तनु वेड्स मनु-रिटर्न्स का स्वैगर और फेसबुक पर मचा धमाल – गौरव कबीर

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तनु वेड्स मनु रिटर्न न सिर्फ बॉक्स ऑफिस पर धमाल मचा रही है बल्कि इसने लोगो के दिलों को भी छुआ है। कुछ लोग जहाँ इस फिल्म को छद्म नारीवाद या भ्रम में उलझा नारीवाद बता रहे है तो कुछ का कहना है की यह फिल्म भारतीय समाज की तरह ही एक डरपोक अंत की तरफ जाती है । सोशल मीडिया पर जितना इस फिल्म के बारे मे लिखा जा रहा है शायद ही किसी और फिल्म के बारे मे लिखा गया हो ।
आइए इस फिल्म के बारे में फेसबुक पर लिखे गए कुछ विचार पढ़ते है :-



बापिष्ट संस्कारों की पुनर्स्थापना के लिये तनु को पहले वैम्प और बाद में टिपिकल देसी पत्नी बना देना जरूरी था और दत्तो को पहले बिंदास और बाद में टिपिकल बलिदानी प्रेमिका बनाना भी जरूरी था। फ़िल्म को हिट कराने के लिए भी जरूरी था। लेकिन कंगना का अभिनय दिलकश है।
----आशुतोष कुमार



प्रेम में ही तो सब जायज़ है क्योंकि जंग कहां होती है अब। फिल्म तनु वेड्स मनु की वापसी वाली फिल्म की अगर बॉक्स ऑफिस से वफ़ादारी जारी है तो इसकी सबसे बड़ी वजह वो क्रियेटिव रिसपेक्ट है जो इसके लेखक हिमांशु शर्मा और  हिदायतकार आनंद एल राय के बीच फिल्म दर फिल्म स्पष्ट तौर पर समझ आयी है। आप इस फिल्म में हंसते हैं, डायलॉग्स पर तालियां बजाते हैं,सीटियां मारते हैं और जो दर्शक ये नहीं कर पाते वो भी आपकी इस तरह की प्रतिक्रिया पर नाराज़ होने की बजाय ख़ुश होते हैं। ये हौसलाअफज़ाई तनु वेड्स मनु रिटर्न्स की वो दौलत है जो इसे बेहतरीन फिल्म होने का खिताब बड़ी ईमानदारी से देती है, समीक्षक दिल खोलकर सितारों से नवाज़ते हैं तो कहीं कोई अतिश्योंक्ति नहीं लगती । इस कमाल की फिल्म को बार बार देखने का दिल करता है, और कंगना की अदाकारी सोने पे सुहागा। संगीत में भी ये अव्वल है, राजशेखर के शब्द और क्रिस्ना का संगीत पिछली फिल्म जैसा नहीं मगर फिल्म के साथ है। ये फिल्म दीपक डोबरियाल के किरदारी कमाल की गवाही उन्ही के अंदाज़ में देती है। पूरी फिल्म अपनी पहली किश्त जैसी बिलकुल भी नहीं है और यही इसकी सबसे बड़ी जीत है। मैं ऐसी ही फिल्में देखना चाहूंगा। ज़रूर देखिए।
-----प्रशांत पाण्डेय



बस एक बात कहें , आप लोग तनु वेड्स मनु रिटर्न्स कैसे पसंद कर सकते हैं !! अभी बस पंद्रह मिनट बीते होंगे और मुझे लगता नहीं कि मैं देख पाऊँगी आगे। गॉड !! क्या कहूँ तनु को वैम्पायर ..पति और पिता का खून पीने वाली एक बिगड़ैल लड़की जिसे अपने मुक्त होने का गन्दा भ्रम है .(फिल्म देखते समय)
सिनेमा हमेशा से चीज़ों को अतिरंजित कर दिखाता है और तनु एक अभिनेत्री है बस, उसे स्त्री मुक्ति के रोल मॉडेल के रूप में तो कतई नहीं देखा जा सकता , बल्कि वह तो अपने पति के पैसों पर पलने वाली एक सिरफ़िरी और बद दिमाग औरत है जिसे सही गलत की रत्ती भर समझ नहीं इसलिए ऐसी नायिकाओं को कोट कर स्त्री के अपना  स्पेस गढ़ने के लंबे संघर्ष को जिसमें उनकी आर्थिक और मानसिक आज़ादी भी निहित है , पागलपन करार देना और परिवार टूटने की वजह बताना, बहुत गलत है। हकीकत तो यह है कि हमारा बॉलीवूड अभी भी एक मुक्त स्त्री की छवि सही से गढ़ पाने में असमर्थ है। कोशिश करने पर यही घटिया , स्तरहीन किरदार ही निकलते हैं जिसे किसी भी सही माने में आधुनिक और मुक्तिकामी स्त्री से रिलेट नहीं किया जा सकता । (देखने के बाद )
------ रश्मि भारद्वाज




कुसुम ने दिल को छू लिया एकदम। दत्तो की भूमिका में जबरजस्त भूमिका निभाई। आत्मबल और हरियाणावी लहजे ने सहज कर दिया किरदार को।  कुसुम के भाई के किरदार में कलाकार ने भी उम्दा एक्टिंग किया । इस बार 'बन्नों तेरा स्वेगर लागे सेक्सी' के अलावा कोई भी गीत कर्णप्रिय नहीं लगे जबकि पिछली फिल्म के सभी गीत लाजवाब थे। मेरे फोन के रिंगटोन आज भी यही हैं 'कितने दफे दिल ने कहा, दिल की सुनी कितने दफे.. वैसे तो तेरी ना में भी मैंने ढूँढ ली अपनी खुशी.. तू जो गर हाँ कहे तो बात होगी और ही' , खैर ! आगे चलते हैं डायलाग पिछली बार से भी ज्यादा चुटीले हैं , पप्पी जी ने तो गर्दा मचा दिया है एतना कि मिजाज हरियरा गया है एकदम
फिल्म का फस्ट हाफ तेज है गतिशील है और सोचने के पहले ही नए सीन आ जाते हैं जबकि दूसरे हाफ में फिल्म धीमी है आगे क्या होने वाला है पता चल जाता है
अवस्थी जी का दो डायलाग-'साले ओरिजनल भी यही लेंगे डुप्लीकेट भी यही लेंगे' और 'ईंट से ईंट जोड़ने के लिए सीमेंट चाहे जेके हो या अंबुजा मुझे फर्क नहीं पड़ता है' लाजवाब है
अंत में माधवन पहली फिल्म से आज तक मेरे फेवरेट हैं , इस फिल्म में भी श्रेष्ठ भूमिका निभाई है |
----- सौरभ



तनु वेड्स मनु रिटर्न्स के बहाने

परसों यह फिल्म देखी ,फिल्म ठीक लगी पर मैं जो इस फिल्म के बहाने एक महत्वपूर्ण सवाल उठाना चाहती हूँ वह यह कि मेंटल हॉस्पिटल व पुनर्वास संस्थान के लिए प्रचलित नाम पागलखानाको क्या अब बदला नहीं जाना चाहिए? इस फिल्म में जब जब यह नाम आया तब तब दर्शक सहानुभूति दिखाने की जगह हँसते हुए नज़र आए। यह हमारी किस मानसिकता को उजागर करता है?
फिल्म में नायक व नायिका किसी भी गंभीर मानसिक रोग से ग्रस्त नहीं थे बल्कि वे अपने शादीशुदा जीवन की आपसी समस्या को सुलझाने के लिए लंदन के एक मनोचिकित्सालय व पुनर्वास केंद्र में सलाह लेने जाते हुए दिखाये हैं जो कि अपने आपस की समस्या को सुलझाने की दिशा में उनके द्वारा उठाया गया एक बहुत ही अच्छा कदम था परंतु वहाँ अत्यधिक गुस्सा आने पर नायक को चार लोगों द्वारा पकड़ कर ले जाना एक बहुत ही गलत संदेश देता है फिर बाहर आकर नायिका द्वारा व अन्य लोगों द्वारा बार बार पागलखानाशब्द का प्रयोग तो उस से भी अधिक गलत संदेश देता है। इस प्रकार तो जो लोग अपने आपस की समस्या को सुलझाने के लिए डॉक्टर के पास अस्पताल में जाना भी चाहेंगे वे अब बिलकुल भी नहीं जाएँगे क्योंकि एक तो वैसे ही इस नाम के साथ एक सोशल टैबू जुड़ा है दूसरा यह संदेश जाता है कि वहाँ जाने वाले को पकड़ कर अंदर ही कर दिया जाएगा जेल की तरह। 
इस नाम के चलते ही तो मानसिक बीमारियों से ग्रसित आधे से अधिक अधिक मरीज न तो मनोचिकित्सालय जाते हैं और न ही मनोचिकित्सक के पास फिर वे या तो मंदिरों/ तांत्रिकों की शरण में जाते हैं या फिर साधारण डॉक्टरों के पास जाते हैं।
( यदि आप में से कोई मेरी सी बात को भारत सरकार व फिल्म निर्माता/निर्देशक तक पहुंचाने में मदद कर सकते हैं तो मुझे रास्ता सुझाएँ )
--- सुनीता सनाढ्य पाण्डेय



तनु जितनी आधुनिक दिखती है उससे कहीं अधिक वह पुरातन सोच की है .वह पत्नी नहीं जोंक है जिसको एक बार पत्नी की पोस्ट हासिल हो जाए तो वह जीवन भर निठल्ले रहकर पति का सामाजिक मानसिक शोषण करती रह सकती है . उसके दुख उसके अभाव सब उसके खालीपन की उपज हैं . रस उसके जीवन में इसलिए नहीं क्योंकि वह एक कर्महीन प्राणी है . जिन पत्नी अधिकारों की बात वह करती है वह सब हास्यास्पद हैं क्योंकि उसको खुद किसी कर्तव्य का अहसास तक नहीं है . उसके आंसू दर्द नहीं जगाते क्योंकि उनका कारण धोर स्वार्थी नजरिया है . दुनिया में अनगिनत पत्नियां हैं वह भी एक है जिसके जीवन की कोई सामाजिक उपादेयता नहीं .
कुल मिलाकर यह कि तनु और उस जैसी अन्यों में ऐसा क्या है कि उन्हें ज़रा देर भी चाहा जा सके . ये पत्नी बनने के लिए पैदा हुई और पत्नी के गुमनाम ओहदे पर. पैरासाइट की तरह जीते रहने को खुदा की नेयमत मानने वाली फूहड़ प्रजाति है .
इसके ठीक विपरीत दत्तो जैसी आधुनिक , संधर्षशील , आत्मनिर्भर ,सुलझी हुई , स्वाभिमानी लड़की से मिलवाने के लिए फिल्म की पूरी टीम का आभार .
नीलिमा चौहान



कंगना इस दौर की सबसे समर्थ अभिनेत्री है...
तनु वेड्स मनु रिटर्न्स में एक सीन है. मनु को छोड़ के तनु कानपुर लौट आई है. शादी ठीक नहीं चल रही उसकी. अभी अभी पति का भेजा तलाक का नोटिस मिला है उसे. उसे देख कर वो इतनी अस्वस्थ हुई है कि आवारागर्दी करने निकल पड़ी है. पुराने सारे बॉयफ्रेंडस् से मिल रही है. रास्ते से एक बारात गुज़र रही है. तनु उसमे घुस के बेसुध होकर डांस कर रही है. तमाम अजनबियों के बीच ज़मीन पर लेट लेट कर नाच रही है. और फिर अचानक डांस रोक कर चल पड़ती है. उस एक लम्हे में उसके चेहरे के हावभावों में ड्रामेटिक चेंज आता है वो अद्भुत है. एक फ्रैक्शन ऑफ़ सेकण्ड में बेफिक्री के भाव गायब हो जाते हैं और तमाम परेशानियों का अक्स उसके चेहरे से झलकने लगता है. बेखयाली में अपने बालों में हाथ फेरती तनु यूँ चलती चली जाती है जैसे दुश्वारियों का सामना करने के लिए जरुरी ताकत उसने अपनी आवारागर्दी से इकट्ठी कर ली हो. अपने अंतर्मन की भावनाओं को महज़ फेशियल एक्सप्रेशन द्वारा इतनी खूबी से प्रकट करने के लिए बहुत मेहनत, बहुत अभ्यास चाहिए. कंगना इतनी सहजता से ये कर जाती है कि वो फ्रेम आपके ज़हन में हमेशा के लिए दर्ज़ हो जाता है.
मेरा यकीन मानिए कंगना इस दौर की सबसे समर्थ अभिनेत्री है.
"क्वीन" ने इस बात को साबित किया था, तनु रिटर्न्स ने इस पर अमिट मोहर लगा दी है.
मुबारक अली



जिस तरीके से तनु वेड्स मनु रिटर्न्स के बारे में सकारात्मक टिप्पणियों की बाढ़ है, उसकी वजह से रात के डेढ़ बजे जब कि इस सिनेमा को मैंने देखकर पूरा किया मुझे जरूरी लगता है कि इस सिनेमा पर मै अपनी टिप्पणी जरूर दूँ ।
तनु वेड्स मनु रिटर्न्स मुझे कहीं से भी औसत से बेहतर नहीं लगी, अपनें सापेक्षिक सपाट चेहरे के वावजूद स्वरा का अभिनय कंगना से मुझे बेहतर लगा । कंगना की संवाद अदायगी में सुधार की बेहद गुँजाईस है, जिमि शेरगिल के छोटे चरित्र को और उभारने की जरूरत लगी, जबकि पप्पी और वकील का चरित्र निभाने वाले व्यक्ति नें बेहतर अभिनय किया ।
स्वैगर-स्वैगर वाले गानें के लिए युवक और युवतियों में जो मै पागलपन देख रहा हूँ, गाने को सुनने देखने के बाद वाकई यह पागलपन ही लगा ।
फिल्म की कहानी आधी अधूरी लगी, शादी से दुल्हन गायब करनें के बाद दुल्हन का जिक्र एकाएक गायब हो जाता है । माधवन नें सहजता से अपने जिम्मेदारियों का निर्वहन किया है और वह परिपक्व लगे ।
फिल्म में कई जगह कैमरे के एंगल बचकानें लगे, जबकि कई शीन लाँग शाट की माँग करते लगे । बैकग्राउंड स्कोर कई जगहों पर बेवजह शोर करता लगा ।
कुल मिलाकर, यह फिल्म मुझे टुकड़ो में अच्छी लगी, पर एक सम्पूर्ण फिल्म के रूप में यह मुझे औसत से उपर कतई नहीं लगी ।
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(पुनश्च : मेरी टिप्पणी पर मेरी पत्नी की प्रतिक्रिया है कि अब मै वाकई बूढ़ा हो चुका हूँ और मुझे नए जमाने की फिल्में देखना बंद कर देना चाहिए, शायद वह सही कहती है ।)
--- कश्यप किशोर मिश्र



मैरेज इंस्टीट्यूट के पक्ष में एक मज़बूत स्त्री-विरोधी फ़िल्म -बहुत ही रोचक ढंग से फिल्माया गया है लेकिन वैचारिक स्तर पर देखें तो कहना होगा कि अभी भी हिन्दी सिनेमा में वह साहस नहीं कि मन्नु शर्मा की शादी कुसुम सांगवान से हो जाने दे. नव-उपनिवेशवादी माहौल में इससे बड़ी सफलता क्या होगी कि स्त्री को ही स्त्री के विरोध में खड़ा कर दिया जाये। मन्नु शर्मा की शादी तनु से करा कर एक बहुत बड़े पाप को टाला जाता है. विवाह-संस्था की शक्ति की गूँज लगभग ॐ जैसी ध्वनि के साथ फ़िल्म के अंतिम दृश्यों में समाहित है। अब अगर इसे एंटि-थीसिस के फोरम भी लिया जाए तो भी यह पुरुष-सत्ता के पक्ष में जाता है... कुसुम सांगवान से यदि शादी कारवाई जाती है तब भी सुरक्षित संवादों के कारण यह खेल रोचक दिखता है।– कुसुम तन्नु से कहती है कि --मैं तुम्हारी जैसी औरत नहीं--- मैं रोटी भी संभाल सकती हूँ और बच्चे भी... जबकि कुसुम के फ़ॉर्म को और भी बेहतर किया जा सकता था..... फ़िल्मकार दयावान ज्यादा नजर आते हैं.....
---- मजदूर झा



पॉप वाप सी रैप वैप सी बजती रग रग मे कंगना,
  तनु के रूप मे  एक बिगड़ैल नायिका जो प्रगतिवादी कम और अपने भीतर की अस्थिरता से जूझती एक लड़की ज्यादा लगती है! माधवन , एक नायक(?) जो डब्बू और डरपोक तो था ही अब तनु शर्मा की ड्यूप्लिकेट खोज कर  स्मृतिजीवी भी सिद्ध हुआ | स्वरा, एक  बिहारी लड़की पायल का किरदार जीती  है  जो टेस्ट ट्यूब बेबी के रास्ता अख़्तियार करती है। उसका सरदार जस्सी जो तमाम मर्दानगी को किनारे लगा कर बेबी और अपनी झूठी वाइफ को स्वीकार भी कर लेता है! एक रामपुरी भोकाली लौंडा जिसके जैसे उत्तर भारत की हर एक गली मे कंधे देते मिल जाएंगे  और वो कुसुम सांगवान का हरियाणवी भाई कैसे भूल गए  , जो खाप के खिलाफ खड़ा है , जिसे छोटे घर मे रहना कुबूल है पर छोटी सोच के साथ रहना कुबूल नहीं ( ये अलग बात है की बिजली कटिया लगा कर लेता है )। व्हाट्सएप  के मैसेज को इश्क़ का फरमान समझने वाला पप्पी (दीपक डोबरियाल) भी तो है । राजा अवस्थी का दबंग अंदाज़ तो खैर जिम्मी शेरगिल जी ही गए है।
और हमारी कुमारी कुसुम सांगवान, जिला झझर , हरियाणा ने तो कमाल किया है, कंगना इस अदाकारी के लिए ताउम्र याद रखी जाएंगी।
लेकिन फिल्म मे अगर किसी ने कमाल किया है तो वो लेखक हिमांशु शर्मा है, एक एक संवाद तबीयत से लिखा गया है और आनंद राय तो निर्देशन की एक नयी परिभाषा गढ़ रहे हैं  |
फिल्म के संवाद इस फिल्म की जान है और हमेशा की दर्शकों की तालियाँ बटोरने में कामयाब रहें हैं । संगीत भी बहुत कर्णप्रिय  है ।
---- गौरव कबीर


प्रस्तुति और संकलन 
गौरव कबीर
गौरव कबीर, सांख्यिकी और डेमोग्राफी जैसे विषयों पर कार्य करते हैं  और हाल फिलहाल मे ही  लिखना भी शुरू किया है। आप की कविताएँ पत्रिकाओ में  छप चुकी है तथा आप एक अँग्रेजी कथा संग्रह “You, Me and Zindagi-2” का सह-सम्पादन भी कर चुके है। घूमना, फोटोग्राफी और कुकिंग का शौक है ।



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तनु वेड्स मनु रिटर्न्स रिलीज़ होने के अगले दिन ही देख ली थी - - - अब तो भूल भी गई - - - पूरी फिल्म अच्छी थी - - - मनोरंजन से भरपूर - - - कंगना आँसू भरी आँखों में भी उतनी ही खूबसूरत दिखती हैं जितनी हँसते हुए - - - माधवन बेबस पति के रोल में अच्छे लगे हैं - - - इसका पार्ट वन जिन्होंने देखा है उन्हें ये एक धारावाहिक जैसी लगेगी - - - कुल मिलाकर एक बार देख लेनी चाहिए - - - इसके पार्ट थ्री का इंतज़ार है मुझे :)

सबके बावजूद मैं देखना चाहूंगी ,बेटा का इंतजार कर रही हूँ कबीर ,क्यूंकि पहला पार्ट मुझे आज भी देखना अच्छा लगता है , सुन्दर संयोजन के लिए बधाई !

Hal filhal ki best film hai ... PIKU bhi dekhiye aap :)

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