दी है।

कथानक का शिल्प और शापों की आवृति

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अगस्त्य मुनि और असुर गुरु शुक्राचार्य के शापों का परिप्रेक्ष्य उपन्यास को इतिवृत्त, स्फीति और परंपरा के बहिष्कार का कथानक देता है और नायिका के विद्रोह की पृष्ठभूमि भी। कथा की बुनावट में हालांकि शाप से मुक्ति का असीम मानवीय आग्रह भी बारीकी से विन्यस्त है।
शिल्प में ब्राह्मण क्षत्रिय संघर्ष और देवासुर संग्राम का विध्वंसकारी परिणाम है। खलनायिका वहीं से आर्द्रता लेती है और नायिका वहीं से अपने विद्रोह के लिए ऊष्मा। शाप उन संघर्षों का अतार्किक परिणाम था। नहुष और ययाति शापित होते हैं और उसी किस्म के एक अन्य शाप की छाया से अपने को दाव पर लगाकर शर्मिष्ठा अपने कुल को संभावित विनाश से बचाती है।

शुक्राचार्य का शाप और अनुष्ठान लोक मानस में व्याप्त देवासुर संग्राम के भय को चौगुनित करता है और कथानक की तार्किक परिणति में सहयोग करता है।

कच और देवयानी का एक दूसरे को शापित करने का प्रसंग अनूठा है और कथानक को भव्य परस्पर विरोधी शिल्पगत आयाम देता है।

"और अपनी न्यून व्यवहारिक समझ के साथ स्वयं यह समझने में विफल था कि मैंने अस्वीकार करते हुए भी अपनी कामनाएँ देवयानी के ऊपर थोप दी थीं.
उसे समझने की चेष्टा न करते हुए अपने दंभ में उसे श्राप देकर ठीक वैसा ही बन गया था जिनसे मुझे घिन थी.
देवयानी ने भी कहाँ समझा था मेरी पीड़ाओं को. उसने भी तो मुझे पलट कर कोस ही दिया था कि जब मुझे संजीवनी की सबसे अधिक आवश्यकता होगी, यह मेरे किसी योग्य नहीं रहेगी. क्या प्रेम में हम इतने निस्पृह हो जाते हैं कि जिससे प्रेम हो उसे ही कष्ट पहुँचा दें?
पिता की आशा थी संजीवनी विद्या प्राप्त करके मैं स्वयं शुक्राचार्य से भी श्रेष्ठ हो जाऊँगा और मैं लौटा तो था संजीवनी लेकर पर साथ लाया था उसे आवश्यकता पर बिसर जाने का श्राप भी ..."

शापों की आवृति और उसके परिणामों की परिघटना को उपन्यास समूचे विस्तार में देखता और समेटता है।

स्वगत - कथनों और फ़्लैश बैक के जरिए कथानक को वर्तमान की घट रही घटनाओं और मनास्थितियों को अतीत की घटनाओं से त्वरित जोड़कर फिर आगे बढ़ जाता है। संक्षिप्त रहना यहां भी लेखिका का मूल मंत्र बना हुआ है।

देवासुर संग्राम का मिथकीय सार्थक परिप्रेक्ष्य

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असुर कुल की संतति विनाश के तट पर थी। देवासुर संग्राम में अर्जित सारा यश गान और अमृत कलश,

जो धनवंतरी हाथों में वर्षों उठाकर चलते रहे भूमि पर छलक सकता था। शर्मिष्ठा इसी आलोक में विश्लेषण करती है । क्या प्रणय, प्रीति, पति सुख, वात्सल्य सबके आनंद से वंचित रह जाऊं या फिर दासत्व ग्रहण कर जीवित रहकर मृतक समान जीवन ग्रहण।

मृत्यु जब तक दूर रहती है तभी तक डराती है। अगर आवाहन कर लो और फिर वरण, तो फिर उसकी रिक्तता का बोध होता है। मृत्यु की यात्रा निर्वात की यात्रा है । जीवन पूर्ण नहीं होता किसी का कोई हिस्सा कहीं छूट जाता है, कोई शिरा कहीं हिसाब करके देख लो उसकी पूर्णता असंभव है। यह शिव, वृहस्पति, शुक्राचार्य और रुद्र का समवेत निष्कर्ष था जीवन और मृत्यु की निसारता के संदर्भ में जो देवासुर संग्राम और समुद्र मंथन के उपरांत अपनी शाश्वत स्वीकृति भारतीय वांग्मय में ग्रहण करता है।

स्त्री का शाश्वत प्रतिकार अन्याय के विरुद्ध

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" पुरुषों का यह हस्तिनापुर कोमलमना स्त्रियों के योग्य नहीं. इसी हस्तिनापुर ने पहले उसका यौवन लिया और अब उसकी पुत्रवधू का जीवन. क्या संसार की कोई जगह इन पुरुषों ने स्त्रियों के लिए सुरक्षित रख छोड़ी है."

एक साथ लेखिका शर्मिष्ठा, चित्रलेखा, माद्री, कुंती, द्रौपदी , गांधारी के बड़े किरदारों से लेखकीय आत्मीयता जोड़ देती हैं। स्त्री के इस शाश्वत संघर्ष जो हस्तिनापुर के वैभव और उत्कर्ष काल में हुआ का बहुत ही सटीक बिम्ब है पूरे उपन्यास में।

शर्मिष्ठा का ऊपर वर्णित निष्कर्ष पर आना ही उसका विद्रोह है। विद्रोह त्रिस्तरीय अंकन लेता है उपन्यास में । पहला जब देवयानी वचन लेती है, और जिस वचन में असुर कुल के विनाश का खतरा है। शर्मिष्ठा यहां क्षत्रिय ओज से भरी असुर कुल या तत्कालीन किसी भी पुरुष पात्र से बड़ा निर्णय लेती है, दासत्व ग्रहण करने का। मां पिता को अपमानित नहीं होने देती और अपने कुल को संभावित विनाश से बचाती है। दूसरा विद्रोह नवजात शिशु को लेकर ययाति का महल छोड़ देने का निर्णय करना। राजप्रासाद को छोड़ वन गमन बड़ा विद्रोह था, किसी भी तरह की राजकीय याचना से। तीसरा विद्रोह पुत्र के हस्तिनापुर के राजा बन जाने पर भी फिर से वापस कच के आश्रम में जाने का निर्णय। वह चाहती तो देवयानी के पहले के किए अपमान का प्रतिशोध ले सकती थी, उसने फिर से राजत्व का ही त्याग किया। ये तीनों विद्रोह उपन्यास में नायिका के विप्लवी तेवर की उद्घोषणा हैं।
"शर्मिष्ठा" औपन्यासिक कृति अपने चरित्र और उपजीव्य के साथ न्याय कर सकी है।
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लेखक - राजीव कुमार



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