आयुष झा आस्तीक

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नाम: आयुष झा आस्तीक
जन्म तिथी06 /06 /1989
स्थायी पता: आयुष झा आस्तीक पिता - श्री मिथिलेश झा ग्राम - रामपुर आदि पोस्ट - भरगामा जिला - अररिया ( बिहार ) पिन नं – 85434
परिचय: यांत्रिकी अभियंता नोयडा ( देल्ही )
जवाहर उच्च विद्यालय भरगामा ( अररिया) से मैट्रीकुलेशन
आर के डी काॅलेज कंकड़बाग ( पटना ) से इंटरमिडीयट ( बारहवीं )
आइआइटीटी कालाम्ब सिरमौर ( हिमाचल प्रदेश ) से मैकनिकल इंजीनियरिंग शैक्षणिक सत्र - 2009-13
शौख - सोचना लिखना और फिर पढना खाना बनाना , पुराने गीत-गजल सुनना शतरंज,सुडोकू खेलना म्युजिक कम्पोज करना और यात्रा करना
आइकन - मेरे पापा
लेखनी में आदर्श - रेणू जी , गुलजार साहेब
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कविता स्वयं से स्वयं का संवाद है ।
मौन संवाद के दौरान मेरा पागलपन बाध्य करता है मुझे दिन को दिन और रात को रात कहने के लिए।
मेरी जिज्ञासा उकसाती रहती है मुझे कविता लिखने के लिए मैं अनसुलझे हालात को गुदगूदाता रहता हूँ ख्वाहिशों की पीपनी में उम्मीदों की पोटली टाँग कर मैं नाकामयाबी की पीठ थपथपाता रहता हूँ ।
लिखता हूँ शायद इसलिए जिंदा हूँ, यकीनन मैं लिखने के लिए ही जिंदा हूँ ।
ना लिख सकने की स्थिति में भी मैं लिखते रहना चाहता हूँ शायद मैं मरने के बाद भी जिंदा रहना चाहता हूँ ।
यानि लिखना मेरा स्वार्थ है, यकीनन यह स्वार्थ भी निःस्वार्थ है
अब यह सवाल उठना भी लाजिमी है कि गर मैं कविता नही लिखता तो मैं क्या कर रहा होता मुझे लगता है कि कविता नही लिखने की स्थिति में भी मैं कविता ही लिख रहा होता कविता ना लिख पाने की वजह पर अनगिनत कवितायें
मेरी कविता पैराशूट के तरह मुझे हौसला देती है हालात के इस दलदल से निकलने लिए हालात ऐसा कि आगे चक्रवात और पिछे सुनामी बचना/सँभलना तो छोडिए डेढ सुई भर जगह तक नही की जहाँ निश्चिंत होकर आँक्सीजन ग्रहन करते हुए श्वसन क्रिया को होने दूँ संपादीत आवारा साँढों का एक जत्था मेरी गुलाबी ख्वाबों के तरफ खींचा चला आ रहा है मधुमक्खियाँ मेरी चिनीयाही ख्वाहिशों को चूस कर शहद इकट्ठा करना चाह रही है

भूख से बिलबिलाते हुए शहर के बेबस लाचार किसान के आँखों में पढा है मैंने उनकी आखिरी ख्वाहिश.. जब आत्महत्या करने से पूर्व वह मुझसे आग्रह करते हैं कि कोरे कागज पर रोटी लिखना चाहिए मुझे कविता लिखने से पहले ... या कागज पर हरे रंग की रौशनाई छींटते हुए पटसन/जूट उगाना चाहिए मुझे जिससे कि फाँसी का फंदा बूनने में सहूलियत हो उन्हें दरअसल वो मरे हुए लौग हैं जो अपने बच्चों के सुनहरे भविष्य के लिए जिंदा होने का नाटक कर रहे हैं शायद इसलिए वो नाउम्मीदी का पौधा रौपना चाहते हैं मेरी उम्मीदों के कब्र पर ... और मैं, हा हा हाँ मैं पागल हूँ जो फिर भी उडना चाहता हूँ नील गगन में अपनी कविता को पैराशूट समझ कर ... उडनखटोला में उडने वाले कुछ अय्यास जंगली दरियाई घोडे के चेहरे पर व्यंगनात्मक मुस्कान जो मेरे हौसले को सम्मान देने के बजाए ठहाके लगा रहे हैं मेरी पागलपन पर ... पैराशूट के चारों और हवा में गोल गोल चक्कर लगाते हुए वे यथासंभव मुझे नीचा दिखलाने के लिए हैं प्रयासरत मगर सब व्यर्थ जब मैं उन्नयन कोण बनाकर हवा में ठूक उछालते हुए करता हूँ पलायन वेग को परिभाषीत।

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