क्यों नहीं कह सकते - माइ चॉइस? - रश्मि भारद्वाज

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देह मेरी, मेरा दिमाग, मैं चुनूंगी
मैं चुनूंगी अपनी पसंद के लिबास
तब भी मेरी आत्मा रह सकती है निर्वस्त्र
मैं चुनूंगी मेरे शरीर का आकार
साइज़ 0 हो कि साइज़ 15
मेरी आत्मा को बांधने के लिए नहीं है उनके पास कोई पैमाना
नहीं होगा कभी भी
सूती या सिल्क के कपड़ों में मेरी आत्मा को गिरफ्त करने की कोशिश कुछ ऐसी है
जैसे करना यह यकीन कि रोका जा सकता है ब्रह्मांड का विस्तार
या फिर बांधी जा सकती है धूप मुट्ठी में
कैद में है तुम्हारा दिमाग, इसे मुक्त करो
ना कि मेरी देह
इसकी चिंता ना करो 
मैं चुनूंगी
कि करनी है मुझे शादी या नहीं
सेक्स शादी से पहले , शादी के बाहर या सेक्स ही नहीं
मैं चुनूंगी
थोड़े समय के लिए करना प्यार, या हमेशा कामनाओं के समंदर में उतरना
मैं चुनूंगी
कि प्यार करूँ एक आदमी को या कि औरत
या फिर दोनों को
याद रहे तुम्हें ; तुम हो मेरे चुनाव , नहीं हूँ मैं तुम्हारा विशेषाधिकार
मेरे माथे की बिंदिया, मेरी उंगली की अंगूठी और मेरे नाम से जुड़ा तुम्हारा उप नाम
हैं यह सब बस आभूषण और बदले जा सकते हैं
लेकिन नहीं पा सकोगे तुम दुबारा मेरा प्यार,  तो सहेजो इसे
मैं चुनूंगी कि कब लौटना है मुझे घर
परेशान नहीं होना अगर मैं लौटूँ घर सुबह के चार बजे
भ्रम मत पालना अगर लौट आऊँ मैं शाम 6 ही
मैं चुनूंगी
कि जन्म दूँ तुम्हारे बच्चे को या नहीं
और 7 अरब विकल्पों में से करूँ कि नहीं तुम्हारा चुनाव 
तो मत पालना अहंकार
मेरा आनंद हो सकती है तुम्हारी पीड़ा
मेरा संगीत , तुम्हारा शोर
मेरी व्यवस्था , अराजकता तुम्हारी
तुम्हारे पाप , मेरे गुण
मेरे चयन हैं मेरी उँगलियों की छाप की तरह
यह बनाते हैं मुझे सबसे अलग
मैं वृक्ष हूँ वन का
मैं हूँ हिमकण, हिमपात नहीं
तुम हो हिमकण
अब जागो
बाहर निकलो अपने दिमाग के सनकी तूफ़ान से
मैं चुनूंगी
कि रखनी हैं मुझे हमदर्दी
या फिर होना है उदासीन
मैंने चुना है अलग होना
मैं हूँ ब्रह्मांड
अपरिमित हर दिशा में 
यह है मेरा चुनाव 

( माइ चॉइस का हिन्दी रूपान्तरण )


हालिया आत्महत्या की घटनाओं नें स्तब्ध कर दिया और सबसे ज्यादा हैरानी तो तब हुई जब लगभग महीने भर पहले रिलीज़ हुए दीपिका पादुकोण के विडियो माय चॉइस को गालियाँ देने वाले यहाँ घडियाली आंसू बहाते पाए गए। एक हारी हुई औरत उन्हें हमेशा से आकृष्ट करती है लेकिन माय चॉइस सुनकर उन्हें पसीने आ जाते हैं। हैरत नहीं कि दीपिका पादुकोण के माइ चॉइस विडियो के विरोधियों को इस विडियो में सेक्शुअल  फ्रीडम या एडल्ट्री के अलावा कुछ नज़र नहीं आया। वह यह नहीं सुन पाए कि असल बात थी आत्मा की स्वतन्त्रता। उस सदियों पुरानी कंडिशनिंग से मुक्ति की बात जो बहुत ही शातिराना  तरीके से एक औरत को सिर्फ एक शरीर या वस्तु में रिड्यूस कर देती है, जो यह नकार देती है कि उस औरत के शरीर में एक आत्मा भी है और एक उतना ही विकसित मस्तिष्क, जितना कि किसी एक पुरुष का हो सकता।
शादी के बाहर सेक्स या शादी से पहले सेक्स सुनकर उनका बौखलाना लाज़िमी है क्योंकि यह उस समाज के स्वामित्व पर खुली चुनौती है जो हमेशा से औरत को, उसकी देह को अपनी संपत्ति मानता आया है और उम्मीद करता आया है कि वह अपना तन- मन सब अर्पित कर ख़ामोशी से परिवार और समाज की धूरी बनाए रखे। वह बौखला गए कि मांग में ढेर सारा सिंदूर डालकर, पैरों मे पाजेब और हाथो में दर्जनों भर चूड़ियाँ पहनाकर जिन शृंगार चिन्हों को उन्होने  प्रेम और समर्पण की आवश्यक शर्तें बना दिया, वह प्रेम की निशानी नहीं, बस उन्हें संतुष्ट रखने के साधन मात्र हैं और बदले जा सकते हैं । इसका विरोध करते हुए वह यह भूल गए कि उन्होने अपना जीवन साथी खुद चुनने वाली लड़कियों के ऑनर किलिंग का विरोध किया था। इसका विरोध करते हुये वह यह भी भूल गए कि लाखों औरतें शादी के बाद कई रातें अपने घर में ही मैरिटल रेप का शिकार होती हैं और जिसके खिलाफ हमारे देश में कोई कानून नहीं है। अब तक मर्दानगी की परिभाषा ही यही गढ़ी  गयी है कि कितनी औरतें कितनी आसानी से  झांसे में आ जाती है और फिर उसके किस्से चटकारे ले कर दोस्तों में बाँचे जाते हैं। यह वही देश है, जहां स्त्री के शारीरिक या मानसिक रूप से अक्षम होते ही पूरे वैध तरीके से दूसरा आल्टरनेटिव खोज लिया जाता है । यहाँ तक कि बेटा न होने पर आराम से दूसरी शादी भी रचा ली जाती हैं और समाज इसे जस्टिफ़ाई करता रहता है।
अगर आपने इस विडियो से सिर्फ यह समझा कि यह एडल्ट्री को बढ़ावा दे रहा है तो गुजारिश है इसे फिर से देखिए, यह उन लाखों औरतों की वह कहानी है जो वो आज तक कह नहीं पायीं और शायद सोचने से भी डरती हो, क्योंकि ऐसी औरतों को आप बड़े आराम से आज तक कुलटा, बदचलन और डायन कहते आए हैं। संदेश बस इतना है कि स्त्री को भी चुनाव का वह अधिकार हो जो समाज एक पुरुष को देता है।  वह अपने प्रेम को चुन सके, प्रेम में रहना है या नहीं उस स्थिति को चुन सके।  वह भी एक शरीर है, और अगर उसे सेक्स की जरूरत होती है तो वह उसकी मांग कर सके। अगर विरोध करना है तो पहले उन बाज़ारों का कीजिए जो आपने अपनी अय्याशियों के लिए बसाये हैं। वस्तुतः आपने आज तक सावित्री, अनुसूइया और सीता जैसे चरित्र गढ़े हैं ताकि आपकी औरतें आपके अधिकार में रहें और कभी भी यह न सोच पाएँ कि उन्हें क्या चाहिए। लेकिन अब मान लीजिये। एक सचेत और जागरूक दिमाग को आप बांध नहीं सकते। आज़ 5 साल की उम्र के बच्चे यह कहते पाए जाते जाते हैं कि मेरा भी एक चुनाव है, तो एक स्त्री क्यों नहीं कह सकती। मत परेशान हों, यह समय की मांग है कि परिवार और समाज के ढांचे को बनाए रखने की ज़िम्मेदारी अब बराबर बंटे, कुछ ऐसे नए नियम लिखे जाएँ । पुरानी मान्यताएं अगर टूट रहीं तो उन्हे जकड़े रहने के बजाए सह अस्तित्व के नए रास्ते तलाशे जाएं जहां स्त्री और पुरुष का बराबर सम्मान हो, बराबर की भागीदारी हो। “Remember; you are my choice, I’m not your privilegeThe bindi on my forehead, the ring on my finger, adding your surname to mine, they’re all ornaments and can be replacedMy love for you cannot, so treasure that.
वोग पत्रिका एक उच्च वर्गीय फैशन पत्रिका है, यह कहकर एक बहुत ही महत्वपूर्ण बात को दरकिनार कर देना, आधी आबादी को हमेशा एक ख़ास छवि में बांधे रखने की साज़िश है, जिस ओर सिमोन ने बहुत पहले ही इशारा कर दिया “ one is not born a woman but becomes one”. कब तक कोशिश जारी रहेगी औरत को कुछ ख़ास परिभाषाओं के इर्दगिर्द बांधे रखने की ! क्यों नहीं हो सकती वह एक ऐसी औरत जो अपने करियर के लिए बच्चा नहीं होने का विकल्प चुने ? क्यों नहीं हो सकती वह एक ऐसी औरत जो शादी के बिना किसी के साथ रहना चाहे और क्यों नहीं हो सकती वह एक ऐसी औरत जो जानती हो अपना हित, अपना स्वार्थ और उसे पाने के रास्ते बनाना भी ? क्या ऐसी औरतों को एकता कपूर के धारावाहिकों की तरह वैम्प बनाना जरूरी है ? क्या इतना मुश्किल है उसमें एक स्वस्थ इंसान को खोज पाना?
यह प्रश्न अभी रहेंगे , जब तक औरत की एक गढ़ी हुई छवि रहेगी।  औरतों की माइ चॉइस को पचा पाने के लिए अभी बहुत लंबा रास्ता तय करना होगा हमारे समाज को।
इसी संदर्भ में एक और ख़ास बात जिसका जिक्र करना यहाँ बहुत जरूरी है कि इस वीडियो का सबसे ज्यादा विरोध यह कहकर किया गया कि यह सिर्फ अर्बन महिलाओं का प्रतिनिधित्व करता है। हाशिये पर पड़े निम्न तबके और ग्रामीण महिलाओं की मुश्किलें कुछ और हैं। गौर करें तो सारी समस्या ही निर्णय नहीं ले पाने की है। निर्णय के सारे रास्तों पर अदृश्य मोटे ताले जड़ दिये गए हैं और हैरत की बात है कि उनकी चाभियाँ भी औरतों को ही थमा दी गईं हैं ताकि वह पूरी ज़िंदगी ख़ुद भी डरती रहे अपने फ़ैसलों से और अपनी अगली पीढ़ियों को भी यह सीख थमाती रहे कि मन को मारो, उसकी सुनो नहीं।
और जिन्हे आप निम्न तबका कहते हैं, वह मध्यम वर्गीय, तथाकथित शिक्षित, आधुनिक महिलाओं से कहीं ज़्यादा सचेत और आत्मनिर्भर है। उन्हें पता है कि अपनी रोटी ख़ुद कमानी है तो जीवन भी अपनी मर्ज़ी का ही जीना है। उनके लिए सबसे बड़ा प्रश्न है अपने अस्तित्व को बचाए रखना और इसके लिए उन्होने बहुत पहले स्वनिर्भरता का पाठ पढ़ लिया है।  
I am the universe, Infinite in every direction॰ जरूरी है कि हम स्त्रियाँ अपनी क्षमता पहचाने। अपनी आत्मा, अपने दिमाग को रोशन करें और इतनी सशक्त बने कि खुद निर्णय लेने और उस पर अडिग रहने की हिम्मत जुटा सकें। एंड प्लीज ग्रो अप, सेक्स की बात आते ही तमाम आदर्शें न बघारने लगें कि स्त्रियों की आजादी का मतलब कुछ और है, शरीर की आज़ादी असली आज़ादी नहीं है आदि। एक्सेप्ट करना सीखिए कि सेक्स एक स्त्री के लिए भी उतना ही जरूरी है जितना एक पुरुष के लिए और उसे भी उसपर बात करने का पूरा अधिकार है। वस्तुतः शरीर की आज़ादी तभी संभव है जब आत्मा और दिमाग आज़ाद हों। यह सभी एक दूसरे से जुड़े हैं और जरूरी है कि इन्हें अलग कर के नहीं देखा जाए। एक विकसित और समर्थ दिमाग की स्त्री कभी भी अपने शरीर पर अत्याचार बर्दाश्त नहीं करेगी। वह थकेगी, हारेगी लेकिन टूट कर बिखरेगी नहीं। यही वास्तव में स्त्री सशक्तिकरण होगा। 

यह आर्टिक्ल आप यहाँ भी पढ़ सकते हैं : http://liveindiahindi.com/wonder-women-freedom-empowerment





लेखक परिचय 




नाम : रश्मि भारद्वाज

जन्मस्थान- मुजफ्फरपुर, बिहार

शिक्षा -अँग्रेजी साहित्य से एम.फिल
पत्रकारिता में डिप्लोमा
वर्तमान में पी.एच.डी शोध (अँग्रेजी साहित्य)
दैनिक जागरण, आज आदि प्रमुख समाचार पत्रों में रिपोर्टर और सब - एडिटर के तौर पर कार्य का चार वर्षों का अनुभव ,वर्तमान में अध्यापन और स्वतंत्र लेखन। ( उत्तर प्रदेश टेक्निकल यूनिवर्सिटी द्वारा अधीनस्थ विश्वेश्वरया कॉलेज में असिस्टेंट प्रोफेसर के पद पर कार्यरत )
अनेक पत्र पत्रिकाओं में विविध विषयों पर आलेख एवं कविताएँ प्रकाशित। मुजफ्फरपुर दूरदर्शन से जुड़ाव। 
बोधि प्रकाशन , जयपुर द्वारा फरवरी 2015 में प्रकाशित और वरिष्ठ कवि विजेंद्र सिंह द्वारा संपादित 100 चुनिन्दा कवियों के संकलन में रचनाएँ चयनित।
पता: 129, 2nd फ्लोर, ज्ञानखंड-3, इंदिरापुरम, गाजियाबाद, उत्तरप्रदेश-201014
ईमेल: mail.rashmi11@gmail.com
वेब मैगज़ीनwww.merakipatrika.com का संपादन
ब्लॉग: जाणा जोगी दे नाल (www.rashmibhardwaj.blogspot.in)






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बिल्कुल सही कहा रश्मि आज की जरूरत है समाज को आईना दिखाना और जो तुमने कहा या जो माय चॉइस विडियो में दिखाया गया वो सब मैंने अपनी एक कविता में लिखा था कुछ हद तक जो मेरे कविता संग्रह ' बदलती सोच के नए अर्थ ' में संगृहीत है :



अच्छा आलेख

बहुत अच्छा लेख. सदियों से महिलाओं की दुनिया एक चारदीवारें के जंगले में समाप्त मानी जाती है, उनको कभी अपने पिता, कभी भाई, कभी पति तो कभी बेटे के आगे झुकना होता है. पिछले कुछ सालों में कुछ बदलाव हुए हैं वो नाकाफ़ी हैं.
जब तक स्त्रियों को सम्पूर्ण आज़ादी नहीं मिलती, तब तक एक समान अधिकार वाली बात एक मज़ाक़ ही लगती है. किसी भी महिला को पुरुष के बिलकुल बराबर अधिकार मिलने ही चाहिए. It is the need of time.

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