तसनीम खान आज की महत्वपूर्ण और संवेदनशील रचनाकार हैं। उनकी कहानियों में अपने अधिकारों के लिए संघर्षरत स्त्री पात्र मिलती हैं जो हालात से समर्पण नहीं करती बल्कि परंपरा और धर्म की दीवारों के बीच अपने लिए मुक्ति की राह तलाशती हैं। ‘कब्बर में जाणी’ कहानी की पात्र मुन्नी धर्म, समाज और पितृ सत्ता की कब्र में ख़ुद को ज़िंदा दफ़न नहीं करती है। अपनी यौनिकता और इच्छाओं के लिए वह शर्मिंदा नहीं है। वह मातृत्व की गरिमा से लदी देवी नहीं बल्कि हाँड़ -माँस की बनी एक सामान्य मनुष्य है जो अपने लिए जीना चाहती है।  

मेराकी पर पढिए तसनीम खान की नयी कहानी-कब्बर में जाणी