पलायन एक पराजित का - सौरभ पांडेय की कविताएँ

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सौरभ पांडेय की कविताओं का स्वर व्यक्तिपरक है । कविताओं में निजी दुख, प्रेम और विरह का स्वर प्रभावी है लेकिन इनकी ताजगी आकर्षित करती है । अनगढ़ होते हुए भी यहाँ कविता अपनी पूरी संभावना के साथ मौजूद है । बिंबों की सादगी और सहजता पाठकों से संवाद कर पाने में सक्षम होती हैं। अपने आस पास के वातावरण के लिए एक सजग दृष्टि और संवेदना ही कवि का आधार होता है । इस युवा कवि के पास वह संवेदनशील, सजग दृष्टि है जो भविष्य के लिए आशान्वित करती है । आइए पढ़ते हैं सौरभ पांडेय की कविताएँ -

http://www.freeimages.com/photo/me-walking-again-sunset-1578250

पलायन एक पराजित का
ऊपर तो देखना एक बार रात को अपनी छत से
नजर आऊंगी मैं तुम्हें किसी आकाशगंगा में
यही आखिरी शब्द थे तुम्हारे मेरे लिए
काँच की दीवार के उस पार से
अपने परिणित वर के साथ जाती हुई
एक असहाय पंछी सी लग रही थी तुम

मुझे याद है सुर्ख जोड़े से झाँकती तुम्हारी बड़ी आँखें अब तक
डबडबा के टपकने को तैयार थीं जो कब से
पर तुमने गिरने नहीं दिया था आँसुओं को तीसरे मोड़ तक
जहाँ आज से पहले भी तुम्हें रोज दिखा करता था मैं
और तुम न चाहते हुए भी हँस दिया करती थी धीमे से
पर आज तुम्हे विदा करने के लिए खड़ा था मैं
आगे कभी न दिखने और मिलने की शर्त पर
दूसरे शहर में खुद को जलाने की होड़ में खड़ा था मैं कुछ धुएँ के छल्लों के साथ
एक नए सिरे से खुद को समेटते हुए

सामने खड़ी तुमने एक सज्जन से परिचित कराया मुझे
गर्मजोशी से बढ़े उनके हाथ को मैं सम्हाल न सका
सुनता रहा कुछ शब्द मंत्रबद्ध
अरे तो आप ही हैं जिनकी इतनी तारीफ किया करती हैं ये
आइए ना किसी दिन आज कल इसी शहर में हैं हम भी
मैं भाग उठता हूँ उस शहर से तेजी के साथ
शायद पलायन ही मेरी परिणति है
कल फिर नजर आऊँगा किसी नए शहर में
समेटते हुए खुद को एक नए सिरे से



Maya:     © Tim Henderson
प्रेम की कच्ची पक्की रोटियाँ
सारे रिश्तों को गूथ कर
जिंदगी की कुछ सूख चुकी
टूटी टहनियों को जला कर
वक्त के चुल्हे पर
पकाई जाती हैं 

कुछ कच्ची कुछ पक्की सी रोटियाँ

आओ चलो
बनाते हैं हम भी
तुम गूंथना थोड़े से एहसासों को
और मैं लाल आँखों से
धुएँ को तब तक पीता हूँ
तुम एक इंच मुस्कुराना बस
मुझे देख देख कर दूर से
और मैं जला दूँगा तब तक
हवाओं से बुझ चुके
इस पुराने से चुल्हे को
फिर पकाएँगे हम साथ साथ
कुछ कच्ची कुछ पक्की सी रोटियाँ
खट्टा मीठा सा मुँह बनाना तुम
सिरके को चख कर
और दुखों की सारी कड़वाहट
मैं एक साँस में पी जाऊँगा
पर बुझने न देना
इस चुल्हे की आँच को कभी भी
ताकि हमेशा पकती रहे

ये कच्ची पक्की सी रोटियाँ


http://www.freeimages.com/photo/shadows-1240801

तह कर के रखी कुछ यादें

तुम्हारे पास रखी हैं मेरी कुछ यादें
जिसमें ढेर सारी जागी हुई रातें हैं

उन्नीदें से बहुत सारे ऊँघते दिन भी हैं
कुछ सीपियों में बंद महकती लड़ाईयाँ भी हैं
और कुछ मूँगे के चट्टानों की तरह

गहराईयों में दबे पड़े से प्यार के पत्थर हैं

चलो इन्हें साझा कर लें
कुछ रातें अब तुम जागो

कुछ दिन उन्नीदे से हो कर देखो

सीपियों में बंद लड़ाईयाँ खोल कर
मूँगें के चट्टानो को तोड़ दो
फिर देखो कितना धानी है

प्यार का रंग, मेरे होने के एहसास का रंग


http://www.freeimages.com/photo/train-ride-1538374

रेल और जीवन

चलती खिड़की से बाहर झाँकती हैं दो आँखे
बोलना चाहती हैं बहुत कुछ पर चुप हैं
बह सकते हैं कुछ मोती सीप से

इसलिए बलपूर्वक बंद कर लिया है सीप को

भागते मकान और पेड़ों की तरह तेजी से
जेहन में बनते और बिगड़ते हैं कुछ दृश्य
एक ही बर्फ के गोले से कैसे दोनों ने चखे थे जीभ जीभ मिठास
कैसे लजा कर कहा था की क्या सोचेगें देखने वाले
कैसे खाए थे शर्त लगा के गोलगप्पे खुशी के साथ

एक दूसरे से हार कर भी जीतने की होड़ में

अचानक कोई रोक देता है जंजीर खींच कर रेल
मन की जंजीरें भी जैसे खिंच जाती हैं साथ ही
सब कुछ रुक सा जाता है एकाएक
बर्फ पिघल रही है धीमे धीमे आँखों से
गोलगप्पे की खुशियों में विछोह का तीखापन घुल चुका है
अचानक गूँजती है एक प्रतिध्वनि जोर से
चल पड़ती है रेल अपने गंतव्य की ओर धीमे धीमे
पटरियों में एक संगीत सुनाई देती है
और आवाज आती है एक मधुर सी
जो चिर-परिचित है कानों को

कहीं भी रहें हम तुम हमेशा साथ तो हैं न


http://www.freeimages.com/photo/shadow-1314489


हँसती तो ऊजले दाँत
चमक उठते हैं
खुले बालों में छत पर
नीली कुर्ती पहने बिना बाजू वाले
किसी अंजान सपनों में खोई
प्रेमी से अपने बात करती है वो
किनारे के तीसरे मकान वाली लड़की
बाजरे की रोटियाँ पकाती है
धुएँ वाले चुल्हे पर
बिना किसी शिकायत के
आँखों से बस कुछ बूँदें टपकाती
तेज नमक हो जाने पर
फिर गुमसुम हो जाती है
दो दुनिया है उस लड़की के
एक छत के नीचे
दूसरी छत के ऊपर



लेखक परिचय

इलाहाबाद विश्वविद्यालय से परास्नातक ( इतिहास ) 
काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से मास्टर ऑफ़ लॉ 
संघ लोक सेवा आयोग और राज्य सेवा आयोग की परीक्षाओ में कई बार साक्षात्कार तक पहुँचना  
सम्प्रति अभी उच्च न्यायालय इलाहाबाद में वकालत कर रहा हूँ 


1 comments:

वाकई, अच्छी कविताएँ. संवेदना को छूने में सक्षम... बधाई कवि को

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