कविता में स्त्री - कुछ तुम्हारी नज़र, कुछ हमारी

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कोई महिमामंडन नहीं करूंगी, किसी विशेषण, किसी अलंकरण से नहीं सजाऊँगी। स्त्री, तुम मानुषी हो, खुल कर सांस ले पाओ, जी पाओ हर गिरह खोलकर। कविता भी शायद एक स्त्री ही है। जीती –जागती, धड़कती, कभी ढेर सारा दर्द, कभी बेइंतिहा खुशी। स्त्री न हो तो क्या होगा जीवन! कविता नहीं हो तो कितना नीरस, कितना यांत्रिक होगा मन! स्त्री और कविता ....आओ इनको साथ बुन लें ....थोड़ा स्त्री जी लें अपने भीतर ...  



लड़कियाँ
लड़कियाँ जिद नही करतीं चंद-खिलौने की
वे चंदा को आरे-पारे नदिया किनारे बुलाने की भी जिद नहीं करतीं
कभी नहीं मांगतीं सोने के कटोरे में दूध-भात
वे तो भैया-बाबू की थाली की जूठन से चुपचाप पेट भरती हैं
लड़कियाँ जन्मते ही जान लेती हैं
गूलर के फूल नहीं होते
वे जानती हैं लड़कियाँ पेड़ पर नहीं चढ़तीं
डाल पकड़ नहीं लटकतीं
वे तो नीचे गिरे फलों से पतिंगे निकाल
इधर-उधर देख
धीरे से
एक साफ टुकड़ा मुँह में धर लेती हैं
चुभलाती हैं उसे डरते-डरते
उबकाई को काबू करते
लड़कियाँ जानती हैं
उनकी किताब के हर पन्ने पर
एक ही शब्द लिखा है-
असंभव
कैसा कलयुग आया है आज
कि इस लड़की को तो देखो-
गूलर के फूल मांग रही है!


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हंसती हुई लडकियां   

अँधेरे में हंस रही हैं दो लड़कियां
अवसाद को दूर ठेलती
हंस रही हैं लड़कियां
अपने हाथ से मुहं को ढके
वह उस हंसी को रोकने की कोशिश कर रही हैं।
मगर हंसी है
कि फिसलती चली आ रही है उनके होठो से
हाथो के द्वारों की झीनी दरारों से
जैसे
सीटी में फिसलते चले आते हैं सुर
सन्नाटे में फिसल आता है डर
भूख में फिसल आती है याचना
कविता में जीवन
वैसे ही फिसलती हुई हंसी हंस रही हैं लड़कियां
नींद में डूबे पेड़
उनकी हंसी सुन आँखे मलते उठ गये हैं
और फिसलने लगे हैं उनके पीछे
फिसलने लगे हैं पतंगे
मद्धम रौशनी के नाईट बल्ब और सुदूर आसमान में सितारे
फिसलने लगी हैं दिशाएं
झींगुरो की सन्नाटे को तोडती ध्वनियाँ फिसल रही हैं
फिसल रहा है शराबी का सारा मज़ा
और दिशाओं के क़दमों के नीचे दबे तमाम सूखे पत्ते
अखबारों की सुर्खियाँ जो अभी अभी अखबारों पर बैठी थी फिसलने लगी हैं हंसी के पीछे
मैं इस हंसी को जानती हूँ
एक सदी पहले मैं भी ऐसे ही हंसी थी
तब
बैल के सींग झड गये थे पीपल के पत्ते
रानी पागल हो गई थी
और नदी लाल हो गई थी
लड़कियों की हंसी से अक्सर ऐसी ही हो जाती हैं अनहोनियाँ
फिर भी इस छोटी उम्र में हंसती हैं दो लड़कियां
अँधेरे में
जहाँ वह सोचती हैं उन्हें कोई नहीं देख रहा
लेकिन उनकी हंसी के पीछे एक काफिला चल देता है
जो पहले सम्मोहित होता है
और आँखे बंद किये चलता है पीछे पीछे
फिर जान जाता है जब रहस्य उनकी हंसी का
तब
समूचा निगल लेता है उस हंसी को
और उसकी एक तस्वीर समय के हाथ दंतकथाओं को सौंप देता है
दंतकथाएं फिसलन को धूल की तरह झाड कर हिफाज़त से सम्हाल लेती हैं उस हंसी को
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आइये मनाएं महिला दिवस
शायद कल हट सकें
अस्पतालों के बाहर लगी तख्तियां
जिन पर लिखा होता है
"यहाँ लिंग परिक्षण नहीं किया जाता"
(जो इशारा मात्र होता है
यह बताने को 
हां यहाँ ये संभव है यहाँ
कि शायद बंद हो सके
दी जाने वाली बधाईयां
पुत्र जन्म पर
गाये जाने वाले सोहर
बजाई जाने वाली थाली
हिजड़ों के नाच
और बेटी के जन्म पर
"कोई नहीं जी आजकल तो
बेटे और बेटी बराबर हैं"
कि शायद फिर न
नोच कर फेक दी जाए
गटर के पास कोई कन्या
जो पिछले नवरात्रों में
पूजी गयी थी
देवी के नाम पर
कि शायद बंद हो सके चकले
जहाँ हर दिन औरत
तौलकर खरीदी जाती है
बकरे और मुर्गे
के गोश्त के भाव
कि शायद जीवन साथी चुनते समय
देखी जाए सिर्फ और सिर्फ लड़की
न तौली जाए रूपए या रसूख के पलड़े पर
और फिर न उठानी पड़े किसी बाप को अपनी
जिन्दा जला दी गयी बेटी की लाश
कि शायद खाली पेट
और दोहरी हुई पीठ
पर बच्चा बांधे
सर पर सीमेंट का टोकरा लिए
बिल्डिंग की इमारत पर चढ़ती औरत
न तौली  जाए
ठेकेदार की नज़रों से
रात के स्वाद परिवर्तन के लिए
कि शायद फिर न
कोई प्यारी खूबसूरत शक्ल
जला दी जाए एसिड से
अस्वीकार करने पर
अवांछित प्रणय निवेदन
कि औरते  मानी जाए
देह से परे भी कुछ
बलत्कृत न हों हर बार
घर से बाहर निकलने पर
भीतर तक भेदती निगाहों से
और उन गालियों से
जो हमारे पुरुषों को दी जाती हैं
हमारे नाम पर
हमें भी स्वीकार कर लिया जाए
सामान्य इंसान की तरह
आइये मनाये महिला दिवस
इस उम्मीद के साथ
की अगले वर्ष कुछ तो
बदला रहेगा हमारे लिए
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माफ करना मुझे
कच्ची मिट्टी सी होती हैं अच्छी बेटियाँ,
पकाई नहीं जाती आंच पर
गढ़ा जाता है उन्हें ताउम्र ज़रूरत के हिसाब से
फिर एक दिन बिखेर कर
कर दिया जाता है हवाले नए कुम्हार के
कि वह ढाल सके उसे अपने रूप में

मुंह में ज़ुबान नहीं रखती अच्छी पत्नियाँ
उन्हें होना चाहिए मेमनों की तरह
प्यारी, मासूम, निर्दोष, असमर्थ
जो ज़िबह होते हुए भी
समेटे हों आँखों में करुणा, क्षमा और प्रेम

अच्छी माएँ, निर्मित करती हैं परिवार का भविष्य
खींचने के लिए एक चरमराती गाड़ी
वह तैयार करती है बैलों को
खत्म कर देती है कोख में ही
कितनी धड़कनें
एकाध आँसुओं के अर्घ्य से

माफ करना मुझे,
कि मैंने नहीं सुनी तुम्हारी सीख
कि मुझे भी होना था
एक अच्छी बेटी, पत्नी या माँ
कि इन्हीं से बनता है घर

दरअसल मैंने सुन ली थी
उन घरों की नींव में दफन
सिसकियाँ और आहें,
कि मैंने समझ लिया था कि
उन दीवारों मे चुनी जाती हैं कई ज़िंदा ख्वाहिशें
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आपका मौन ही बेहतर होगा यहाँ
वर्जनाएं समझते हैं ?

आँख की तरेर..
भाव भंगिमा से बरता जाना?
देह समझते हैं??
वैसे नहीं... ना..
ये.. ये..
भीतर की बेचैनी
समझते हैं क्या?
बताइए ना..
या बस
नयन.. स्पर्श.. भोग सुख!!?
कैसे कहूँ
ये बेबात की उदासी
क्यों धर लेती है
क्यों कुछ भी कहने से
पहले और बाद में भी
चेहरे पढ़ने लगती हैं
आँखें और ज़ोर-ज़ोर से
धड़कता है मन
कैसा लगता है अपना
ही नया नाम
बारबार नए सिग्नेचर की
प्रैक्टिस
विदा शब्द कितना फाइनल
सा लगता है
गृहप्रवेश कभी भी
पूरा हुआ नहीं लगता
हर घर के नमक का अंदाज़
चाय का स्वाद
बेलन का वजन
अलग होता है
क्या जानते हैं आप?
माँ-पिता का एडजस्ट करना
बिना दोष के भी घबराई आँखों लिए
अहमियत के नए पिरामिड में खप जाना
महसूस किया है कभी?
बच्चे कब कैसे कहाँ
कितने खर्च में
कितने नेग में
आएंगे ? ये सोचा है कभी?
अड्जस्टमेंट्स का समूचा पहाड़
एक अकेली की पीठ पर ही क्यों ?
बताइये न.. क्यों??
माँ घर पर अकेली लगीं होंगी
उनकी भी टूट रही होगी पीठ
टीस रहा होगा घुटना
तलब लगी होगी चाय की
मार ली होगी..
पिता धुंधली आँखों से
आदत के सहारे जी रहे होंगे जीवन
फ़ोन भी सोच कर करते हैं
कहीं बिटिया की गृहस्थी
डिस्टर्ब न हो जाये
जब कुछ समझते ही नहीं
तब कैसे जान सकते हैं
पीड़ा उखड़ कर रोपे जाने की?
मत कहा करें समझते हैं..

आपका मौन ही बेहतर होगा यहाँ

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भीतर-बाहर की स्‍त्री

स्‍त्री के रक्‍त से बना था सूरज
स्‍त्री का भीतर होना तय था
कि इस संबंध का कोई नाम संभव नहीं था
इस संबंध से बचा नहीं जा सकता, यह जानता भले ना हो
महसूस तो होता था....
भीतर थी कोई स्‍त्री
कि जिसके साथ पलना था, बढ़ना था....
स्‍त्री की संगत में कैसे बचेगा पुरुष...
पुरुष को पुरुष बनाने के लिए की गई
व्‍यवस्‍थाओं ने खींच लिए ....हथियार
कैसे मारा जाता है स्‍त्री को
यह पहले ही पाठ में पढ़ लिया उसने.....
लड़का होकर रोता है....सूरज...
छि...क्या लड़कियों जैसे बाल बना रखे हैं
ये क्या पहन लिया....
एकदम लड़की सा लगता है...
ये गुलाबी रंग.....हा हा .....लड़कियां पहनती हैं....
कि उसे पता था स्‍त्री हो जाना शाप है....
तभी तो भाई कहता है,
क्‍खन सुधार ले....अगले जनम में लड़की बनेगा नहीं तो....
तुझे ही तो बहन की रक्षा करनी है....चाहे बड़ी है तुमसे...
मर्द होकर रोता है सूरज........तुझे तो सबसे आगे रहना है....संभालना है सबको....
उसके भीतर की स्त्री मर गई....सदा के लिए
स्‍त्री को मारना...मारते चले जाना और.....मार डालना बस एक अभ्‍यास है....
वह आदी हो गया ....स्त्री को मारने का...
जान गया वह ताड़न की अधिकारी का अर्थ क्‍या है....

भीतर की स्‍त्री को मार डालने के बाद....अब बारी किसकी है....सूरज को ठीक से पता है....
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शिवकली के लिए
एक औरत अपनी देह का
मालिकाना हक़ मांग रही है
औरत की देह के इजारदारों
सुन रहे हो

एक अनपढ़ औरत तैयार है
तुम्हारी हुकुम अदूली के लिए
तुम्हारी लज्जा, शील, भय, भावुकता,
के हथियारों को धत्ता बताते

जीने का इरादा लिए
मरने को तैयार
तुम्हारे रचे व्यूह के बीच मुनादी करती
तुम्हारे गौरव पर पैर रख
विकल जाना चाहती है एक औरत 
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सपनों में रोती हुई स्‍त्री
मेरे सपनों में अक्‍सर
वो आती है रोती हुई
उसकी घुटी-घुटी चीखें
कांपती हुई दीये की लौ जैसी आवाज़
अंधेरों को चीरकर मुझ तक आती है
भूख से बेहाल
पति से परेशान
बच्‍चों से उपेक्षित
एक स्‍त्री रोती है चुपचाप
उसकी रुलाई मेरे गले में
उमड़ती-घुमड़ती है
एक आवाज़ शब्‍दों में बदलने को बेताब हो जैसे
सदियों से रोती आई है एक स्‍त्री इसी तरह
कविता में उसकी रुलाई का
कोई अनुवाद संभव नहीं हुआ मुझसे
उसकी कातर आंखों में नहीं तैरते
प्रेम-प्रणय के स्‍वप्‍न भरे दृश्‍य
जाने कितने दरवाज़ों में बंद हैं
उसकी पीड़ा और दुखों की गठरियां बेहिसाब
जाने कितनी दीवारें खड़ी कर दी हैं उसने
अपनी दुनिया के इर्द-गिर्द कि
उसकी रुलाई सिर्फ़ सपनों में ही सुनाई देती है
मैं थाम लेना चाहता हूं उसकी हिचकियां
पोंछ देना चाहता हूं उसके आंसू
दुनिया के सामने उसकी नकली मुस्‍कान का परदा
हटा देना चाहता हूं मैं लेकिन
एक हाथ से मुंह ढांप कर
रुलाई को बाहर आने से बचाती हुई वह
दूसरे हाथ से रोक देती है मुझे भी
मेरे सपनों में हाहाकार मचाने वाली
कभी दिन के उजालों में मिले तो
कैसे पहचान पाउंगा मैं
एक रोती हुई स्‍त्री
दिन की रोशनी में सिर्फ़
मृत्‍यु की अभ्‍यर्थना करती है
व्रत, उपवास और प्रार्थनाओं से
एक अज्ञात ईश्‍वर को रिझाकर
जीवन बदल देने की प्रार्थना करती स्‍त्री के आंसू
पूजाघरों में स्‍वीकार्य नहीं होते
जिंदगी के दुखों का मैल है आंसू
तमाम धर्मों में वर्जित हैं
स्‍त्री के आंसुओं के नैवेद्य
स्‍वप्‍न के जाने कौनसे क्षण में
अदृश्‍य हो जाती है वह स्‍त्री
भूख और पीड़ा कब
बच्‍चों की लोरियों की तरह
नींद की चादर तान कर
सुला देती है उसे और मुझे
सुबह की ठण्‍डी हवा में
सूख चुके आंसुओं की नमी है
पक्षियों के कलरव में जैसे
उस स्‍त्री की रुलाई के गीत हैं
बादलों की चित्रकारी में उसका चेहरा है
और मैं आकाश की तरह
चुपचाप सुनता हूं जैसे
पृथ्‍वी का हाहाकार।

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आधा दिन और आधी रात ले कर जन्मती हैं स्त्रियाँ
फूलों की तरह महकती हैं स्त्रियाँ
वे हर सुबह जागती हैं कोयल की तरह
किसी नए गीत के साथ
अपनी धुरी पर दिन भर घूमती हैं पृथ्वी की तरह;
सूर्य नमस्कार करते हुए रहती हैं
अपने दायित्वों में निमग्न
स्त्रियाँ साँझ के धुँधलके में चुपचाप किसी नदी की तरह
विलीन हो जाती हैं समुद्र में
जैसे मिलती है प्रेयसी चाँद की साक्षी में
उनका होना रचता है सृष्टि और संसार
स्त्रियाँ सिरजती हैं रंग
बिना चुराए इंद्रधनुष से
वे लजाती हैं तो उपजता है लाल
खिल-खिलाती हैं तो पीली हो जाती है सरसों,
त्राटक करते हैं सूरज मुखी के फूल
वे इठलाती हैं तो हो जाते हैं गुलाबी सारे गुलाब
तानती हैं भृकुटि तो ढलने लगती है शाम
उनके सपनों मेंनिर्बाध घूमती हैं रंग बिरंगी तितलियाँ
युद्ध, घृणा और हिंसा के ताण्डव में
कोई नहीं गिनता उनके ज़ख्म
हलाल करने से पहले
उन्हें कोई नहीं ललकारता
धर्मयुद्ध के लिए
बस उन्हें तो काटा जाता है सब्ज़ियों की तरह
छीला जाता है फलों की तरह
और भूना जाता है गोश्त की तरह
सारे रंग सुलगने लगते हैं कोयले की तरह
राख हो जाने तक
स्त्रियाँ छटपटाती हैं
गर्भ से बाहर खुली हवा में साँस लेने के लिए
खिलने के लिए किसी फूल की तरह
जिन्हें कत्ल कर दिया जाता है
माँ की सहमति से
माँ के पेट में ही
स्त्रियाँ बचाए रखना चाहती हैं दुनिया
भविष्य के पुरुषों के लिए
जब भी देखता हूँ
किसी स्त्री का हँसता हुआ चेहरा
मैं नज़र अंदाज़ नहीं कर पाता
दुख, यातना और अपमान का अँधेरा
धरती की तरह
आधा दिन और आधी रात ले कर जन्मती हैं स्त्रियाँ। 
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मैंने उस हंसती-खेलती औरत को बहुत बार नाराज़ होकर देखा है,
वह अपने घर के दालान में उंकड़ू बैठी कुछ तो तलाश रही थी
मिट्टी में झाड़ू से कुछ उकेर रही थी या भटका रही थी अपना मन?
न जाने,
कितनी उपेक्षा, थोड़ी-सी घृणा और खीज के साथ उसे देखता रहा मैं!
मैं,
कड़वी हंसी के साथ वो नाम अपनी जीभ पर तेज़ाब की तरह रखता हूं
कहते हुए --
यही है वो लड़की, जिसने छोड़ दिया एक रिश्ता,
न जाने किन सुखों की खातिर
और दे देता हूं, कृतघ्न, बेवफा और बुरे इंसान का तमगा!
लड़कियां बहुत जल्दी ढल जाती हैं,
वे भूल जाती हैं पुराने रिश्ते,
यहां तक कि पुराने घर,
पुराने रास्तों की बस मद्धम सी याद मन में कहीं होती होगी!
लेकिन यह कितना सच है और कितना झूठ,
यही सब आरोप, जो आसानी से लगा दिए जाते हैं?
स्त्रियों ने भूल जाना सिर्फ चेहरे और हंसी में लिखा है,
तभी वे भूल पाईं मायके में मिला प्रेम,
गांव-ताल-बाग-शाला-साथ का सुख,
वे बिसरा पाईं प्रेमियों और सहेलियों का नेह...

वे जानती हैं,
उनके सब बिसरा देने का कलंक ओढ़ लेने से,
भले ही नष्ट होती रहें वे,
नहीं खत्म होंगे कुछ भले बने रहे परिवार।
यह एक अनगढ़ कविता जैसी कुछ विद्रूप चीज है,
लेकिन यहीं वो पीड़ा है,
जो पढ़ी नहीं गई
और जिसे बयान करने के लिए,
नहीं हैं मेरे पास शब्द !
मैं एक स्त्री की तरह करना चाहता हूं प्रेम
और फिर उसे भुला देने वाली कलंकिनी जैसा कहा जाना चाहता हूं.
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सभी चित्र वरिष्ठ कवि, आलोचक एवं चित्रकार श्री विजेंद्र जी के हैं। 



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बहुत बहुत बढ़िया रचनाऐं । बधाई रश्मि भारद्वाज जी

सुंदर चित्र व् ह्रदय स्पर्शी रचनाएँ.रचनाकारों का हार्दिक अभिनंदन.

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