राकेश बिहारी हिन्दी कथा और कथा आलोचना के एक स्थापित नाम हैं। कुछ सालों पहले मेराकी पर प्रकाशित उनकी एक कहानी 'परिधि के पार' बहुत चर्चा में रही थी। आज प्रस्तुत है उनके द्वारा रचित एक और कहानी 'फाँस'। मानसिक रोग और उससे जुड़े अतीत के पन्ने खोलती यह कहानी हमें स्तब्ध कर जाती है और अपने पीछे छोड़ जाती है कई अनुत्तरित प्रश्न। 

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संतोष अर्श युवा रचनाकार और आलोचक हैं और अपने सुचिन्तित लेखन और अध्ययन से हिन्दी साहित्य में एक सुदृढ़ पहचान बन चुके हैं। वाणी प्रकाशन से हालिया आए बहुचर्चित संग्रह 'मेरी राशि का अधिपति एक साँड़ है' पर लिखते हुए वह न सिर्फ़ वीरू सोनकर की कविताओं से गहन संवाद स्थापित करते हैं बल्कि उसके साथ -साथ इक्कीसवीं सदी की हिन्दी कविता और उसकी प्रवृत्तियों को भी रेखांकित करते चलते हैं। 



इक्कीसवीं सदी की हिन्दी कविता में कवियों की भीड़ के साथ अनेक तरह की विकल्पहीन अप्रतिबद्धताएँ (यहाँ आशय रचना की प्रतिबद्धता से है), संदिग्ध तटस्थताएँ और अराजकताएँ भी हैं जो लेखक की मृत्यु की उत्तर-आधुनिक घोषणा के औचित्य की (प्रतीति की) संवाहक हैं. संभवतः सुव्यवस्थित सामानांतर आलोचना-कर्म के अभाव ने इन परिस्थितियों को और भी शोचनीय बनाया है. किन्तु इन्हीं में रचना-प्रतिबद्ध निर्वासित स्वर भी हैं जिन्हें इस प्रायोजित शोरगुल और पार्टटाइम (या अभिरुचि आधारित) लेखन के मृत-सागर में सुना जा सकता है. कुछ युवा कवियों ने अपने ज़रूरी मूल्यांकन की आवश्यकता से विमुख रह कर भी कविता का (अति) रचनात्मक साथ नहीं छोड़ा है. वीरू सोनकर उनमें बहुत समर्थ, विश्वसनीय, रचना-प्रतिबद्ध, मौलिक काव्य-प्रतिभा से संपुष्ट और गंभीर नाम हैं. उनका जन्म आठवें दशक के उत्तरार्द्ध में हुआ और रचना-यात्रा इक्कीसवीं सदी के डेढ़ दशक बीत जाने के बाद प्रारम्भ हुई. कविता-रचना की इन विपरीत परिस्थितियों में, जब बहुत सारा काव्य पिछली सदी के दो अंतिम दशकों की कविता की भाषा (शुष्क गद्य)  और शिल्प के प्रभाव से लस्त-पस्त और दिशाहीन है, वीरू सोनकर का स्वतः स्फूर्त शिल्प और अर्जित-भाषा-युक्त-काव्य न केवल आकर्षित करता है, बल्कि उसके सही पाठ, संरचनात्मक स्वरूप और काव्यात्मक अंतर्दृष्टि को खोलने-परखने की माँग भी करता है. अत्यंत सूक्ष्म कलात्मक अभिव्यक्ति से पुष्ट यह काव्य स्थूल भाववाद और शाब्दिक कलाभ्रम उत्पन्न करने वाले काव्य-मण्डल में विक्षोभ पैदा करता है.

     वीरू की कविता पर बात करने से पूर्व हमें ध्यान रखना होगा कि हिन्दी की अकादमिकता, जो आलोचना के बहुत पुराने पड़ चुके स्वरूप और पद्धतियों से समझौता करने के लिए कभी साहस नहीं जुटा पायी, जड़ता के नियम से नवाचार और परिवर्तन की बात सुनते ही घबरा जाती है. मुझे अकादमिक दिनों के अपने एक प्राध्यापक की बात याद आती है कि, ‘ऐसी रचना के लिए आप कौन से टूल्स इस्तेमाल करेंगे ?’ औज़ार बनाने की मौलिक सृजनात्मकता से हीन अकादमिक परिदृश्य को कौन से टूल्स के इस असमर्थ प्रश्न के प्रकाशवृत्त में देखा जा सकता है. इससे मालूम होता है कि आलोचना भी रचना की भाँति मौलिक सृजनात्मक क्षमताओं के साथ यादृच्छिक प्रविधि व सैद्धांतिकी की माँग करती है. पिछले दिनों किसी कवि की आनुष्ठानिक स्तुतियों जैसी कविताओं पर टिप्पणी करते हुए एक आचार्य ने कहा कि साहित्य-सर्जना सनातनधर्मी अनुष्ठान है.यह सही है कि सुमेरी-बेबिलोनी-इज़िप्टियन देव-देवी-स्तुतियों और प्रशस्तिगानों से लेकर वैदिक ऋचाओं तक साहित्य का ओरिज़न आनुष्ठानिक है, परंतु समय के अनुरूप जनधारा ने जड़ शास्त्र व्यामोह त्याग कर परिवर्तनकारी मूल्यों को ग्रहण कर उसकी सिद्धि की है. शास्त्रानुगम परम्परा को जीवित रखने लिए उचित है, किन्तु उसे परिवर्तनशील कालधारा के आगे ठेलना जड़ता और संकीर्णता को न्यौता देना भी है. हिंदी भाषा और साहित्य को वैश्विक साहित्यिक परिदृश्य में सशक्त रूप में प्रस्तुत न कर पाने में ये संकीर्णताएँ अत्यंत उपयोगी सिद्ध हुई हैं. अब साहित्य-रचना कोई अनुष्ठान नहीं है, वह भाषा की सभी सृजनात्मक संभावनाओं से अदृश्य और अकथ्य की कलात्मक रचना, पुनर्रचना है. धर्मी, अधर्मी, कुधर्मी, विधर्मी सभी परिस्थितियों में उसकी व्याप्ति थी और रहेगी. वह मुक्तिप्रदाता भले न हो, परंतु मुक्ति की आकांक्षा का स्पष्टीकरण अवश्य है. 

     वीरू सोनकर की कवितायें वर्ष २०१५ के आस-पास साहित्यिक हलके में यदा-कदा दिखने लगीं थीं. कई ई-माध्यमों से लेकर पाखी, वागर्थ, पूर्वग्रह और पहल जैसी हिंदी पत्रिकाओं में उनकी कविताएँ पढ़ी गईं. वर्ष २०२० में उनका संग्रह मेरी राशि का अधिपति एक साँड़ है वाणी प्रकाशन से छपकर आया है. इस संग्रह में कुल छियासी कवितायें हैं. इसके ब्लर्ब में इन्हें अंतर्व्याप्त यंत्रणा और प्रतिरोध की विलक्षण कवितायें कहा गया है. यंत्रणाओं की भुक्ति, हताशाएँ, संत्रास आदि सभ्य मनुष्य की बुनियादी सामाजिक-सांस्कृतिक प्रवृत्तियाँ हैं और भाषिक प्रतिरोध (लेखन) मुक्ति की ओर बढ़ने का उसका एक आधुनिक रचनात्मक क़दम है. नई कविता के संदर्भ में इन पदों को बेतहाशा प्रयोग किया जा चुका है. वीरू की कविता इन पदानुक्रमों से आगे का मार्ग प्रशस्त करती हुई काव्याभिरुचि की स्रोतस्विनी बनती है.

     बेनेदेत्तो क्रोचे ने अपनी पुस्तक थियरी ऑफ़ एस्थेटिक्स में स्थापित किया था कि सभी मनुष्य कवि होते हैं. कुछ छोटे और कुछ बड़े. इस प्रकार काव्य भी मनुष्य की आधार-प्रकृति से जुड़ी हुई विधा है. भाषिक अभिव्यक्ति पूर्व संभावित काव्य का उद्घाटन है. भाषा के अभाव में काव्य उद्घाटित भले न हो, परंतु उपस्थित रहता है. उपस्थिति काव्य की शर्त है. अपने संग्रह के आत्मकथ्य में वीरू की स्वीकारोक्ति उपस्थिति के रूप में है:
“मेरी उपस्थिति मेरी दुनिया का सबसे बड़ा सच है और मैं इसके नशे में हूँ.” (आत्मकथ्य)
यह उपस्थिति अस्तित्त्ववादी दर्शन के अत्यंत निकट है. इतनी निकट कि उपरोक्त पंक्ति सार्त्र की प्रसिद्ध पुस्तक बीइंग एण्ड नथिंगनेस की उक्ति, “I exist, that is all, and I find it nauseating” का लगभग हिंदी रूपांतरण लगती है. इससे ध्वनित होता है कि कवि अपने अस्तित्त्व को लेकर अत्यंत सजग है. इस अतिसजगता का परिणाम अस्मिता के संकट के रूप में आना अवश्यंभावी है. किन्तु वीरू के लिए यह संकट इतना बड़ा नहीं है कि कविताओं का केंद्रीय विषय बन जाय. आइडेंटिटी क्राइसिस शुरू में अस्मिता पर किए गए अतिक्रमण से उपजी त्रासदी और अंत में वह स्व की खोज का दार्शनिक मार्ग बन सकती है. वीरू की कविताएँ दूसरी ओर प्रवृत्त होती हैं और उसकी कविता यात्रा स्व (सेल्फ़) की खोज़ से आगे बढ़ कर मानवीय राग का भावात्मक, करुणा-प्रसूत संवेदना-पथ ग्रहण करती है.

     क्या, क्या है ? वीरू का कवि इन प्रश्नों को लेकर अत्यंत सजग है. यह दर्शन (देखने) से उपजी प्रथम जिज्ञासा है. इनके उत्तर सपाट लहजे में नहीं दिये जा सकते. जिस प्रकार सत्य को उसके निकट पहुँच कर सरल करना दुर्गम मन: यात्रा है, उसी प्रकार क्या, क्या है ? जानने के पश्चात् यह बताना भी बहुत दुष्कर है. उस क्या के भीतर प्रकृति का सम्यक विस्तार, उसका विराट रूप और पदार्थ जगत (तत्त्व) की रहस्यमयताएँ अंतर्निहित हैं. वीरू उस क्या को बहुत नयी (दार्शनिक ढंग की) सर्जनात्मक अभिव्यक्ति से व्याख्यायित करते हैं. एक ऐसी अवस्था में जब इन सब के विषय में नाना प्रकार से बताया जा चुका है. वैज्ञानिक इंद्रियजनित ज्ञान से लेकर आध्यात्मिक अवबोध तक सृष्टि और तत्त्व का महाआख्यान विस्तृत है, जो भाषिक रचनात्मकता से लेकर अन्य ललित कलाओं में पैबस्त है. अमूर्त का मूर्तन और मूर्त का अमूर्तन अभिव्यक्ति-कलाओं में महत्त्वपूर्ण और विशिष्ट कौशल है. वीरू ने इसे अपनी काव्यात्मक चुनौतियों में स्वीकृत किया है. इस रचनात्मक टकराहट में वीरू की काव्य-प्रतिभा विजयिनी बनती है. क्या, क्या है? पदार्थ क्या हैं ? सृष्टि क्या है ? पर्वत-पठार-वृक्ष-नदी-ताल-सर-कुएँ-मिट्टी-शोर-एकांत-मौन-धरा-गगन-पशु-पक्षी-मृत्यु-जीवन-काल-अकाल और वह सब सूक्ष्मतम-महानतम, दृश्य-अदृश्य जिसमें मानवीय अस्तित्त्व उसकी बुद्धि के साथ आभासित है. जहाँ वह क्षुद्र है, जहाँ वह महान है. जहाँ वह निरीह है, जहाँ वह शक्तिमान है. क्या, क्या है ? कुछ काव्य पंक्तियों में देखा जा सकता है:
फिर मुझे घड़े का मुँह मिट्टी की हँसी-सा लगा
और जान गया कि समुद्र का पसीना है उस पर तैरता फेन
मैं समझ गया हर कुआँ, पृथ्वी की आँख है
और गुफाएँ गायब हो जाने का आग्रह
नदी, पृथ्वी की पीठ पर सिल दी गयी शिराएँ हैं
पानी उनमें दौड़ता ख़ून.         (पुनर्जन्म)   

कि एकांत एक अभ्यास है...
भीड़-शोर अज्ञात का फैलाया हुआ एक जाल है
एकांत, ज्ञात की ओर बढ़ता एक क़दम.    (एकांत एक अभ्यास है)
    
एक खिला हुआ फूल, एक टूटा हुआ फूल
और डाल पर ही अनदेखा रह गया एक मुरझाया हुआ फूल
अपने-अपने तरीक़े से भविष्य तक की गयी एक यात्रा ही तो है...
सभ्यता के नंगे पैर में लगा ज़ख्म भी है
एक तरह का सुलगता हुआ भविष्य ही.                   (कल के आदमी के जूते) 

शोर का भरोसा न करो
कान सन्नाटे के ज़्यादा शुक्रगुज़ार होते हैं...
एकांत एक बन रहे पर्वत की देह है
उबर रही एक नदी
साँस भरता हुये समय का एक समुद्र है...               (एकांत शोर)

जंगल एक रंगबाज़ कर्फ़्यू भी है
जो तय करता है रात को कौन निकलेगा और दिन में कौन ?   (जंगल)
अनुभूति और मुक्त दर्शन आधुनिक-काव्य की प्राथमिक दशाएँ हैं. नई कविता आंदोलन के पश्चात् से अनुभूति का यह स्तर व्यापक होता गया. महावृत्तांतों में स्थूलताओं को छिपाने का सुगम अवकाश रहता था. सूक्ष्म कविता रचने हेतु प्रत्येक वृत्तांत को टुकड़ों में प्रतिपादित करने की आवश्यकता होती है. अतः यह प्रक्रिया और कठिन हो जाती है. मिथक, भक्ति और अनुष्ठान के आलंबन के बिना, शास्त्रसम्मतियों को त्याग कर, सम्यक काव्य-रचना कठोर श्रम, प्रतिभा, चिंतन और विशिष्ट शैली की माँग रखती है. वीरू की कविता का दर्शन महावृत्तांत से उसे अलगाते हुए एक नये अप्रस्तुत का प्रतिपादन करता है. यह तब संभव है जब कवि को सृष्टि के विषय में कुछ बताए बिना उसे वहाँ अकेला छोड़ दिया जाय और वह अपनी इंद्रियों से अर्जित पदार्थवादी ज्ञान, अनुभूति और कल्पना के रचाव से कविता में नयी स्थापनाएँ प्रस्तुत करे. वीरू की कविता में ये प्रवृत्तियाँ सर्वथा नवीन हैं. कवि ने कविता में पुनर्जन्म लिया है और नौनिहाल दृष्टि से पुनः इस विराट स्थापत्य को देख रहा है. महादृश्य को एक बार में देख मूढ़ मनुष्य अपनी मूर्खता से कुंठित हो जाएगा. इसलिए कवि उस बहुआयामी परावर्तनों से भरे हुए शीशे पर अपना सिर पटक कर उसे तोड़ देता है. वह ज़ख़्मी होता है, परंतु दृश्यों का अर्थ टुकड़ों में बाँटता है. जिससे देखा हुआ औरों को दिखाया जा सके.
चश्म हो तो आईनाख़ाना है दहर
मुँह नज़र आता है दीवारों के बीच.      
     एक सपाट, अबूझ दृश्य को देखकर कल्पना में उसे सुलझाना कविता के लिए बेहद मुफ़ीद व्यापार है. वीरू की कविताओं में यह उपक्रम आश्चर्यजनक ढंग से सुफलित है. जैसे दृश्य ! दृश्य क्या है ? क्या यह वही है, जो दिखायी दे रहा है ? क्या यह वही है, जो सुनायी दे रहा है ? क्या व्यक्ति वही है ? जिसे वह जानता है ? हाइडेगर की उक्ति है, प्रत्येक कोई और है, कोई एक भी स्वयं नहीं है. यह सब जानने के लिए दृश्यों और ध्वनियों में उतरना ज़रूरी है. जो अंततः फ़ैन्टेसी में परिणत होता है. किन्तु यहाँ फ़ैन्टेसी में परिणत हुए बिना दृश्यों का खुलना अधिक है. जैसे कोई द्वार खोल दिया जाय और भीतर गये बिना चौखट से ही सब देख कर सही-सही बता दिया जाय. यह दोष हो सकता है कि वीरू का कवि दृश्यों के भीतर कम उतरता है, किन्तु इस कमी की पूर्ति वह दृश्य के बाहर और अधिक सजगता से खड़े हो कर करता है. फ़ैन्टेसी का प्रयोग किए बिना भी इन कविताओं में दृश्यों को सुलझाने की प्रक्रिया अधिक है. मसलन प्रकृति और उसके आनुषंगिक तत्त्वों को कैसे देखा जाय ? पहाड़ कैसा दिखायी देता है ? पानी-पेड़-पत्ते आदि कैसे दिखायी देते हैं ? क्या वैसे ही, जैसे वे हैं ? वीरू की कविताओं में यह तत्त्वमीमांसक दृष्टिकोण (Metaphysical approach) अभिनव है. बल्कि यह तत्त्व-मीमांसा का एक विशेष अनुशासन सत्ता-मीमांसा (Ontology) है. यहाँ अस्तित्त्व और अस्तित्त्व की प्रकृति, प्राणियों और पदार्थों की प्रकृति, उनके गुणों और संबन्धों का दर्शन है. एक दृश्य को प्रत्येक आयाम से देखने का सौंदर्य यथार्थ, सापेक्षता और समीक्षात्मक यथार्थ के लिए विशेष है. यह स्थापनावाद (Foundationalism) सत्य को जानने और सरलीकृत करने के लिए भी उपयोगी है, क्योंकि यह प्राथमिक वस्तुजगत से प्रारम्भ है. यानी प्रकृति में पदार्थों, वस्तुओं के अस्तित्त्व के मध्य अपने मानवीय अस्तित्त्व को चीन्हने, पहचानने और उसे सरलीकृत करने के काव्यात्मक प्रयास. यह काव्य और कवि के दार्शनिक पक्ष को प्रगट करता है. कलाएँ इसी प्रकार दर्शन से जुड़ती हैं. अरिस्टाटिल ने इसे प्रथम दर्शन कहा था. वस्तु-जगत् के प्राथमिक कारक और सिद्धांत. वीरू की कविता में दर्शन की इन प्रवृत्तियों को देखते हुए- देकार्त की Existence is a perfection, कान्ट की being is a logical not real predicate और पारमेनिडेस की being is; not being is not जैसी दार्शनिक उक्तियों का स्मरण होना स्वाभाविक है.

     मेरी राशि का अधिपति एक साँड़ है- पंक्ति, संग्रह के शीर्षक के रूप में बीइंग का ही काव्यात्मक विस्तार है. ज्योतिषी में राशि का अर्थ जो भी हो, किन्तु प्रचलित अर्थ में वह समूह, पुंज या और सरलीकृत रूप में amount है. और इस बीइंग का अधिपति या स्वामी एक वृषभ है. साँड़ का लोकप्रचलित रूप छुट्टा, बेखौफ़ घूमने, यहाँ-वहाँ बेझने, सींगे ताने रहने और लड़ने-भिड़ने से निर्मित होता है. यह प्रतीक बीइंग के अहं (कार्ल जुंग के ego) को धारण किए हुये एक उजड्ड का बयान कविता में मानव जीवन की क्षुद्रताओं के साथ ध्वनित है. साँड़ और उजड्ड. उजड्डता, उदण्ड का तद्भव संस्करण है किन्तु उजड्ड के समक्ष कितना निष्प्रभावी. उजड्डता उजड्ड शब्द से अधिक पुरानी है और उदण्डता के पर्याय से उसका अभिजात संस्करण नहीं बनाया जा सकता. उजड्डता का अलग ही सौन्दर्य है. यहाँ कविता में इसका अर्थ ध्वनिमय और व्यंजनापूर्ण है. जीवन के अनेक प्रभावी क़िस्सों के साथ यह एक आम आदमी की अभिव्यक्ति है. उजड्डता कहाँ से आई ? जीवन की यातनाओं से ! परन्तु उजड्डता अपने वर्गीय कारकों में परित्यक्त मनुष्य की पीड़ा बन जाती है. यहाँ एक एलिएनेशन है. औरों से अलग अकेला कर दिये जाने की त्रासदी है. गहरे अँधेरे वर्ग-कूप में धकेल कर भूल जाने का षड्यंत्र:
मेरी राशि का अधिपति एक साँड़ है और माँ कहती है मैं उल्टा पैदा हुआ था
दोस्त कहते थे कि निरा उजड्ड है अपना साथी
मेरी उजड्डता एक सुविधा थी उनके लिये पलायन की
उजड्डता की इसी पतली गली से निकल भागी थी
मेरी प्रेमिका भी एक दिन.          (एक उजड्ड का बयान) 
इस उजड्डता के पार्श्व में जीवन की गहरी यातनाएँ अनभिव्यक्त और लंबित पड़ी हुई हैं. साँड़ की इस मनमानी पाशविक प्रवृत्ति के पर्दे से जीवन की पीड़ा को छिपाया गया है. साँड़पन (Bullying) आमतौर पर अपने से कमज़ोर लोगों को डराने के अर्थ में प्रयुक्त होने वाला शब्द रहा है. यहाँ कविता में यह अपनी वर्गीय लाचारी को ठीक उल्टे ढंग से प्रस्तुत करने के लिए है और यह व्यंजित भी हो रहा है:
तेरी खाल इस धरती की सबसे चीमड़ खाल है
यह चाहनाओं से नहीं बनी
इसमें घुली है एक बगावती पेड़ की साँसें और पगलाए साँड़ का गर्म ख़ून      (वही) 
पगलाये साँड़ के गर्म ख़ून से भरी ये कविता अपने नवें खण्ड तक आते-आते आत्मपरकता से सर्वजनता की ओर बढ़ती है. व्यक्ति की उजड्डता एक व्यापक जनसमूह की उजड्डता बन जाये तो क्या होगा ? वह भी पगलाये साँड़ जैसी उजड्डता ! स्वानुभूति की हरारत और जीवनानुभवों का ताप अब भी कविता के लिए प्योर कच्चा माल है. उजड्ड, संघर्ष करने वाले समाज का कितना सुंदर शब्द है. कवि की उजड्डता के पीछे छिपा हुआ अवसाद कविता में आ कर उजड्डपन नहीं लग रहा है, इससे आगे बढ़कर, वर्गीय प्रवृत्ति बन कर नाटकीयता ग्रहण करता है. विद्रोह (यहाँ अराजकता का आभास है) का आवेग चरित्र में जो उग्रता पैदा करता है वह प्रचलित मान्यताओं के लिए असह्य हो कर उजड्डता या आभिजात्य के मायालोक में उदण्डता घोषित हो जाता है. अन्याय करने वाले सदा अन्याय सहने वालों के विषय में व्यंग्योक्ति के रूप में कहते रहे हैं कि यह बहुत मोटी खाल का है.’ वे चाहते हैं कि ज़ुल्म सह कर आह की जाय, चीख़-पुकार मचायी जाये जिससे उनके हिंसक बर्तावों की व्याप्ति का अनुमान हो सके और भीति उपजे. किन्तु वैसी ही मोटी खाल वाला उजड्ड कह रहा है :
तेरी यह खाल जब उतरेगी
तो दुनिया का सबसे मजबूत जूता बन कर बरसेगी       (वही) 
चीमड़ खाल का मजबूत जूता बना कर तटस्थता पर बरसाने का ख़याल आने की प्रक्रिया वस्तुतः व्यक्तित्वांतरण है. और यह तभी संभव होता है जब अपनी जाति के अहंकार में बौराया हुआ व्यक्ति धकेल दिया गया हो अपने होने की अनिच्छा से भरे एक गुमनामी कुएँ में.’ यह सारी उजड्डता यंत्रणा ही से उत्पादित हुई है. इसमें वर्गीय अहं की तुष्टि भी प्रछन्न है या कहा जा सकता है कि उजड्डता एक तरह का प्रतिरोध है, लिजलिजे और बनावटी पूँजीवादी शिष्टाचार के प्रति. एक उजड्ड का बयान कविता कवि के आभ्यांतरिक संघर्ष की उत्तम रचना है. इसकी जड़ें नई कविता के आत्मसंघर्ष से जुड़ी हुई हैं. इसमें बाह्य का संघर्ष अंतर्मुख काव्य-संवेदना की सिल पर घिस कर चमक रहा है. इस तरह वीरू के कवि के दो रूप बनते हैं. एक जहाँ वह दृश्यों में खोया हुआ विस्मय से भरा निरीह कलाकार है जो निसर्ग के ऐंद्रजालिक कल्पना-लोक में खो जाता है और कला के चरम क्षितिज को, कल्पना की तीव्र ढाल पर दौड़कर छू आना चाहता है, तो दूसरा यथार्थ से टकरा कर अपनी उजड्ड प्रतिमा का स्व-शिल्पी साधारण मनुष्य. एक साधारण मनुष्य जिसका केवल वर्ग ही नहीं है जाति भी है. वर्ग के भीतर जाति, जाति के भीतर वर्ग. एक मोटा जाल और एक झीना, अदृश्य किन्तु मोटे जाल से भी मजबूत जाल. वर्गीय लाचारी जाति में और अधिक घनीभूत हो जाती है:
मैंने बहुत देर से जाना
कि मेरी जाति मेरे साथ घट गया सिर्फ़ एक दुर्योग है
दुनिया यह पहले से जानती थी...
मैं जिसे किसी दुर्योग की तरह देखता हूँ
वह दुनिया के हाथ लग गया एक सुखद संयोग है.   (जाति)    
     जाति और वर्ग के दोहरे जाल में रचनात्मक क्षमताओं का संग्रहण ढलान से ऊँचाई की ओर भार के साथ एक चढ़ाई है. वीरू का कवि अपनी जाति को ढाल नहीं बनाना चाहता. न ही वह जाति के शिकंजे में फाँस लेने वाले दयावानों की सहानभूति चाहता है. उसके पास जाति की वंचना का कोई विलाप नहीं है, बल्कि एक उदासीनता है. जाति को अपनी देह से उसने माँस के लोथड़े की तरह काट कर फेंक दिया है, जिस प्रकार शल्य चिकित्सक जीवन के लिए सांघाती बन गए किसी ट्यूमर को निकाल कर फेंक देता है. जाति के संयोग और दुर्योग के बीच वह कुटिल त्रासदी है, जिसमें माँस का यह काट कर फेंका गया लोथड़ा हाथ में लिये लोग उसके पीछे चले आ रहे हैं. कृत्रिम सहानुभूति लिये. इस अमोघ भारतीय शस्त्र के इस्तेमाल के लिए. और इसे देख कर कवि को और अधिक पीड़ा होनी लाज़िमी है. ऐसी त्रासद परिस्थितियों में कवि की रचनात्मकता बिना किसी वंचना के अकुंठ रूप में विकसित हो रही है, तो यह रचना से प्राप्त सामर्थ्य है. कवि का यही सामर्थ्य समष्टि का सामर्थ्य बनता है. वह कला के लिए वर्ग को भूलता है, निष्ठुर वर्ग उसे वापस खींचता है. कला उसे वर्गच्युत करती है और वर्ग उसे कलाच्युत करता है. इस संघर्ष से उसकी कविता और निखरती है. रचना और जीवन का यह द्वंद्व कवि होने की पहली शर्त (कंडीशन) है.

     मेरी राशि का अधिपति एक साँड़ है- संग्रह की कविताओं में बिखराव नहीं है. किन्तु रचना प्रक्रिया में एकरसता है. कुछ कविताओं को यदि अलग कर दिया जाय तो अलग-अलग हो कर भी सभी कविताएँ एक ही थान के हिस्सों सी खुलती हैं. यह शिल्प में अधिक है. संरचनात्मक स्तर पर वीरू का सौष्ठव उसके समकालीनों से बहुत अलग है. उसकी कविता को देख कर कहा जाएगा कि ये वीरू ही की कविता है. व्यंग्य उसके यहाँ शालीन और चुप्पा होते हुए भी मारक है. किसी जगह उसने एक प्रसंगनुमा कथा लिखी थी:
कवि एक मज़दूर से पूछता है क्या तुम मार्क्स को जानते हो ?
मज़दूर ने कहा : मैं अपने ठेकेदार को जानता हूँ
कवि ने कहा, तुम नहीं जानते ठेकेदार तुम्हारा शोषण करता है
मज़दूर ने कहा: मैं बस इतना जानता हूँ कि वह सरकार से कम क्रूर है.  (कवि-संवाद कथाएँ) 
यह कवि जो मज़दूर से संवाद कर रहा है, स्वयं भी श्रमिक ही है. मार्क्स और ठेकेदार के मध्य का अंतराल मुखर (या भीषण) व्यंग्य है. पूँजी की हाहाकारी शक्ति ने मार्क्स और मज़दूर के मध्य ठेकेदार को डाल दिया. कितनी शालीनता के साथ व्यंग्य का प्रयोग है. संवाद-शैली में रची गयी एक और व्यंग्यपूर्ण कविता संवाद है. यह प्रेम के छली रूप से ठगी गयी स्त्री का आर्त्त चित्र है. सपाट और सतर्क पुरुष प्रवंचना को छिपाने के लिए दार्शनिक बन जाता है. स्त्री उसके धोखेबाज़ पुंसत्त्व से नयी स्त्री का चेहरा बना लेती है. व्यंजना की शक्ति से स्त्री के प्रति कितनी करुणा रच लेती है यह कविता. इसे ध्वन्यालोक-लोचन की उक्ति व्यंग्योप्यर्थ: ध्वनिरिति व्यवहृत: के साथ भी सुना-देखा जा सकता है-   
उसने शंकालु हो कर पूछा
क्या तुम किसी और से ?
और पुरुष की ज़ुबान से कुछ पाषाण झरे
दृश्य विहीन कुछ भी नहीं, जहाँ तक दृश्य है संभावनाएँ हैं.           (संवाद) 
पुरुष की ज़ुबान से पाषाण झरना, जैसे निष्ठुरता का सबसे प्रभावी रूप में मूर्त हो जाना. मूर्ति पाषाण से ही गढ़ी जाती है. इसी पुरुष में कृष्ण के उद्धव और गोपियों को भी देखा जा सकता है और उच्च-आधुनिक समय की स्त्री की सभी स्त्रीवादी प्रतिस्थापनाएँ भी. प्रेम की इस संभावना में स्त्री का चेहरा प्रथम स्थान पर है. लिहाज़ा पुरुष का पराजय-बोध से लज्जित हो जाना कवि का स्त्री को विजयी बनाना नहीं है, अपितु यह स्त्री की ओर से प्रेम की जय-पराजय में दी गयी एक दलील है. कविता में व्यंग्य करुणा से उपजता है, चिढ़ या कुंठा से नहीं- इस कविता में इसका प्रमाणन है.
     वीरू का स्वर बहुत संयत है. वह चीख़ता नहीं है. चीखने से उसकी वेदना मद्धिम हो जाएगी. उसमें वह काव्य-चिढ़ भी नहीं है जो इधर के युवा कवियों का आइडेंटिटी-कार्ड है. जिसे दिखा कर वे अपने समकालीन कवियों को हेय या अकवि साबित करने की शीघ्रता में रहते हैं और बुज़ुर्ग कवियों की कविताओं को बिराती हुई लयहीन पैरोडियाँ लिखते हैं. उसकी कविता में कविता को लेकर कोई संशय नहीं है. यह साधना से रची गयी कविता की आश्वस्ति है. वीरू की कविताओं में यह आत्मविश्वास साफ़ और शांत आब की भाँति दस्तयाब है:
मैं जितना देह में था, उतना ही उस भाषा में
मैं उस भाषा-देह के व्याकरण में आत्मा सा घुला था.       (भाषा)
भाषा और व्याकरण उसके यहाँ प्रतीक रूप में ख़ूब है. वह भाषा को कई बार विस्मय से बरतता है- जैसा घुसता है व्याकरण एक भाषा के भीतर’. भाषा को वह एक कारीगर की तरह देखता है. जैसे कुम्हार मिट्टी को. इसीलिए वह अपने देखे को अपनी भाषा में बता पाता है. नदी को उसने कैसे देखा और लेखा है ?
-नदी किसी जर्जर इमारत-सा ढहती है
और पानी-पानी हो जाती है.
-मछलियाँ नदी की गूँगी बहनें हैं
-जंगल नदी के आलिंगन में लिपटा अतृप्त प्रेमी है.        (नदी)    
उसका दु:ख भी बुद्ध का दुक्ख है जिसके दूर होने के उपाय सुलभ नहीं हैं. दु:ख में उसने सुख के हरे उपहारों को हताशा के पीले पत्तों-सा चबाया है. उसकी डूब-नींद’, ‘हमारी जाग होगी. जब वह बुद्ध के रास्तों पर निकलेगा:
मैं निकल जाऊंगा एक दिन
समय के चक्रव्यूह की तमाम लिखत-पढ़त को बेपरवाह फाड़ता हुआ
बुद्धकालीन किसी वृक्ष के नीचे जा कर
एक डूब नींद बिछाऊंगा
देह और आत्मा का एक संयुक्त बयान ज़ारी कर सो जाऊंगा
कि तथागत आयें तो मुझे दोबारा जागा देना.     (संयुक्त बयान)                     
यह धम्मपद के बालवग्गो पञ्चमो (जेतवन सावत्थी) के उस उपदेश की थकान और अनिद्रा है, जहाँ भिक्खु सुनते हैं- दीघा जागरतो रत्ति दीघं संतस्स योजनं’. जागरण करने वाले की रात लंबी होती है. थक गये व्यक्ति के लिये मार्ग (योजन) लंबा हो जाता है. कविता में तथागत के आने की संभावना उसी अंतर्व्याप्त पीड़ा और संत्रास के उपचारित हो जाने का भाव है जो इसके अभाव में वेदनानुभूत है.
     मेरी राशि का अधिपति एक साँड़ है- संग्रह की कविताएँ यातनापूर्ण जीवन, अलगाव और अजनबियत से घिरे मनुष्य की पीड़ा, उसके करुणापूर्ण हृदय और प्रतिरोध की बुनियादी प्रवृत्तियों से रची गई हैं. इन कविताओं की विशिष्टता, नवीनता और प्रासंगिकता इनकी गंभीर रचना-प्रक्रिया के साथ भाषा की उस संप्रेषणीय ताक़त में निहित हैं जिस पर कवि ने कई कविताओं में बात की है. संग्रह में भाषा पर- भाषा, तुम्हारी भाषा में, शब्दकोश जैसी कविताएँ हैं जो भाषा के प्रति कवि की लक्षित सजगता और उससे उसके जुड़े हुए व्यापार के रहस्य खोलती हैं. पूर्वग्रह में प्रकाशित वीरू सोनकर की लंबी कविता आग की भाषा और पहल में भग्नावशेष भी उनकी दंग कर देने वाली काव्य-प्रतिभा का प्रस्तुतीकरण हैं. लंबी कविताओं का सुगठित रचाव और सधाव दर्शनीय है. प्राथमिक तत्त्वों को आदिम प्रतीकों के रूप में अत्यंत कलात्मक प्रयोग इन कविताओं का असाधारण सौंदर्य है. आग की भाषा दस भागों में रची गयी है और भग्नावशेष अठारह भागों में. दोनों कविताओं को वीरू के संग्रह के साथ पढ़ने पर अनुभव होता है कि वह निरंतर विकसित हो रहा रचनाकार है और उसका विकास हिन्दी की गंभीर कविता के क्षेत्र में लीला की भाँति घट रही कोई घटना है. इन दोनों कविताओं से कुछ अंश देखे जा सकते हैं:
आग को कोई सलीक़ा ही नहीं, राख उसका शृंगार है.
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स्मृति आग के चेहरे पर भीगते हुए नाचती है.
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मैं विशेषज्ञों में अंतिम हूँ
विश्लेषकों का अंतिम शिकार
मेरी हत्या मेरे समय की सबसे ज़रूरी बात होगी.
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स्मृतियाँ नीरस विषय याद नहीं रखतीं.
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मुझे अपना शहर याद नहीं रहता
मुझे रोशनियाँ याद रहती हैं.
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एक भाषा के भीतर व्याकरण की तरह उतर जाना
मेरा सबसे आदिम अभ्यास है.
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ज्वालामुखी से नीचे उतरते तमाम लाल अजगर
रेंगते हुए नहीं, दौड़ते हुए नारा लगाते हैं.           (आग की भाषा)

बिछड़ गए प्रेमियों के भग्नावशेष
भागने में ठिठक गयी प्रेमिकाओं के चेहरे पर मिलते थे
और किसी मेकअप से नहीं छुपते थे.
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पृथ्वी पर दु:खों के नव-निर्माण होते रहते हैं
सुख भग्नावशेषों में सुरक्षित है.
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उनके पास हँसने की बेशुमार जगहें थीं
जहाँ वे हँसने का अभिनय करते थे
बुक्का फाड़ कर रोने के कोने इस धरती पर बहुत कम थे    
वहाँ कभी अभिनय नहीं होते थे.     (भग्नावशेष)   
आग की भाषा और भग्नावशेष जैसी कविताएँ इस सदी की हिन्दी कविता का सद्य: उद्घाटित परिदृश्य हैं. ये काव्यानुशीलन की सभी प्रचलित और पुरा-प्रविधियों को नकारने वाली हैं. इनके विश्लेषण हेतु सम्यक चिंतन और अवकाश की दरकार होगी. परंतु इनके आधार पर यह कहा जा सकता है कि वीरू सोनकर की दृश्य-मीमांसा काव्य में जिस विलक्षण रूप के साथ प्रस्तुत हुई है, वह हिन्दी में शांत और ठोस उपस्थिति है। व्यवस्थित बिम्ब-विधान वीरू सोनकर की कविता का अत्यंत पुष्ट और कलात्मक भाग है. बल्कि बिम्ब उसकी ताक़त है. दृष्टांत और बिम्ब जहाँ मिलते हैं, वहाँ कविता का रूप-रंग प्रगाढ़ हो जाता है, शुष्कता जो अधिकतर हावी रहती है, कुहासे की भाँति छँट जाती है:   
अगर गिराना हो मुझे
तो चिड़िया की चोंच से निकले पहले स्वर की तरह
सुबह की गोद में गिराना.          (आग की भाषा)   
कभी एजरा पाउंड ने कहा था कि एक बिम्ब एक विचार से कहीं अधिक है. बिम्ब अप्रस्तुत और अप्राप्य की मानसिक या कल्पनाजनित अभिव्यक्ति होती है. वीरू की कविता में बिम्ब सबल पक्ष बन कर उभरते हैं. बिंबों के साथ प्रयोग भी है. कविता में बिम्बों को नये रंग की छायाओं (शेड्स) में निरूपित किया गया है. अमूर्तन का मूर्तन, रूप-अरूप की क्रीड़ाएँ और बिम्बावलियाँ वीरू की कविताओं में डूबे हुए को अनबूड़े बूड़े तरे, जे बूड़े सब अंग जैसी काव्य-उक्तियों का बोध कराएंगी. कवि कहीं दृश्यों को उलट देता है, कहीं उल्टे हुए दृश्यों को सीधा करता है. कविताओं में दृश्यों का आश्चर्यलोक है, यह उनमें विचरने वाला जान पाएगा. कवि वस्तुओं को उनकी वास्तविक उपस्थिति के साथ देखता है और कहता है कि इसे इस तरह देखो. यह वस्तुजगत् को देखने की कवि की क्षमताओं का प्रसार है. रूप और अरूप की कविता, जितनी रूपवादी उतनी ही अरूपवादी. चित्रकला के दोनों पक्ष- डेकोरेटिव डिज़ाइन और एब्स्ट्रेक्ट डिज़ाइन. काँक्रीट को एब्स्ट्रेक्ट और एब्स्ट्रेक्ट को काँक्रीट में परिवर्तित करने का भाषिक लाघव और भाव-संवेदन से उसमें प्राण फूँक देने का काव्य-कौशल. और इसी में आता है उक्ति-वैचित्र्य और चित्रमय वर्णन (pictorial statement). इस पैमाने पर वीरू सोनकर हमारे समय के सबसे अधिक कलाप्रवण (या कलावादी) कवि हैं. जो काव्य में कला के लिए जान दिये रहते हैं, ऐसे कलावादियों को वीरू की कविताओं से अविलंब गुज़रना चाहिए.
     परम्पराप्रियता कबड्डी के खेल की भाँति है. जब कुछ नया रचने में दम उखड़ने लगे तो परम्परा के पाले में लौट भागो. वीरू ने अपनी कविता को पारंपरिक प्रपंचों से बचाया है. उसमें परंपरा का वह हिन्दी-काव्य-प्रचलित आग्रह नहीं है, जिसकी नींव पर असमर्थ और चतुर कवि वर्चस्ववादी, पौराणिक और मिथकीय शास्त्रीयता का कवच पहन कर समकालीनता में खड़ा होता है. बिना परंपरा की आड़ लिए, वह दुर्लभ काव्य का रचयिता है. वह कविता में मनुष्यता की सबसे विनम्र मुद्रा में उस स्थान पर खड़ा है, जहाँ उसके साथ प्रत्येक मनुष्य और जीव उसी अवस्था में आक्रांत हुए बिना, तटस्थता और पूर्वग्रह के अतिरिक्त कोई अन्य विकल्प ढूँढ कर खड़ा हो सके. परंपरा की ढाल और ढोल लेकर कवि सांस्कृतिक प्रतिरक्षा तो अर्जित करता है, परंतु उसमें व्याप्त सरवाइवल ऑफ फिटेस्ट के फ़ासिस्ट विषाणु उसे खींच कर एक दिन उस स्थान पर पहुँचा देते हैं जहाँ वह ऐतिहासिक नरसंहारों की पृष्ठभूमि में खड़ा एक तटस्थता का ढोंग करता नपुंसक बन जाता है. वीरू की कविता में वह चिढ़ भी नहीं जो इस समय के युवा कवियों की रोगक है. वह अकुंठ काव्यचेतस् वैरागी है, जिसमें स्वाभिमानी कवि का उजड्डपन है. कविता में जिसकी स्वीकृति भी है-
इस भाषा के तकिये पर सिर टिकाये
मैं सबसे अधिक मौलिक था
सबसे अधिक मुखर
सबसे अधिक विस्तृत
सबसे अधिक कल्पनाशील था.  (भाषा)

वीरू सोनकर में उपरोक्त सभी ख़ूबियाँ हैं. वह हिन्दी का एक संग्रह तक सीमित रह जाने वाला कवि नहीं है. वह बहुत दूर से आया है और बहुत देर तक रहेगा.

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 डॉ. संतोष अर्श