दीपक अरोड़ा की प्रेम कविताएँ

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सिकुड़ते और फैलते , रेटिना की शरारतों में , उसने कब मुझे पढ़ लिया , मुझे पता भी नहीं चला , लफ़्ज़ों से मेरा गला रेतते हुए , उसने पूछा ,"दर्द ?" मैंने कोने में बैठे , बुद्ध की करुणामयी आँखों में झाँका , और कहा ,"नहीं |" ************************************** 
उस दिन से , मैं रोज़ बुलाता हूँ तुम्हे , अपनी कविता में,जैसे मरने से पहले कोई बुलाये , पादरी को , और कनफैशन किये बिना , उसे विदा करदे , एक कप काफी पिला कर. 



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1.   

तुम्हे देखना
भिखारी के कटोरे का
लबालब भरना है
ना देख पाना रेगिस्तान में घूमने निकले
नितांत अकेले की मश्क का रीत जाना है !
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तुम्हे तो पता है न
बोल ही तो नहीं पाता मैं
पर कह दूँगा इस बार
मुझे जाना ही नहीं है
यह पृथ्वी छोड़ कर जबतक
तम यहाँ हो
और तुम तो रहोगी ही
क्योँकि तुम्हारे होने से ही है
पृथ्वी भी पृथ्वी !
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रोज़ मिलने की ख्वाहिश
और कभी न मिलने के अहद में
उलझी जिंदगी
कसाई की दूकान पर ,हुक से टंगे
उलटे लटके बकरे सी हो गयी है
सीने से खून टपकता है
कपडा मार कसाई हर नए ग्राहक से
पूछ लेता है ,क्या दूँ साहिब ?
एल रोता दिल ,एक फूंका जिगर या फिर
एक बेचैन जेहन ?



2.  तो पढ़ा मैंने अपना चेहरा भी

धीरे से बदल जाती है दुनिया,
एक शोर से भरी सड़क से,
बिना पानी की झील सी स्तब्धता में,
डूबती तैरती,हरे पत्तों के बीच के अन्धकार सी रौशनी,
मेरे चेहरे पर तुम्हारा चेहरा छाप देती है .

अपने होने के भीतर भर जाता है,
तुम्हारे होने का पानी,
प्रेम में होने की निरीहता,
चेहरे से ओले की तरह टपकती है,
मैं जानता हूँ उन पलों में होता हूँ मैं,
कील निकले मुहांसे सा ,दीगर
कोई मिला कर नहीं देखता मेरे चेहरे को,
मेरे चेहरे से उस एक पल में .

मेरी मुस्कराहट में खाई में उतरते होने सा अवसाद,
मेरी नाक की नोक पर टिकी शिकारी कुत्ते सी सूंघ,
तुम्हे मेरे आसपास टोहती है,
अपने भीतर मैं देख रहा होता हूँ,
घुप्प अँधेरे में फड़फड़ा उड़ते कबूतरों को .
(बहुत दिन निर्वात में तुमसे बतियाते,आज आईना देखा .....तो पढ़ा मैंने अपना चेहरा भी )


3.   

उसने गिन कर चार धान पानी में बहाये, अक्षत की कल्पना और कामना दोनों को नीले रंग से रंगा। एक हरे भरे खेत के बारे में सोचा, जबकि पता था उसे, धान दानों से नहीं होता...घुटनों पर झुक, उसकी कलम लगानी पड़ती है। पानी में डूबी, कच्ची मिट्टी कुरेदती उँगलियों के नाखूनों में, एक नाम लिखा जाता है, जो सुबह को एक अंजान लिपि में लिखा हर्फ लगता है। चार दाने....

चार सौ पच्चीस नंबर बस के पायेदान पर
कदम रखते ही, सोचा उसने
शायद आज उसे ना आना हो
या शायद वह चढ़ गया हो इस बार भी
नेहरू प्लेस की जगह
दरियागंज जाती बस में

तलब एक मुजस्समा है
जो देख सके दुनिया
कि सिर्फ आँख कह देती है
तुम्हें जाना है जमुना पार
या गुजार देना है वक्त
सही बस तलाशते हुए
और संझा को कह देना है
मैं  अजनबी हूँ तुम्हारे शहर में
एक बार मुझे बताओ
तुम तक पहुँचने के रास्ते
कहाँ कहाँ से गुजरते हैं

बताओ मुझे
सब रास्ते पार कर चुकने के बाद भी
क्या हम पीयेंगे कॉफी
एक ही मेज के दोनों ओर बैठ
बेशक, तुम पीना मद्रासी कॉफी
और मैं एस्प्रेस्सो

दरअसल शहर मुद्दा नहीं होता
बस तो कत्तई नहीं
कॉफी कोई मसाला ही नहीं
नेहरू प्लेस एक काल्पनिक जगह है
सवाल कोई और है
तुम्हें पता है वह सवाल क्या है



4.   

वक्त के होठों पर एक प्रेमगीत लिखा था। वक्त चाहता था, वह गीत आज की रात कोई किसी के लिए गाये। गाने वाले सुर तलाशने थे, सुनने वाले के कान। लड़के ने अपनी आँख में भरी प्यास को मृगतृष्णा बनाया है और रेत के बीचोंबीच अपना अपना पहला कदम रखते हुए कुछ यूं सोचा –

बहुत थोड़े से अंतराल में
शब्दों ने कहना सीख लिया
वह सब भी जो भाषा ने कभी नहीं सिखाया
व्याकरण में उलझे, शालीनता ढोते
उसके स्वर ने साथ दिया
उलझे उलझे सुलझते हुए
वह कह पाया, प्रेम

जानते हुए भी अपने अकेलेपन को
एक सुन्न, चुप, मुरझाये कमरे में
अपनी कमीज उतार
उसने अपने फेफड़ों में भरी खूब सारी हवा
मकड़ी के जालों को ताकते हुए
अलगनी पर टंगे, कपड़ों को
मुलायम उँगलियों से सहलाते
फिर कह पाया वह प्रेम

चार अलग अलग दिशाएँ
सोते से जाग, सिहर उठीं, कि
लोग रोते सिसकते थे और
फुसफुसाते थे प्रेम
उद्दाम वेग, कामना और प्यास से भरे
कुछ देर से नहीं कहा था किसी ने
फिर फिर फिर कहता रहा वह प्रेम


5.   

शहर के सूनेपन ,और
तुम्हारी चुप्पी
दोनों के साथ,
एक साथ निबाह और
संभव नहीं था .
इसीलिए रुई के सट्टे में
दिवालिया हुए सेठों की तरह,
मैंने रातोंरात घर छोड़ दिया
चंद तस्वीरें बुतां, कुछ हसीनो के खतूत,की
तर्ज़ पर निकलते हुए
मैंने अपने साथ रखी
एक पीले कागजों वाली कापी
जिसमे अनगिनत ख़त थे,
जो मैंने तुम्हे लिखे,और
कभी भेजे नहीं,
स्कूल की एक पोस्टकार्ड,
साइज़ फोटो जिसमें,
तुम दूसरी लाइन में ,
बाएं से चौथे नम्बर पर खड़ी हो ,और
मैं तीसरी लाइन में दायें से पांचवें ,और
उस शहर का आसमान ,
जिसमें सितारे बहुत थे, पर
चाँद एक ही .
2 .
समय बहुत
निकल गया है ,पर
आज भी जहाँ कहीं मैं जाता हूँ ,
हर पता
उसी पीली कापी में
लिखता हूँ ,
हर रात तुम्हारे शहर के
उसी आसमान की
चादर ओढ़ कर सोता हूँ,और
उसी तस्वीर को
धुंधलाती आँखों से
देखता हूँ ,
जिसमें सितारे बहुत हैं,पर
चाँद एक ही .





दीपक अरोड़ा 
 "मैं कविता क्यों लिखता हूँ ?
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गोया मैं पानी क्यों पीता हूँ ?रोटी क्यों खाता हूँ ?नींद क्यों लेता हूँ ...............इसी तर्ज़ का सवाल है . मैं कविता लिखता हूँ ,कि मेरी दैहिक /जैविक आवश्यकताओं की तरह ,और उतनी ही सच्ची मानसिक और भावात्मक इच्छा अपनी अभिव्यक्ति की भी है . मैं जब कविता लिख रहा होता हूँ .....तब मैं कुछ कह रहा होता हूँ .........जिसे मैं सोचता हूँ कुछ लोग समझेंगे . दीगर अपने भीतर ही भीतर मैं कह रहा होता हूँ ,"बक रहा हूँ जुनूँ में क्या क्या मैं .....खुद करे कुछ ना समझे कोई ."

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