जब भी जागूँगा - पंकज की कुछ कविताएँ

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2014 में इन्फॉर्मेशन टेक्नालजी से इंजीनियरिंग की डिग्री लेने वाले पंकज में संभावनाएं हैं, कविता का रॉ मटीरियल है जो इंजीनियरिंग की सख्त पढ़ाई के बीच भी साँसे ले रहा। उम्मीद है कि पंकज अपनी इस प्रतिभा को पहचानेंगे और तेज़ भागती ज़िंदगी से समय चुराकर कुछ समय सृजन के नाम करते रहेंगे ..... युवा सपनों और प्रेम की बेचैनी से भरी पंकज सिंह की कुछ कविताएं जिनकी सहजता बाध्य करती है कि उन्हे पढ़ा जाये .....

(1)


जब कभी जागूँगा
तो तुम्हारी बात करूंगा,
अभी नींद मे हूँ
मुझे सोया रहने दो।
एक ख्वाब देखूंगा
दूसरी दुनिया का,
उड़ते परिंदो का,
गिरते झरनो का,
अभी वहम मे हूँ
मुझे खोया रहने दो।
अब आज नही
कल तुम आना
मरहम अपना तब लगाना
किस्से फिर सुनाना
बीती बातें सारी बताना...
पर आज नही
तुम अब कल आना
अभी नींद मे हूँ।


(2)


हाँ मैं शब्दों के जाल बुनता हूँ
फिर इस जाल को संभावनाओ के
समंदर मे फेंक,
उम्मीदों की मछलियाँ पकड़ता हूँ।
किंतु मै सौदा नही करता
मै उन्हे बेचता नहीं !!
यकीन मानो मै सिर्फ जाल बुनता हूँ
मछलियाँ पकड़ता हूँ
और छोड़ देता हूँ उन्हे...
मेरा मक़सद सिर्फ तुम्हें
एहसास दिलाना है
सपनों की कीमत नही होती।


(3)


जब शान्त थाअविचिलित था
जब न होश थान मक़सद था
जब न पाना थान खोना था
मैं ख़ुश थाआनंदित था।
            
जब अकेला थाअबोध था
            
जब न आकुल थान व्याकुल था
            
जब न ईर्ष्या थीन द्वेष था
            
मैं ख़ुश थाआनंदित था।
जब मासूम थानिष्कपट था
जब न प्यास थीन आस थी
जब न शंका थीन दुविधा थी
मैं ख़ुश थाआनंदित था।
            
जब निरपराध थानिरीह था
            
जब न बुद्धि थीन विवेक था
            
जब न ज्ञान थान मान था
            
मैं ख़ुश थाआनंदित था।
जब निश्छल थापवित्र था
जब न मतलब थान लालच था
जब न अमीर थान गरीब था
मैं ख़ुश थाआनंदित था।
            
जब अभिज्ञ थाअव्यक्त था
            
जब न पीड़ा थीन पश्चाताप था
            
जब न सहयोग थान आश्वासन था
            
मैं ख़ुश थाआनंदित था।
अब
      
जब मैं न शान्त हूँन अकेला हूँ
      
न अबोध हूँन निरीह हूँ
      
न अभिज्ञ हूँन पवित्र हूँ
      
मैं दुखी हूँसंतापी हूँ।

 

(4)


कुछ खास नहीं
बस इतना कहना है
दामन मे दरिया है
सागर की तमन्ना है।
                                    बहुत दूर तक घना अंधेरा है 
                                    उजाले की किरण साथ रखना है
                                    खुले आसमां तले 
                                    चिराग लेकर चलना है।
                                    मुश्किलें तो बहुत आयेंगी....मगर 
                                    आज़ चिंगारी को 
                                    गरजते तूफानों से लड़ना है।
पर्वतों के पार सुदूर 
जहां मेरा गाँव है 
ऐसा अनोखाऐसा विरल 
कैसा अलगाव है,
मुझे दूरियों को खत्म कर
अपनों को जोड़ना है।
                                   कुछ खास नहीं 
                                   बस इतना कहना है।


पंकज सिंह ‘मुसाफ़िर



पंकज सिंह का परिचय पढ़ें 

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आगाज़ बहुत अच्छा है आगे बढ़ने की प्रबल सम्भावना है ...........ढेरों शुभकामनाएं

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