तसनीम खान आज की महत्वपूर्ण और संवेदनशील रचनाकार हैं। उनकी कहानियों में अपने अधिकारों के लिए संघर्षरत स्त्री पात्र मिलती हैं जो हालात से समर्पण नहीं करती बल्कि परंपरा और धर्म की दीवारों के बीच अपने लिए मुक्ति की राह तलाशती हैं। ‘कब्बर में जाणी’ कहानी की पात्र मुन्नी धर्म, समाज और पितृ सत्ता की कब्र में ख़ुद को ज़िंदा दफ़न नहीं करती है। अपनी यौनिकता और इच्छाओं के लिए वह शर्मिंदा नहीं है। वह मातृत्व की गरिमा से लदी देवी नहीं बल्कि हाँड़ -माँस की बनी एक सामान्य मनुष्य है जो अपने लिए जीना चाहती है।  

मेराकी पर पढिए तसनीम खान की नयी कहानी-कब्बर में जाणी 

राजेश्वर वशिष्ठ की कविताओं में स्त्री और प्रेम अपने विविध रूपों में मौजूद रहते हैं।  उनका गद्य भी बेहद आकर्षक और तरल होता है। मेराकी पर पढ़ते हैं कोरोना काल में लिखी उनकी एकदम नयी कहानी जहाँ इस आपदा की आहटों के बीच मनुष्य की विवशता और एक स्त्री के निर्णय की सामाजिक पृष्ठभूमि को बारीकी से बुना गया है। 

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फिरोज़ मंज़िल शहर का पुराना मुहल्ला ज़रूर है पर अड़ोस-पड़ोस के घरों के बाशिंदे इल्मयाफ्ता हैं। अमीर न सही मध्यम वर्ग के लोग हैं जिनके पास नौकरियाँ हैं या छोटे-मोटे काम-धंधे हैं। मेरे अब्बा हुज़ूर इस्लामिया कॉलेज में लाइब्रेरियन थे पर अम्मी जान की गोद में तीन बेटियाँ डाल कर, कुल जमा बयालीस साल की उम्र में इस जहाँ से रुखसत हो गए। अम्मी जान बताती हैं उनके इंतकाल के वक्त, मैं पौने चार साल की थी। मेरी दो बहनों में उम्र का फर्क ज़्यादा नहीं था पर मैं बहुत बाद में किसी हकीम की दवाई और सयाने के शर्तिया बेटा होनेके तावीज़ को मुँह चिढ़ाते हुए इस दुनिया में आ गई थी।

अब्बू के इंतकाल के बाद का वक्त अम्मी के लिए बहुत बुरा था इसे हम धीरे-धीरे बड़ी होती हुई लड़कियों ने संजीदगी के साथ देखा था। जब-जब बाराबंकी से दादा जी आते, हम लोग सुरक्षा गार्डों की तरह अम्मी जान के आस पास ही मंडराते रहते थे। हालाँकि दादा जी हमें खेतों से हुई आमदनी, अनाजों और दालों की पैदावार का हमारा हिस्सा देने के लिए ही आते थे पर अम्मी उनकी मौजूदगी में, हर वक्त तालाब की मछलियों की तरह बेचैन हो कर इधर-उधर भागने लगती थी। उनकी छाया में एक ऐसा जिन्न था जो हर वक्त अम्मी को डराता रहता था। हम तीनों बहनें ठीक से कुछ न समझते हुए भी बहुत कुछ समझने लगी थीं। यह अलग बात है कि इस मसले को लेकर हम बहनों के अनुमान, उम्र और परिपक्वता के अनुपात में थोड़े-थोड़े अलग थे। बहुत छोटी होने के कारण मुझे ज़्यादा कुछ समझ नहीं आता था – पर लगता था कि दादा जी अम्मी से बहुत नाराज़ रहते हैं।

कुछ वर्षों बाद जब दादा जी का इंतकाल हुआ और हम लोग उन्हें सुपुर्दे-खाक करने के बाद बाराबंकी से लखनऊ लौटे रहे थे तो रास्ते में निगार ने अम्मी की बदकिस्मती और दादा जी की नीयत का कच्चा चिट्ठा हमारे सामने खोल कर रख दिया। मुझे हैरानी हुई कि जो बात मैं ठीक से नहीं समझ पा रही थी, निगार और शबनम उस मसले को बखूबी समझती थीं। उस दिन निगार ने कहा था – मर्द और औरत के बीच ऐसे बहुत कम रिश्ते होते हैं जिनमें मर्द, औरत के जिस्म को पाने के लिए ललचाता न हो! सुन कर मेरे तो रोंगटे खड़े हो गए थे। मुझे लगा था, क्या हम औरतें इस दुनिया में मर्दों की जिस्मानी भूख को मिटाने के लिए ही लाई गई हैं?

अगले कुछ सालों में हमें अपने आस-पास की लड़कियों और औरतों के मर्दों के साथ बनें अनेक रिश्तों के बारे में पता चल गया था। हम अपनी सहेलियों के साथ सबसे अधिक खुसर-पुसर इसी टॉपिक पर किया करते थे। हमें यह भी पता चल गया था कि आमतौर पर शादीशुदा मर्दों और औरतों की जिस्मानी ज़रूरतें एक जैसी नहीं होती हैं। पति-पत्नी बने जोड़े भी ज़िंदगी भर गुप-चुप अपना उपयुक्त साथी खोजते ही रहते हैं, यह दीगर बात है कि कभी ज़रूरतें जिस्मानी होती हैं तो कभी रूहानी। इन बातों को शुरु करना आसान होता था, पर खत्म करने का दिल ही नहीं होता था। इन बातों के बीच में, कलेजा धक-धक करने लगता और जिस्म में उफान-सा आ जाता था।

दादा जी के इंतकाल के बाद, अम्मी में बहुत सारी हिम्मत एक साथ आ गई थी। उन्होंने निगार और शबनम के साथ बाराबंकी जाकर ज़मीन-जायदाद और खेती के अपने हिस्से के एवज में, देवरों से वाजिब मुआवजा ले लिया। एक साथ कई लाख रुपये मिलने से हम अचानक अमीर हो गए थे। मेरी दोनों बड़ी बहनें जिनकी दिलचस्पी ग्रेजुएशन के बाद आगे की पढ़ाई में नहीं थी, अपने लिए ढेर सारे गहने और कपड़े खरीदने में मशगूल हो गई थीं। अम्मी जान ने आने वाले दिनों में उनके रिश्ते तय कर दिए और देखते ही देखते, वे निकाह की रस्म अदायगी के बाद अपने शौहरों का घर रोशन करने चली गईं। तब मैं बी. ए. कर रही थी और बहुत सारा पैसा एकमुश्त खर्च हो जाने के कारण हमारे घर की माली हालत अच्छी नहीं रह गई थी। अम्मी जान कहने लगी थीं –रोमी, तू पढ़ाई खत्म होते ही नौकरी ढूंढ लेना बच्चे, अब तो न मेरे पास रुपया है और न गहने। सब माल-मत्ता तेरी बहनों के निकाह और घर की मरम्मत पर खर्च हो गया है। मकान के नीचे की मंज़िल पर किराएदार भी इसलिए रखना पड़ा है ताकि घर का खर्च चल सके, किराये से मिली पाँच हज़ार की रकम तो बिजली, पानी और दवाइयों पर ही खर्च हो जाती है।'

हर लड़की की तरह मेरी ज़िंदगी के ख़्वाब भी सुनहरे थे। मैं शिद्दत से पैसा कमाना चाहती थी, ऐश करना चाहती थी पर पढ़ाई में उतनी बेहतरीन नहीं थी कि किसी प्रतियोगी परीक्षा में आगे निकल कर अफसर बन सकूँ। मेरी दोस्त नाज़नीन कहती थी –तुम्हारी आवाज़ बहुत अच्छी है रोमी, रेड़ियो जॉकी बन जाओ न!एफ. एम. सुनते हुए मुझे भी एहसास होता था कि मेरी आवाज़ बहुत मीठी है और तलफ्फुज़ तकरीबन सही है, इसलिए मन बना लिया था कि ग्रेजुएशन पूरा होते ही किसी एफ. एम. चैनल से जुड़ने की कोशिश करूँगी।

मेरी नज़र में एक लड़का था जो रेड़ियो हमसफरमें काम करता था – संदीप श्रीवास्तव। एक बार किसी सहेली ने उससे मिलवाया था और उसने किसी कार्यक्रम के लिए, मेरा एक छोटा सा इंटरव्यू लेकर ब्रॉडकास्ट भी किया था। उसका कार्ड न जाने क्यों मैंने संभाल कर रख लिया था, शायद इसलिए कि मैं उसकी नफ़ासत, संजीदगी और स्मार्टनेस से प्रभावित हुई थी, लड़का हैंडसम भी था। जिस दिन बी. ए. का आखिरी इम्तिहान खत्म हुआ, मैंने धड़कते दिल से संदीप श्रीवास्तव को फोन लगा दिया। उसने मुझे पहचाना तो नहीं लेकिन कहा कि मैं आने वाले शनिवार को रेडियो हमसफरके रिसेप्शन पर उससे शाम पाँच बजे के आसपास मिल सकती हूँ।

धड़कते दिल और अनजानी-सी कल्पनाओं के साथ, रिसेप्शन हॉल में, मैं संदीप की प्रतीक्षा कर रही थी। मैं साफ तौर पर जानती थी कि मैं उससे प्रेम निवेदन करने नहीं, अपने करियर के विषय में सहायता माँगने आई हूँ, फिर भी न जाने क्यों मेरे दिल की धड़कने कुछ बेतरतीब-सी हुई जा रही थीं। दस मिनट की प्रतीक्षा के बाद चटख लाल रंग की टीशर्ट और जींस में सज्जित वह लम्बा, तगड़ा, खूबसूरत नौजवान मेरे सामने था। उसके आते ही न जाने क्यों मेरे दोनों हाथ आगे बढ़ गए और उसने मुझे बाँहों में भर कर मजबूती से हग कर लिया। मैं किसी नाज़ुक बेल की तरह काँप रही थी जिसे किसी महकते तूफान ने पहली बार तबीयत से छूआ था।

मैंने कहा – रोमिला बुखारी, पहचाना? एक बार इंटरव्यू किया था आपने!उसने मुझे ऊपर से नीचे तक देखते हुए कहा – मुझे याद नहीं आता कि मैं पहले इस चार्मिंग लड़की से मिल चुका हूँ। अच्छा लगा तुमसे मिल कर, क्या हम कैफे में बैठ कर बातें कर सकते हैं?’

वह मुझे कंधे से सहारा देते हुए, सीढ़ियों से होकर पहली मंज़िल पर बने कैफे में ले गया जहाँ कुछ गिने चुने लोग ही बैठे थे। उसके स्पर्श में एक जादू था और मुझे लगा जैसे मैं उसे बहुत पहले से जानती हूँ। एक टेबल पर मेरे सामने बैठते हुए उसने पूछा –क्या लोगी कॉफी या चाय?’ इससे पहले की मैं कुछ कहती उसने वेटर से कहा – दो कप कैपेचीनो और एक प्लेट चिकन सेंडविच।जैसे कि उसने मेरी च्वाइस को मेरी आँखों से पढ़ लिया था।

क्या कर रही हो इन दिनों?’ उसने मेरी हथेली को नरमी से छूते हुए पूछा।

उस स्पर्श की प्रतिक्रिया ने मेरे साँसों को आरोह-अवरोह के एक ऐसे क्रम में उलझा दिया था कि मैं बड़ी मुश्किल से कह पाई – आज ही मेरे बी. ए. फाइनल के एग्ज़ाम खत्म हुए हैं।

गुड, अब क्या करने का इरादा है?’ उसने मेरी आँखों के आर-पार झाँकते हुए पूछा।

मैं रेड़ियो जॉकी बनना चाहती हूँ!ऐसा कहते हुए मैं लजा रही थी।

ग्रेट।उसने कहा।

इसके लिए मुझे क्या करना चाहिए?’ मैंने उत्साहित होकर पूछा।

एक रेड़ियो जॉकी ट्रेनिंग इंस्टीट्यूट है गोमती नगर के विशाल खंड में, वे तीन महीने की अच्छी ट्रेनिंग देते हैं, इसमें वे सभी प्रैक्टिकल और टेक्नीकल आस्पेक्ट्स की जानकारी देते हैं। वहाँ मेरा एक दोस्त है, हर महीने की पहली तारीख से नए बैच शुरु होते हैं, तुम चाहोगी तो मैं उसे फोन कर दूँगा।

आपको आइडिया है, वे इस ट्रेनिंग के लिए कितना चार्ज करते हैं?’

लगभग दो लाख रुपये।संदीप ने कहा।

कुछ कंसेशन मिल सकता है, मैं इकबाल से कह दूँगा, तुम मुझे बता देना।

मेरे चेहरे की उदासी देख कर संदीप ने कहा – पापा, नहीं देंगे इतना पैसा?’

मैंने उठते हुए कहा – अब्बू नहीं हैं, अम्मीजान के पास अगर पैसे होते तो वह मुझे नौकरी ढूँढने के लिए नहीं, आगे तालीम जारी रखने के लिए कहतीं। कोई बात नहीं, मुझे कोई दूसरी नौकरी खोजनी होगी। दुनिया में हर शख्स को पसंद का काम कहाँ मिलता है?’

म सॉरी, ट्रेनिंग का बंदोबस्त तो बिना फीस के नहीं किया जा सकता। पर मैंने देख लिया है कि तुम्हारी वॉइस क्वालिटी अच्छी है, उच्चारण साफ और ठहराव लिए है, मैं तुम्हारे लिए डबिंग या वॉइसओवर का कोई काम खोजता हूँ, उससे भी ठीक-ठाक पैसा कमाया जा सकता है। तुम्हें निराश होने की ज़रूरत नहीं है।उसकी उंगलियाँ मेरे कंधे और पीठ को सनसनाहट से भर रही थीं।

मुझे दरवाज़े तक छोड़ते हुए उसने कहा – रोमी.... यह नाम चलेगा न, मैं तुम्हें दो-चार दिनों में ऑडीशन की तारीख और वक्त के बारे में बताऊँगा, तब तक तुम रिसालों में से कुछ कहानियाँ पढ़ने का रियाज़ करती रहो।घर लौटते हुए, न जाने क्यों मुझे लगातार एहसास हो रहा था जैसे संदीप मेरा हाथ थामे मेरे साथ चल रहा है और उसके पर्फ्यूम की महक से मेरी नाक बंद हो रही है।

अमीनाबाद से लगे सँकरी गलियों वाले इलाके में था दिलशाद स्टुड़ियो। कहीं कोई इंडीकेटर बोर्ड नहीं, किसी बाशिंदे को जानकारी नहीं, पर मैं 13/35 नूर मंज़िल का पता पूछते हुए उस इमारत तक पहुँच गई थी, जिसके लोहे के बड़े से फाटक पर बहुत छोटा-सा बोर्ड लगा था –दिलशाद स्टुड़ियो’– तीसरी मंज़िल। एक अंधेरे से ज़ीने के पास एक बुज़ुर्ग आदमी बैठा था जिसने मेरा मुँह खुलने से पहले ही कहा – इस ज़ीने से आप तीसरी मंज़िल पर चली जाइए, दाहिनी ओर दिलशाद स्टूडियोमिल जाएगा। जब मैं ज़ीने की ओर बढ़ी तो एक घबराहट मेरे जिस्म के साथ लिपट गई थी। हालाँकि लखनऊ के पुराने, ख़ासकर मुस्लिम आबादी के इलाके ऐसे ही होते हैं, कई रिश्तेदारों के यहाँ मैं गई भी हूँ, पर इन मकानों में रोशनी की कमी और सीलन की गंध का एहसास इन्हें एक भुतहा एहतिमाम से भर देता है।

तीसरी मंज़िल पर दिलशाद स्टूडियोथा। वहाँ एक बल्ब जल रहा था। दरवाज़े को धकेल कर मैं अंदर गई तो रिसेप्शन पर एक लड़की दिखाई दी। मुझे हल्के से सुकून का अनुभव हुआ। मैंने उसे अपना नाम बताया तो उसने एक कमरे के दरवाज़े की ओर इशारा करते हुए कहा – वहाँ मिस्टर सिद्दीकी और मिस्टर सक्सेना बैठे हैं उनसे मिल लीजिए।

एक लम्बे टेबल के उस ओर दो उम्रदराज़ शख्स बैठे थे। सलाम, नमस्कार के बाद उन्होंने मुझे बैठने के लिए कहा। मिस्टर सिद्दीकी ने मोटे गत्ते पर क्लिप लगे, एक कागज़ पर लिखी कहानी का एक अंश मेरी ओर बढ़ाते हुए कहा – मोहतरमा रोमिला बुखारी इसे खुल कर पूरे एहसास के साथ पढ़िए।

मिस्टर सक्सेना ने टोकते हुए कहा – रिलैक्स, पहले इसे एक बार, ऐसे ही पढ़ कर देख लीजिए ताकि आप समझ जाएँ कि यह सब किस मक़सद के लिए है ताकि ऑडीशन में अटकें या घबराएँ नहीं।'

उस कहानी को पढ़ना शुरु किया तो मैं अवाक रह गई। कहानी की भाषा में कुछ ऐसे शब्द थे जिनका उच्चारण मैंने अपनी इक्कीस साल की उम्र तक, कभी नहीं किया था। अगर उन शब्दों के समानार्थी शब्दों का उच्चारण दोस्तों के बीच में कभी किया भी होगा तो वे अंग्रेज़ी के शब्द थे जो बोले जाते वक्त हिंदी के शब्दों जैसे भदेस और उत्तेजक भाव प्रकट नहीं करते। मेरे चेहरे पर शर्म और पसीना एक साथ बरसात के बादलों की तरह चले आए थे। मैंने कुर्सी से उठते हुए कहा – मिस्टर सिद्दीकी यह सब क्या है, मैं एक इज़्ज़तदार घर की लड़की हूँ, ऑडीशन के लिए आई हूँ, यह क्या पढ़वा रहे हैं आप मुझ से।'

आपको संदीप ने बताया नहीं? हम लोग एक एडल्ट चैनल चलाते हैं, जाहिर है वहाँ हमारे श्रोता ऐसी ही कहानियाँ पसंद करते हैं। रोमिला जी, यहाँ एक से एक इज़्ज़तदार घरों की औरतें आती हैं, रिकॉर्डिंग करवाती हैं और अदब से चली जाती हैं। मैडम, हम हर एक कहानी की रेकॉर्डिंग का मेहनताना, तीन हज़ार रुपया देते हैं और यक़ीन कीजिए, हमारे कलाकार किसी रेड़ियो जॉकी से कम पैसा नहीं कमाते। और इतना ही नहीं हम आपके असली नाम और पहचान को प्राइवेट रखते हैं, हम अपने कलाकारों को बड़े शोख और क़ातिल नाम देते हैं, उनके ऑरीजनल नाम किसी को नहीं बताते। आप सोच लीजिए।'

मेरी आँखों के आगे अंधेरा छा रहा था। कुर्सी पर बैठ कर पानी पीते हुए मैंने सोचा – अगर मुझे पैसा कमाना है तो सिर्फ स्क्रिप्ट पढ़नी होगी, उसमें क्या लिखा है उससे ध्यान हटाना होगा। एक आर्टिस्ट हर तरह के किरदार निभाता है। ज़िंदगी प्रोफेशनल एप्रोच के बिना नहीं चल पाएगी। इस समय हमारे घर के जो हालात हैं, पैसा हमारी ज़रूरत है।'

सक्सेना जी ने बड़ी मुलायमियत से कहा – हम सारी रेकॉर्डिंग गल्फ कंट्रीज़ और पाकिस्तान के लिए करते हैं, इसलिए हमारी स्क्रिप्टें उर्दू में होती हैं, इत्मिनान रखो भारत में आवाज़ के ज़रिए तुम्हें कोई नहीं पहचान पाएगा। बहुत सारे लोगों की आवाज़ें मिलती जुलती-सी होती हैं। संदीप ने तुम्हारे घर की माली हालत के बारे में सिद्दीकी साहब को बताया था, इसलिए हमने तुम्हें बुलाया। यहाँ तो दिन भर में कई औरतें बुर्का पहन कर आती हैं, रेकॉर्डिंग करवाती हैं और नकद पैसा लेकर चली जाती हैं। चलो अब हिम्मत जुटा कर इस स्क्रिप्ट को पढ़ो।'

मैंने पूरी हिम्मत जुटाई और माइक के सामने खड़े होकर उस कहानी के चार पन्नों को पढ़ डाला। पहले पन्ने को पढ़ते हुए कुछ झिझक थी, दूसरे पन्ने को पढ़ते हुए मुझे लगा कि मैं और संदीप किसी शानदार होटल के कमरे में, एक दूसरे के जिस्मानी भूगोल को साथ-साथ समझ रहे हैं। तीसरे और चौथे पन्ने को पढ़ते-पढ़ते तो उत्तेजना के कारण मेरी साँसें उफन रही थीं। पर मैंने बुरी तरह से धड़कते दिल और काँपते पावों के साथ उस कहानी को पढ़ ही डाला।

सिद्दीकी साहब ने बहुत करीब आकर मुझे पिंच करते हुए कहा –मुबारक हो! तुमने तो ऑडीशन में ही एक कहानी की शानदार रेकॉर्डिंग कर दी। अब तुम्हारे लिए काम की कोई कमी नहीं।

मैंने गर्दन झुका कर कहा – सर, मैं बहुत घबराई हुई थी।

यह बहुत नेचुरल लगेगा, कहानी सुनने वालों को। लड़की की घबराहट सुनने वाले मर्दों को एक अच्छा फील देगी। बाकी सब तो हम म्युज़िकल इफैक्ट्स और स्टॉक ऑडियोज़ के ज़रिए एडजस्ट कर लेंगे।' सक्सेना साहब ने कहा।

सिद्दीकी साहब ने रिसेप्शन पर बैठने वाली लड़की को घंटी बजा कर बुलाया और कहा – मिस दीबा, ‘दिव्या वर्माका नाम रजिस्टर में दर्ज़ करके मैडम को तीन हज़ार रुपये का भुगतान करो। पता उजरियाँवा का डाल देना।फिर मेरी ओर मुखातिब होकर कहा – इस पेशे में आज से आपका नाम दिव्या वर्मा हैं। अपनी अम्मी जान से कहिएगा कि मुझे गल्फ की एक कम्पनी के कॉल सेंटर में काम मिल गया है। ज़रूरत के हिसाब से उनकी प्रॉडक्ट डिटेल्स वगैरह पढ़नी होंगी और सप्ताह में पाँच दिन स्टूडियो आना-जाना हुआ करेगा। हमारे एडल्ट चैनल के बारे में आप किसी को नहीं बताएँगी और हम आपका असली नाम और पहचान किसी को नहीं बताएंगे। यह कारोबार, इसी तरह के आपसी भरोसे की बुनियाद पर चलता है।उनकी आँखों में एक बड़ी सधी हुई शरारती चमक थी।

जब मैं अपने पर्स में अपनी पहली कमाई के तीन हज़ार रुपये डाल कर रिक्शा में बैठी तो अच्छा लग रहा था, पर यह भी लग रहा था मानो मेरी चुन्नी का एक पल्लू साथ-साथ चलते किसी साँड ने अपने मुंह में पकड़ रखा हो, वह भागा तो साथ में मेरी इज़्ज़त भी ले जाएगा। फिर भी मैंने सुलेमान स्वीट्स से कुछ फिरनियाँ खरीदीं, बाटा से अम्मी के लिए एक जोड़ी कुशन वाली चप्पलें लीं और जैन टिक्की वालेके ठेले पर खड़े होकर पूरे दस गोल गप्पे खाए।

उस रात मैंने खुद को समझाया – रोमिला बेबी, पैसा मुफ्त में नहीं मिलता। कोई काम छोटा-बड़ा या अच्छा-बुरा नहीं होता। जब किसी काम को वाजिब मुआवज़े के भुगतान के साथ करते हुए, मर्द खुद को एक्सप्लोइटिड नहीं समझता तो औरत क्यों समझे? औरत की दुनिया, मर्द की दुनिया जैसी ही क्यों न हो? ज़िंदगी को सुकून से चलाने के लिए प्रोफेशनल एप्रोच ज़रूरी है। एक आर्टिस्ट का काम, अपने हुनर से पैसा और नाम कमाना ही तो है। मैं इस चैनल के लिए काम करूँगी, इसमें कोई बुराई नहीं है।'

धीरे-धीरे मैं अपने काम में सहज हो गई, अगर कहूँ कि मुझे मज़ा आने लगा तो शायद आपको तक़लीफ भी हो सकती है । मैं उन रंगीन कहानियों को बढ़िया उतार-चढाव के साथ पढ़ने लगी। चैनल से फैन-मेल भी खूब मिलती, लोग आहें भरते, कसीदे पढ़ते, ‘दिव्या वर्माको कभी दुबई तो कभी कुवैत से बुलावे मिलते। अनजान आशिक, पूरी ख़ातिर तवज़्ज़ो और शॉपिंग का खर्च उठाने के वायदे करते। मैं शीशे के सामने खड़ी हो कर खूब ठठाकर हँसती – हैलो, तुम कहाँ हो दिव्या वर्मा?’ 

एक दिन स्टूडियो में संदीप से मुलाकात हुई, वह किसी रेकॉर्डिंग के लिए आया था।

मैंने कहा – अरे तुम तो नामी आर. जे. हो, अपने रेडियो स्टेशन से खूब पैसा लेते हो, ये सब भी....

उसने मेरी ठुड्डी को ऊपर उठाते हुए, मेरी आँखों में आँखें डाल कर कहा – पैसा तुम ज़्यादा कमा रही हो मिस रोमी! क्या मिलता है एक आर.जे. को, यही पचास हज़ार रुपया। बस ग्लैमर है। तुम जैसी सुंदर लड़कियाँ थोड़ा-सा छू भर लेने देती हैं और कुछ भी नहीं। सिद्दीकी साहब बता रहे थे तुम तो महीने में 30-35 रेकॉर्डिंग कर लेती हो। टैक्स-फ्री, नकद लाख रुपये आराम से घर ले जाती हो। अब बोलो।'

मुझे अच्छा लगा, मैं संदीप से ज़्यादा कमा रही हूँ, और ज़्यादा भी कमा सकती हूँ।

मेरे घरेलू हालात सुधर रहे थे। पैसा आ रहा था पर अम्मी की बीमारी पर भी खर्च बढ़ रहा था। बहने भी जल्दी-जल्दी आने लगी थीं, हर तरफ हल्ला था कि रोमिला किसी गल्फ की कम्पनी के साथ लाख रुपये की नौकरीकरती है। रिश्ते भी आ रहे थे और अम्मी जान बढ़िया दूल्हे की खोजबीन में लगी थी। सलमान जीजू बार-बार एक ही बात कहते थे – किसी दुबई में कमा रहे लड़के से शादी कर लो, दूल्हा भी मिल जाएगा, नौकरी वहाँ पहुँच कर भी चलती रहेगी, और तुम्हारे कनेक्शन से हम भी वहाँ चले आएँगे।मैं मुस्करा देती। क्या बताती अपनी गल्फ की नौकरीके बारे में। बस इतना कहती – अभी मैं 21 की ही तो हूँ, मुझे चार साल बाद ही निकाह करना है। पहले खूब पैसा कमाना है, अम्मी के लिए आगे के ज़िंदगी के बंदोबस्त करने हैं।सब चुप हो जाते।

सन उन्नीस खत्म होते-होते काम धंधे के हालात बदलने लगे थे। दिलशाद स्टूडियोपर कानून और इनकम टैक्स की नज़र पड़ गई थी। एक दिन इनकम टैक्स की टीम ने छापेमारी के दौरान, सिद्दीकी साहब के घर से पचास लाख रुपया कैश पकड़ा, जो हवाले के ज़रिये उन तक आया था। ऐसे काले-पैसे को कई सारे कामों में, नकद भुगतानों के ज़रिये खपा दिया जाता था। यह खोजबीन रेड़ियो हमसफरतक भी पहुँची और उसके मालिक जो सिद्दीकी साहब के क़रीबी रिश्तेदार थे इस हवाला कांडमें धर लिए गए।

कई अख़बारों ने इस रेड को मौजूदा सरकार की बदले की सियासी करतूत भी बताया पर कुछ हुआ नहीं। सन बीस की शुरुआत हुई ही थी कि दिलशाद स्टुडियोऔर रेडियो हमसफरदोनों पर ताला पड़ गया। मेरी आमदनी का ज़रिया खत्म हो गया और संदीप की नौकरी चली गई थी। हमारे कारोबार ऐसे भी नहीं थे कि हम कहीं दूसरी जगह काम खोज लेते। अम्मी जान को कम्पनी के बंद होने की खबर दी तो वे डिप्रेशन में चली गईं। अब मुझे उन्हें भी संभालते हुए, अपने और अपनी आमदनी के बारे में सोचना था।

फरवरी का महीना बैचैनी में कटा। टेलिविज़न पर और अखबारों में एक नई बीमारी के चर्चे बढ़ते जा रहे थे जो चीन से निकल कर पूरी दुनिया में फैलती जा रही थी। इटली और फ्रांस पहुँचे सैलानियों को लौटाया जा रहा था। भारत में क्या-क्या होगा, इस तरह की अटकलों का बाज़ार गर्म था।

मार्च का दूसरा सप्ताह शुरु हुआ था। एक दोपहर हज़रत गंज के कॉफी-हाउस में, मैं और संदीप, एक मेज की आपने सामने की कुर्सियों पर मुँह लटकाए बैठे थे। उसकी बेचैन उंगलियाँ मुट्ठियों में बंद थीं, और मेरे मन में किसी तरह का कोई रोमांटिक खयाल नहीं था। बेरोज़गारी का दौर भारी पड़ रहा था, हमें काम की ज़रूरत थी और दुनिया एक नई बीमारी की आहट से सहमी हुई थी।

हम किसी एम. एल. ए. के भाई, प्रशांत मणि त्रिपाठी का इंतज़ार कर रहे थे। हमें किसी माध्यम से पता लगा था कि अब सत्तारूढ़ पार्टी के लोगों के रिश्तेदार भी उसी तरह के डबिंग स्टूडियो और काम धंधे चलाएंगे जैसे कल तक सिद्दीकी साहब जैसे लोग चलाया करते थे। सरकारें बदलने से काम धंधे थोड़े ही बदलते हैं, इंसानी ज़रुरियात भी तो नहीं बदलते।

प्रशांत मणि त्रिपाठी छह फीट के कद्दावर आदमी थे जो ऊपर से नीचे तक सफेद ही सफेद थे। उनके आते ही कॉफी हाउस में हलचल शुरु हो गई। बर्गर, सैंडविच और गरमा-गर्म कॉफी परोस दी गई। उन्होंने मुझे तीखी नज़रों से देखते हुए कहा – हम तो आपके फैन हैं मैडम दिव्या वर्मा, खूब सुनी हैं आपकी मदमस्त कहानियाँ। क्या कशिश है आपकी आवाज़ में और आज मिल कर देखा कि आप तो माशा अल्लाह बला की खूबसूरत भी हैं। देखो संदीप मेरे पास मैडम 'महा शांति कॉम्पलैक्स' में कॉल-सेंटर है, क्लाइंट्स तो सब अरब देशों से ही होते हैं, पैसा है न उनके पास, पर वहाँ शिफ्ट ड्यूटी में काम करना होगा। एक लाख रुपया महीना फिक्स। आधा चैक से, आधा कैश। रात की ड्यूटी में डिनर के साथ-साथ, पिक-अप और ड्रॉप के लिए गाड़ी की सुविधा भी मिलेगी।'

'थोड़ा-सा और ज़्यादा क्रियेटिव? क्या मतलब!'  

'हम कहानियों की बजाय 'लाइव शो' चलाएंगे, आपको लाइव होकर 'टॉक्स' देनी होंगी।'

वैसी वाली लाइव टॉक्स.... ना बाबा ना, मैं वैसी लड़की नहीं हूँ, मुझसे नहीं होगा।मैंने माथा पकड़ते हुए कहा।

क्या ख़ास है इसमें? आपको अपनी पुरानी कहानियों के वही घिसे-पिटे डायलॉग तो लिखने या बोलने होंगे। और हाँ, लाइव वीडियो स्ट्रीमिंग में हम आर्टिस्ट का चेहरा मास्क कर देते हैं। सिर्फ बदन देख कर तो कोई आपको पहचान नहीं पाएगा। सोच लीजिएगा, लड़कियाँ एक से एक खूबसूरत, हैं मेरे पास, पच्चीस हज़ार में भी यही काम करेंगी, पर आप जैसी नफ़ीस उर्दू नहीं बोल पाएँगी। आपको अपने साथ लेने की दिली इच्छा न जाने कब से है हमारी। बस, इसीलिए इतना ज़्यादा ऑफर कर रहे हैं, रोमिला जी।त्रिपाठी जी की आँखों में कुछ दबंगई-गुंडई झलक रही थी।

संदीप, अगर मैडम ने हमारा प्रपोज़ल मान लिया तो तुम जिस एफ. एम. में कहोगे, हम वहीं तुम्हारी नौकरी लगवा देंगे। हमारे विधायक भैया जी को नाराज़ करके लखनऊ का कोई प्राइवेट चैनल नहीं चल सकता। एक अप्रैल 2020 को तुम पक्का इंद्रधनुष में ज्वाइन कर लेना, डायरेक्टर हमारे भक्त हैं। अब हम चलते हैं। 25 मार्च को शाम चार बजे मैडम को हमारे कॉल सेंटर पर ले आना, उस दिन वहाँ विधायक जी भी तशरीफ ला रहे हैं, नमस्कार।'

त्रिपाठी जी के जाने के बाद हम एक दूसरे का मुँह देख रहे थे। वह हम दोनों की किस्मत एक दूसरे के साथ नत्थी करके भाग गए थे। मुझे त्रिपाठी जी की आँखों में वही भाव दिखे जो कभी मेरी अम्मी जान के लिए मेरे दादा जी की आँखों में होते थे।

रास्ता जैसा भी था मेरे सामने था, उस पर चलने या न चलने का फैसला भी मुझे ही लेना था।

संदीप ने चुप्पी तोड़ते हुए कहा – रोमी, मत लेना यह काम, इन लोगों की संगत में तुम बरबाद हो जाओगी। मेरी फ़िक्र मत करो, मैं तो कुछ न भी हुआ तो दिल्ली चला जाऊँगा, अनुभव है मेरे पास, वहाँ काम मिल जाएगा। चाहो तो तुम भी दिल्ली चल सकती हो, वहाँ मेरे कई दोस्त हैं।

संदीप अब मैं कोई कमज़ोर लड़की नहीं हूँ, यह मत समझना कि कोई मुझे बेवकूफ बना कर यूज़ कर लेगा, मुझे 'दिलशाद स्टूडियो'  , वे उत्तेजक कथानक मुझे भी मोम की तरह पिघला देते थे। मैंने एडजस्ट किया क्योंकि मेरी भी कई ज़रूरतें थीं, फिर खूब पैसा कमाया और मेरे साथ मित्रवत हो गए।

कुछ दिनों के आत्मसंघर्ष के बाद मुझे समझ आ गया, स्त्री अस्मिता की सुरक्षा का संबंध पुरुष के हिंसक और व्यभिचारी होने से जुड़ा ही नहीं है, वह तो स्त्री की आर्थिक विवशता का स्वाभाविक परिणाम है। क्या आज कोई पुरुष सनी लियोनी को हमबिस्तर होने के लिए मजबूर कर सकता है? लोग उसकी एक झलक के लिए न जाने कितना पैसा और समय देने को आतुर रहते हैं। इसलिए मेरी फिक्र छोड़ो, मुझे त्रिपाठी जी के कॉल सेंटर को गुलज़ार करना ही होगा। बोलो एक साधारण सेकिंड क्लास ग्रेजुएट लड़की को इतना पैसा कौन देगा? संदीप, इससे कम आमदनी की नौकरी अब मैं नहीं कर पाऊँगी। तुम इंद्रधनुषएफ. एम. में नौकरी ले लो। मैं तुम्हें रोज़ सुना करूँगी।'

वक्त चेहरे पर काला नकाब लगाए, उनके सामने खड़ा था। उन दोनों ने बच्चों की तरह वक्त की खुंखार उंगलियों के सुपुर्द अपनी नाज़ुक हथेलियाँ कर दीं, और साथ-साथ दौड़ने के लिए तैयार हो गए।

रोमिला खुश थी कि चलो महीने भर की बेरोज़गारी के बाद फिर से नए रोज़गार के आसार बने हैं। उसके मन पर कोई बोझ भी नहीं था क्योंकि ज़िंदगी की अनवरत लड़ाई के मैदान में, वह एक खंदक से निकल कर दूसरी खंदक में ही तो जा रही थी। वह तो एक सैनिक थी, कोई राजकुमारी तो थी नहीं कि नंगी ज़मीन पर चलने से उसके पाँव घायल होते।

उसने घर लौट कर उदास अम्मी जान को बताया कि अगले महीने की एक तारीख से उसे नई नौकरी मिल रही है। कॉल सेंटर की ही नौकरी है पर यह कॉल सेंटर अरेबिया के लिए नहीं अमेरिका के लिए काम करता है और अमेरिकन लोगों का दिन तब होता है, जब हमारे यहाँ रात होती है, लिहाज़ा नौकरी उसे रात के साए में करनी होगी। ले जाने और छोड़ने के लिए गाड़ी का बंदोबस्त कम्पनी करेगी।

अम्मीजान का चेहरा कह रहा था कि यह प्रपोज़ल उन्हें पसंद नहीं आ रहा है कि उनकी जवान बेटी रात भर घर से बाहर रहे। वह कुछ कहना चाहती थीं, पर कह नहीं पा रही थीं। मैंने उनकी आँखों में आँखें डाल कर कहा – अम्मू आप कहें तो महमूद चचा की लड़की की तरह, कौसर मिया के दर्ज़ीखाने में दस हज़ार की नौकरी कर लूँ?’ अम्मी चुप रहीं, आसमान की ओर हथेलियाँ उठा कर अल्लाह से रहम और सद्गति की प्रार्थना करने लगीं।

इसके बाद जो हुआ, उसे पूरी दुनिया अल्लाह की नाराज़गी या महामारी के कहर के रूप में जानती है। पूरा देश कोरोना से लड़ने के लिए तैयार होने लगा और जिस तारीख का मुझे इंतज़ार था, उसके आने तक तो लखनऊ क्या पूरा देश, दुनिया का बहुत बड़ा हिस्सा लॉक-डाउन में चला गया । इस त्रासदी का कोई ओर-छोर नज़र नहीं आ रहा था। आप ही की तरह, हम सब लोग भी कोरोना से डर कर, अपने-अपने घरों में कैद हो गए थे। टेलिफोन ही एक ज़रिया था, जिस पर हम दिल हलका कर सकते थे।

अम्मी जान इन हालात में कभी चीन पर नाराज़ होतीं तो कभी इस बात पर अफ़सोस जाहिर करतीं कि कैसा वक्त आगया है, मक्का-मदीना से लेकर सभी मंदिर तक लोगों की आमद से महरूम कर दिए गए हैं। वह बार-बार मुझ से पूछतीं – रोमी सब कुछ ऐसे ही चला तो संदूक में रखे वे सारे रुपये खत्म हो जाएँगे जो तुम से लेकर, मैंने तुम्हारे निकाह के लिए बचाने शुरु किए थे। नाराज़ मत होना उन रुपयों में से मैंने सर्दियों में निगार और शबनम को भी पचास-पचास हज़ार रुपये दिए थे क्योंकि निकाह के वक्त मैं दोनों दूल्हों को मोटर-साइकिल नहीं दे पाई थी और लम्बे अरसे से तुम्हारी बहनों की नाराज़गी झेल रही थी।' मैंने कुछ नहीं कहा।

संदीप दिन में दो बार फोन करता था और हम लोग अपनी बदहाल ज़िंदगी का रोना रो लेते थे। अम्मी जान को बता दिया था कि संदीप से मेरा कोई चक्कर वक्कर नहीं है और मैं जब भी निकाह करूँगी, उनकी पसंद के लड़के से ही करूँगी।  

संदीप की ज़िंदगी पटरी से उतर चुकी थी, उसकी गर्ल-फ्रेंड ने उसे छोड़ दिया था, जिसका उसे खासा मलाल था। मैं किस्मतवाली थी कि मेरी जान को कोई ऐसा लफ़ड़ा नहीं था। ज़िंदगी में निकट संबंधों की परत-परत सच्चाई, मेरे सामने उघड़ रही थी। मेरी नौकरी जाने की खबर जीजू लोगों तक भी पहुँच चुकी थी और उन्होंने दुबई जाने के लिए तैयार किए अपने सूटकेस अनपैक कर दिए थे। उनका खयाल था कि इस महामारी से उबरने के बाद, दुबई के शेख अपनी गाड़ियाँ हिंदुस्तानी-पाकिस्तानी ड्राइवरों से चलवाने की बजाए, रोबोटों से चलवाना पसंद करेंगे।

त्रिपाठी जी से संदीप का सम्पर्क लगातार चल रहा था। इस महीनों चलने वाले लॉक-डाउन ने हमें धीरे-धीरे यह एहसास करा दिया था कि ज़िंदा रहने के लिए पैसे की ही ज़रूरत है। त्रिपाठी जी, बेचैनी के आलम में, कभी-कभी मुझे भी वीडियो कॉल लगा लेते थे, वे मुझे जी भर देखना चाहते थे पर मेरा तज़ुर्बा कहता था कि नौकरी मिलने तक तो उनका जी, बिलकुल नहीं भरना चाहिए। वह भी रोज़ अपने ईश्वर से कोरोना खत्म होने की दुआ माँगते थे ताकि उनका इंटरनेशनल कॉल सेंटर जल्दी से जल्दी चालू हो और वेब पर पड़े सारे रेकॉर्डिड कंटेंट को हटा कर, ग्राहकों को ताज़ा माल परोसा जा सके।

खंडहर हुए घरों के ऊपर से झाँकता बुद्ध पूर्णिमा का चाँद इस बार कुछ ज़्यादा ही बड़ा और पीलापन लिए हुए था। वह अम्मी जान के माथे की तरह लग रहा था जो सफेद उड़ते बालों के बीच उदासी का एक चमकता हुआ अक्स बन गया है। साठ पार कर चुकी अम्मी जान की सेहत अब अच्छी नहीं रहती पर उन्हें धार्मिक उसूलों के मामले में कोई समझौता करना नहीं आता। रमज़ान के तीस या उनतीस दिनों में वह सूर्योदय से लेकर सूर्यास्त तक बिना कुछ खाए पीए मुकम्मल रोज़ा रखती हैं। अम्मी जान उठते बैठते बार-बार यही कहती हैं– रमज़ान के महीने में दिल से अल्लाह की बंदगी करने वाले शख्स की हर ख्वाहिश पूरी होती है। तुम तो छुटपन से ही रोज़े रखती आई हो, इस बार अल्लाह से माँग लो कि नई नौकरी जल्दी से शुरु हो, अमीर शौहर मिले और तुम्हारी हर मुराद पूरी हो।

इन दिनों रोज़ा खोलने के बाद मैं और अम्मी छत पर चले आते हैं। कोरोना के कहर ने आखिरी रोज़े के बाद आने वाली ईद का सारा उत्साह खत्म कर दिया है। आस पास की छतों पर कुछ लोग दिखाई देते हैं पर चेहरों को हरी और काली मास्कों से ढके हुए। पुराने दिनों की तरह बातचीत तो क्या दुआ सलाम तक नहीं होती।

ईद के दिन चाँद मामा अगर पूछेंगे कि बोलो रोमिला बानो, तुम्हें ईदी में क्या चाहिए

तो मैं इतना ही कहूँगी – 'मामू जान दुनिया से इस कोरोना के जाल को समेटो,

अब पैसे के साथ-साथ मेरा आत्मविश्वास भी सिमटने लगा है।

मैं नहीं चाहती लोग लाख रुपये वाली रोमिला को वक्त की कब्र में दफ़्न हुआ मान लें,

मुझे जल्दी से जल्दी त्रिपाठी जी के कॉल सेंटर में ज्वाइन करना है!

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रचनाकार परिचय 

राजेश्वर वशिष्ठ

जन्म : 30 मार्च, 1958

प्रकाशित कृतियाँ :  

काव्य : 

1. सुनो वाल्मीकि ( कविता संग्रह ) 2015

(हरियाणा साहित्य अकादमी के 2015 के सर्वश्रेष्ठ कविता संग्रह पुरस्कार से सम्मानित)

2. सोनागाछी की मुस्कान ( कविता संग्रह ) 2016

3. अगस्त्य के महानायक श्रीराम (काव्य ) 2017

4. प्रेम का पंचतंत्र (लव नोट्स) 2018

5. देवता नहीं कर सकते प्रेम  2019 

उपन्यास : 

1. मुट्ठी भर लड़ाई 

2. याज्ञसेनी  - द्रौपदी की आत्मकथा 2018

अनुवाद  : 

1. कविता देशांतर : कनाड़ा 2004

2. जीवन के अद्भुत रहस्य , गौर गोपाल दास – पेंग्विन – 2019 

3. लोकतंत्र वाया सड़क मार्ग, रुचिर शर्मा – पेंग्विन – 2019 

4. रॉयल कॉलिंस के लिए चार पुस्तकों का अनुवाद 

विभिन्न पत्र - पत्रिकाओं में अनेक विधाओं का साहित्य प्रकाशित

फिल्म तथा अन्य ऑडियो-विज़ुअल विधाओं से गहरा जुड़ाव

सम्प्रति : स्वतंत्र लेखन।

सम्पर्क : 

rajeshwar58 @ gmail.com  दूरभाष  : 9674386400, 8840081836, 0124-4971585 

आवासीय पता :  1101, टॉवर - 4,  सुशांत एस्टेट, सैक्टर– 52, गुरुग्राम -122003,  हरियाणा




भूमिका द्विवेदी हिन्दी साहित्य की एक सुपरिचित युवा नाम हैं जो लगातार अपनी सार्थक रचनाओं द्वारा सकारात्मक हस्तक्षेप कर रहीं हैं। सामाजिक विसंगतियाँ, हाशिए पर छूट गए लोगों की व्यथा, रिश्तों के मनोविज्ञान की पड़ताल इनकी कहानियों के प्रमुख विषय होते हैं।मेराकी पर पढिए उनकी नयी कहानी दूध, जहाँ वंचित समाज के जीवन की एक रात अपने सबसे भयावह रूप में वर्णित है। 








सपना सिंह हिन्दी कहानी की एक सुपरिचित नाम हैं। मेराकी पर पढ़ते हैं, उनकी एक नयी कहानी -पवित्रा, जहाँ घरेलू हिंसा और स्त्री शोषण को नए नज़रिए से परखने की कोशिश की गयी है। घर की चारदीवारी में जो घटित होता है, उसका एक दूसरा पक्ष भी हो सकता है, जो अक्सर हमसे अनदेखा रह जाता है। यह कहानी बिना किसी निर्णय पर पहुंचे सिर्फ़ एक तस्वीर खींचती है और पाठकों को अपने प्रश्नों के साथ छोड़ देती है। मानवीय सम्बन्धों की जटिलतों से जुड़े ऐसे प्रश्न जिनका कोई समाधान शायद संभव ही नहीं है।         





महाकाव्य एक सामंती विधा है जहां हाशिये के लोगों के लिए विशेष जगह नहीं बचती। सामंतवाद और पितृसत्ता में गठजोड़ रहता है। पितृसत्ता की मनोभूमि का निर्माण सामंती मानस से ही होता हैं। बल्कि कहें कि यह सामंतवाद का ही दूसरा रूप है तो अतिश्योक्ति नहीं होगी। इसलिए यह अकारण ही नहीं है कि इन महाकाव्यों में स्त्री है ही नहीं
मेराकी पर पढिए हमारे महाकाव्य की सबसे आराध्य लेकिन विवादास्पद चरित्र सीता की उत्तरगाथा आलोचक और शिक्षाविद सुनीता गुप्ता की कलम से। 


 सोनाली मिश्र युवा हिन्दी कहानी की एक सुपरिचित नाम हैं। उनकी कहानियों में मानव मन की गुत्थियों की गहन पड़ताल रहती है। मानवीय संवेदनाओं और रिश्तों की अभिव्यक्ति में वह अक्सर स्त्री रचनाकारों के लिए अघोषित रूप से तय की गई सीमा रेखा का अतिक्रमण करती भी दिखाई देतीं हैं और इसलिए अक्सर उनके लेखन को बोल्ड और बिंदास जैसे ब्रैकेट में भी रख दिया जाता है। 

मेराकी पर प्रस्तुत है उनकी ताज़ातरीन कहानी जहाँ प्रेम के बदलते स्वरूप और उसकी जटिलताओं के मनोवैज्ञानिक चित्रण के साथ आधुनिक स्त्री के अंतर्द्वंदों की झलक और उसकी मुक्ति की छटपटाहट भी है।  




फिर से वह वहीं पर सट आई थी, जहाँ पर उसे सटना नहीं था। फिर से उसने उसी को अपना तकिया बना लिया था, जिसे वह कुछ ही पल पहले दूर फेंक आई थी। उसने देखा कि खिड़की से चांदनी का आना बदस्तूर जारी था, इस बात के बावजूद कि बादल आसमान पर छाए थे। चाँद के लिए इतनी जगह वह छोड़े दे रहे थे कि वह चांदनी को उसके कमरे में भेजता रहे। उसका कमरा? वह चौंक गयी? हाँ, उसका ही तो! बल्लू तो उसके कमरे में ही सोने आता है। अपने कमरे में तो अपनी बदबूदार शर्टें उतार कर फेंक आता है। जैसे दिन भर का गर्द उतार कर फ्रेश होने के लिए आ गया हो! फिर इस कमरे में प्रेम गंध फैलती है। जिसने प्रेम किया है, उसने प्रेम गंध भी महसूस की होगी। कितनी अपनी होती है प्रेम गंध? वह दो देहों को एक कर देती है! दो देह कब एक हो जातीं है, यह तो खिड़की से आती चांदनी भी महसूस नहीं कर पाती होगी!

अजंली यह सोचते सोचते कब नींद में चली गयी, पता न चला!, मगर जैसे ही दो देह अलग होती हैं, उनकी देहों के मध्य पसरे एकांत में नींद अपना बसेरा कर लेती है। अंजली इस एकांत की आदी थी। इस नींद की आदी थी।

सुबह उसकी आँख खुली, तो उसने देखा कि उसका बल्लू और जमाने के लिए बलदेव, ऑफिस के लिए तैयार हो रहा था। अंजली ने मोबाइल उठाकर समय देखा। खिड़की से आती रोशनी यह इशारा कर रही थी कि अभी समय नहीं हुआ है। और आज तो वैसे ही नए साल की छुट्टी ही होनी थी, तो फिर बल्लू इतनी जल्दी तैयार क्यों हो गया है? उसकी समझ में कुछ नहीं आया! मगर उसका मन नहीं हो रहा था कि वह उठे! उसने रजाई को फिर से अपने शरीर पर डाल लिया। आँखें बंद कर लीं, जैसे रोशनी देखना न चाहती हों। जैसे रोशनी से विरक्ति हो रही हो।

सुनो, मैं निकल रहा हूँ! आज कुछ काम है, शाम को मिलते हैं!” चादर में होती हलचलों को देखते हुए उसने कहा
अंजली के पास आज कुछ काम नहीं था, तो उसने सोचा था कि देर तक सोएगी और फिर कहीं घूमने जाएगी! कहाँ जाएगी? दिल्ली में इतनी जगहें हैं, कहीं भी चली जाएगी! कौन सी जगहों की कमी है? बल्लू होता तो वह खींच कर मॉल ले जाता, मगर उसे मॉल पसंद नहीं थे। उसे नकली चमक पसंद नहीं आई कभी। बल्लू को भी कहाँ पसंद आती थी। यही जो नकली चमक की नापसंदगी थी, वह दोनों को पास ले आई थी। कितना कुछ था उस रोशनी में जो उन दोनों के दिलों में थी। कितना कुछ था उस एकांत में जो उन दोनों की हथेलियों में था।
अंजली ने हिंदी से बीए करने के साथ ही टूर्स एंड ट्रेवल्स में डिप्लोमा किया था और अब फ्रीलांसिंग कर रही थी। उसे हिंदी की ताकत पता थी। मगर उसे यह भी पता था कि अकेली हिंदी और किताबो की हिंदी उसे रोजगार नहीं देगी। इसलिए उसने टूर्स एंड ट्रेवल्स में डिप्लोमा भी ज्वाइन कर लिया था।, तभी ठान बैठी थी कि वह दिल्ली ही जाएगी। अम्मा बाबा ने कितना कहा कि यहीं कहीं मास्टरी कर लो, मगर उसे तो दिल्ली आना था। कविता कहना था।
कविता कहने के लिए दिल्ली? उसकी सहेलियां हंसती!
और फिर अम्मा की सलाहों और नसीहतों की टोकरी के साथ दिल्ली आ गयी थी। हिंदी में बीए में एडमिशन होना बाकी विषयों की तुलना में सरल था। दिल्ली के सबसे अच्छे कॉलेज में उसका एडमिशन हो गया था। बाबा एक कमरा दिलाकर सामान सेट कराकर और तमाम बातें बताकर चले गए थे और फिर अम्मा रहने के लिए आ गईं थीं।, तो चली आईं थीं, संतुष्ट होकर। और वह लग गयी थी, पढ़ाई में! उसके सपने थे। सपने क्या थे, पोटली थी सपनों की! तमाम कार्यक्रमों में भाग लेती थी। आंदोलनों में भाग लेती और हाँ कविता करती! कितना प्यार है उसे कविता से, यह उसे तब समझ में आया था, जब उसने कॉलेज में कविता पढ़ना शुरू किया।

हे स्त्री,
तुम्हारी न ही कोई है पितृभूमि,
न ही कोई मातृभूमि,
तेरे साथ हैं तेरे विचार,
तेरा द्वन्द,
तेरी आत्मा,
तेरे विषय, तेरा विषाद!
तू, नहीं मिथ्या आह्लाद का विषय,
छद्म परिहास का विषय,
तू नदी अपनी धुन की,
तू स्वर अपनी देह का”

यह कविता उसकी कई बार मंचित की गयी थी।
ऐसे ही एक फेस्ट में टकरा गयी थीं दो निर्दोष आँखें! वहीं आँखें, शायद जिनका इंतज़ार उसे था। वहीं आँखें जिनके मोह में वह न फंस सके, इसलिए उसकी अम्मा साल भर तक रुक गयी थीं! यह वही आँखें थीं, जिनका साथ वह शायद चाहती थी।
उन आँखों में एक कविता थी। वही कविता जिसे वह गाती रही थी।
कविता बढ़िया कर लेती हैं आप?” उसने आकर पूछा था
जी, बस ऐसे ही, शौकिया!” वह सकुचा गयी थी। वह फेस्ट जैसे उसी तक सिमट गया था। वैसे भी वह बहुत ज्यादा किसी से बातें करती नहीं थी। दोस्त ज्यादा थे नहीं।
वह बस खुद में ही सिमटी हुई थी। उस दिन उससे मिलकर और खुद में सिमटने का मन हुआ था। बलदेव! हां, बलदेव! उसके जैसे ही छोटे शहर का लड़का था। एक्टिविस्ट टाइप का! वह एक्टिविस्ट नहीं थी। वह बस कविता लिखती थी। कविता लिखने वाले एक्टिविस्ट होते हैं क्या? बलदेव के दिल में स्त्री के लिए सम्मान था। वह जिस गाँव से आता था। उस गाँव में गरीबी अभी भी बहुत थी। बुखार फैलता तो फैलता ही जाता, छोटी जोत का खेत था उसके बाबा का। सो भी गिरवी रखा हुआ! वैसे भी बाबा चारपाई और लकड़ी के बाकी सामान बनाने का
यह तो गनीमत है दोस्तों, कि मैं अपने माँ बाबा की इकलौती संतान हूँ, कुछ नहीं हुआ तो उन्हें यहीं ले आऊँगा! और कुछ हो गया तो जमीन छुड़ा कर उनके लिए वहीं घर बना दूंगा। अपनी जड़ें कोई छोड़ता है भला?”
वह अपने गाँव की बातें बताता और अपने घर की बातें बताता तो साथी हंसने लगते। कुछ की आँखों में हौसला होता तो कुछ की आँखों में उपहास।
बलदेव का कमरा भी खिड़की एक्सटेंशन में था। धीरे धीरे वह साथ साथ जाने कॉलेज के लिए जाने लगे। और साथ साथ दिल्ली हाट की सैर करने लगे। नए नए मॉल बनते जा रहे थे, और दिल्ली के गाँव भी धीरे धीरे मॉल संस्कृति में ढलते जा रहे थे। मॉल जाना कभी भी अंजली को पसंद नहीं आया। वह तो क़ुतुब मीनार चली जाती, या फिर पुराने किले में बैठी बैठी इमारतों से बातें करती। वह जानना चाहती थी कि आखिर क्या हुआ होगा इन दीवारों का, जब वह ढही होंगी। दीवारों के ढहने का दर्द वह महसूस करना चाहती थी।
मगर जब से बलदेवने उसके कमरे पर आना शुरू किया तो उसकी शामें कमरे में बीतने लगीं। वह लोग बातें करते। बातें जो शुरू होतीं गरीबी से, बातें जो शुरू होतीं भ्रष्टाचार से और बातें जो शुरू होतीं कि सपने क्या हैं?
बलदेव को पढ़ने का जूनून था। वह पढता, और रोज़ उसके साथ चर्चा करता। वह भी चर्चा करना चाहती थी, मगर चर्चा किसकी करती? बातें करने बैठती तो बलदेव की बातें जहां दास कैपिटल आदि पर जातीं तो वहीं उसकी बातें कहीं और जातीं। मगर फिर वह लोग मार्क्स के स्त्रियों के बारे में जो विचार थे उन पर बातें करते। कितना कुछ था बातें करने के लिए। शाम रात में बदल जाती। मगर बाते खत्म न होतीं।
 , तो उसके पास चार पैसे आ जाते थे, मकान मालकिन के लिए कुछ खरीद लाती थी। और बच्चों को फ्री में पढाती भी थी तो बहुत ज्यादा पाबंदी नहीं लगाई थी। वैसे भी उस बड़े मकान के बाहर की तरफ एक कमरा अलग से था इसलिए ज्यादा डिस्टर्बेंस नहीं था। उन दोनों की बातें चलती रहतीं।
बलदेव को सिगरेट पीना पसंद था, सिगरेट पीने की नकल करते हुए कहता “देखना, एक दिन यह सिस्टम बदलेगा, और पक्का बदलेगा! नहीं तो हम जैसों के बाबा लोग हमें केवल इसी लिए बाहर पढने भेजेंगे कि दहेज़ पढ़े लिखे लड़के के लिए ज्यादा मिलेगा! मुझे इस कैद से भागना है!”
वह खूब हंसा! अंजली भी हंसी। उसे लगता था कि सिगरेट पीकर ही होशियार दिखा जा सकता है। “सुन, मैं मिश्रा प्रोफ़ेसर के सिगरेट के छल्लों जैसे सिगरेट के छल्ले निकालना चाहता हूँ। फंसे हुए, आपस में धंसे हुए! पता ही न चले कि पहले कश का कौन सा है और दूसरे कश का कौन सा?”
ठीक है, मैं ले आती हूँ!” उसने कहा था
नहीं! अपनी ही कमाई पर अपने शौक! पहले कार खरीदूंगा। उसके बाद सिगरेट पियूंगा, उसकी खिड़की से झांकते हुए। धुंआ बाहर निकलेगा। मेरी गरीबी और देश की अव्यवस्था इसी तरह छल्ले में बाहर भाग जाएगी।”
वह फिर खिलखिला उठती।
तुम व्यवस्था में बदलाव कैसे लाओगे? यह सब तो इतने सालों से ऐसा ही चलता आ रहा है। देखा नहीं है क्या हर जगह? हमें हारना ही पड़ता है। ऐसा लगता है कि हमें ही एक दिन फूलन देवी जैसे हथियार उठाने ही होंगे!” वह थोडा गंभीर हो जाती।
ऐसा लगता है कि नया काम शुरू करने में जितनी परेशानी भारत में आती है उतनी कहीं न आती होगी! हम लोग अपने गाँवों से इतनी दूर केवल किसी के ऑफिस में कुछ हज़ार की नौकरी करने तो नहीं आए हैं न! अपनी पहचान बनाने आए हैं! मगर यहाँ पर अंग्रेजी बोलने वालों का बोलबाला है! सब कुछ तो जैसे उनके ही पास है!”
अंजली की आँखों में आंसू से तिर आए थे। सफ़ेद डोरे लाल डोरों में बदल गए थे।

बलदेव ने चाय का कप रख दिया। और सोचने लगा कि वह क्या करेगा? उसका भरोसा था कि उसके जैसे युवा एक न एक दिन भ्रष्टाचार को तो ख़त्म करेंगे ही। यह भ्रष्टाचार ही तो है, जिसके कारण हर घर में पानी नहीं पहुँच पा रहा है। आज भी उसके जैसे कई युवाओं का आधा जीवन पहले पानी की लाइन में और फिर आधा जीवन राशन की लाइन में खत्म हो जाता है। अंजली ने अपनी राह चुन ली है। मगर वह अभी तक सोच नहीं पाया था। नारे लगाने तक तो ठीक था। कभी कभी बड़े प्रदर्शन में जाने के लिए पैसे भी मिल जाते थे। गरीबों को न्याय दिलाने वाले एनजीओ के साथ काम कर रहा था। जिनका पहला लक्ष्य था इस पूंजीवादी व्यवस्था से लड़ना। कई बार कुछ वह लिखकर देता था, तो कई बार किसी घटना के होने पर फैक्ट चेक करने जाता था। चाहे लड़की का बलात्कार हो या फिर हत्या, मूल में भ्रष्टाचार या फिर यही पूंजी होती थी। उसे लगता कि कुछ लोगों के पास ज्यादा पैसा होने और कुछ लोगों के पास कम पैसा होने के कारण ही इतना गलत हो रहा है। फिर उसे ध्यान आता कि उसके बाबा भी तो आजकल के क्राफ्ट के आगे नहीं टिक पा रहे हैं। नहीं तो उनके जैसी चारपाई और लकड़ी का बाकी सामान आसपास के कई गावों में बनाने वाला नहीं है। कई बार उसे लगता है कि वह अपने उसी काम में चला जाए! जितना दिमाग वह इस व्यवस्था परिवर्तन में लगाता है, उतना दिमाग वह अपने बाबा के साथ मिलकर उस क्राफ्ट को निखारने में लगाए! मगर उसे पता था कि गाँव की व्यवस्था उसे पीस देगी!
इधर उसे अंजली को देखकर भी कुछ कुछ होने लगा था। अब वह उसे देखकर सहज नहीं रह पाता था। पहले तो वह रात तक गप्पे मारने के बाद दो तीन बजे उसकी बालकनी में आकर सो जाता था, मगर अब वह घर आ जाता! अब उसे देखकर उसका मन होता कि वह घर न जाए! उसे अंजली खींच रही थी अपनी तरफ। मगर क्या अंजली भी ऐसा कुछ सोचती है? उसने सोचा!
हाँ क्यों नहीं! अगर कुछ सोचती नहीं तो इतने सहज होकर बुलाती तो नहीं!”
मगर पहले कुछ बन जाएं फिर ही उससे कहेंगे कुछ!”
और कुछ जो उससे पहले हो जाए? मने उसकी तरफ से भी पहल हो तो?”
बलदेव के दिमाग में सवाल अपनी रफ़्तार से चल रहे थे।

अंजली का बीए का आख़िरी साल था। अब तक उसका फ्रीलांसर का काम चल निकला था। जो आर्टिकल लिखती थी उन्हें पढ़कर ऐसा लगता जैसे कोई गद्य कविता ही लिख रहा हो। हाँ गद्य कविता ही होता है।
ऐसे ही एक दिन कविता की तरह बलदेव ने, जिसे अब वह बल्लू कहने लगी थी। उसके हाथ पर अपना हाथ रख दिया था। उस शाम उसने कढ़ी चावल बनाए थे। उसके और बल्लू दोनों के फेवरेट! मूढ़े पर थाली रख ली और नीचे दरी बिछा कर बैठ गए। दोनों के सामने एक किताब थी। मशहूर हस्तियों के प्रेम पत्र! और सामने आ गया शायर दाग का खत मुन्नी बाई के नाम। दोनों साथ साथ पढ़ने लगे,

बाई जी सलाम शौक!
गजब तो यह है कि तुम दूर बैठी हो। पास होती तो सैर होती। कभी तुम्हारे चारों ओर घूमता और शोला बन जाता और कभी तुम्हें शमा करार देता और पतंगा बनकर कुर्बान हो जाता.....................।।।। खुदा के लिए जल्दी आओ या आने की तारीख की तय करके खबर दो। दिन रात इंतज़ार में गुजरते हैं। .......।।। ये भयानक काली रातें, यह अकेलापन!” न जाने कब वह बीच की दूरी मिट गयी थी और मूढा एक तरफ पैर से सरका दिया। किसने सरकाया, यह दोनों में से किसी को नहीं पता। कढ़ी चावल का आख़िरी कौर किसने खाया, यह नहीं पता, मगर देह का स्वाद घुल गया। बलदेव ने उसके चेहरे को अपने चेहरे के पास लाते हुए कहा “और फिर दाग ने लिखा क्या कहूं, क्यों कर तड़प तड़प कर सुबह की मूरत देखना है? यकीन मानना ऐसे तड़पता हूँ, जैसे बुलबुल पिंजरे में! मेरे खतों का जबाव देना जरूरी है! और बल्लू पूछ रहा है अंजली क्या जो लेटर मैंने अभी तक लिखे नहीं, उनका जबाव हाँ में मिलेगा!”
अंजली ने उसे कसकर थाम लिया, जैसे सब कुछ कह दिया हो!

उस रात सब कुछ बह निकला! दो सालों से जिस देह को दूर दूर से देखकर परिचित हो गए थे, कि कहाँ तिल हो सकता है, डिम्पल में कितना गहरा गड्ढा होता है, आज की रात दोनों महसूस कर रहे थे।
सुबह उस दिन बहुत खूबसूरत हुई थी। अभी तक होता यह था कि रात में खाना खाने के बाद गप्पे आदि मारने के बाद या तो बल्लू चला जाता था या फिर वह बाहर बालकनी में सो जाता था। मगर उस रात बालकनी का वह कोना खाली ही रह गया।
जल्दी ही अंजली ने नया फ़्लैट किराए पर ले लिया था। उसका काम चल निकला था और सरकार की योजनाओं
बलदेव ने अभी आगे कुछ और करने का फैसला किया।
क्या सोचा है?” अंजली ने उसे चाय पकड़ाते हुए पूछा
कुछ नहीं! इनफैकट अभी तो कुछ भी समझ आ नहीं रहा। यह अजीब समय है अजंली!” वह कुछ हताश सा लग रहा था।
ऐसा क्यों?”
मैं कुछ समझ नहीं पा रहा हूँ। मैं यह नहीं समझ पा रहा हूँ कि मैं क्या करूं? केवल बीकॉम करके मैं अकाउंटेंट हो सकता हूँ, मगर मेरी मंजिल तो वह नहीं है। जिस एनजीओ में हूँ, वह ठीक ठाक पैसा देते हैं, मगर, कभी कभी मैं हैरानी में पड़ जाता हूँ! उनके कई रूप देखकर?”
मतलब?”
मतलब वह लोग अमेरिका को पूंजीवादी देश कहते हैं! कहते हैं कि अमेरिका का विरोध करना चाहिए। क्योंकि वह पूरे विश्व में आतंकवाद फैला रहा है। वह जानबूझकर मिडल ईस्ट को बदनाम कर रहा है। और वह जानबूझकर इस्लाम को बदनाम कर रहा है। वह वर्ल्ड ट्रेड टावर पर हमले का उदाहरण देते हैं। मगर कई अधिकारियों के बच्चे उसी अमेरिका में जाकर पढ़ रहे हैं और नौकरी भी कर रहे हैं। हम यहाँ पर अमेरिका के राष्ट्रपति के आने पर काला झंडा लहराते हैं, पुलिस की लाठी खाते हैं, और अपने खिलाफ एक दो मुक़दमे भी लाद लेते हैं, वहीं लोग जो हमें यह करने के लिए उकसाते हैं, उनके सभी के बच्चे उसी व्यवस्था में जाकर खप जाते हैं, जिसका उनके मातापिता विरोध करते हैं। वह जिस मशीनीकरण के खिलाफ यहाँ पर बातें करते हैं, उसी मशीनीकरण या कहें तकनीकों में अपने बच्चों की सफलता देखकर उसी तरह तालियाँ बजाते हैं, जैसे बंदरों को देखकर मदारी ताली बजवाता है। मैं यह देखकर हैरान हूँ! मेरे दिल में एक बेचैनी उठती है। यह बेचैनी बहुत तेज है! मैं छोटे छोटे टुकड़ों में बंट जाता हूँ।”
अंजली ने उसके माथे पर आए पसीने को पोंछ लिया। वह चाहती थी कि वह भी कहे कि हाँ साहित्य में भी ऐसे लोग हैं, जिनकी कथनी और करनी में तमाम अंतर है। मगर वह अभी बलदेव को सुनना चाहती थी। वह चाहती थी कि वह अपना दिल खोलकर एकदम रुई के फाहे की तरह हल्का हो जाए!
बलदेव अंजली की गोद में लेट गया। यही जगह उसे सबसे पसंद थी। उसे सहारा देती थी। उसे लगता था कि वह कहीं भी हारे, यहाँ जरूर जीतेगा। पर हर चीज़ हार और जीत से परे होती है। जैसे अंजली की यह गोद। अंजली की उँगलियाँ, जो उसके माथे पर गाहे बगाहे आ जाती हैं। अंजली के होंठ जो जब उसके होंठों से बाते करते हैं, तो ऐसा लगता है जैसे तार सप्तक बज उठा हो। जैसे साक्षात रति ही सामने आ गयी हो। बलदेव ने उसका हाथ कसकर पकड़ लिया। और छिपा लिया वह ख़त जो उसके बाबा ने भेजा था कि जमीन को जैसे भी हो छुड़ाना ही है।
बीकॉम होते ही बलदेव की नौकरी उसी एनजीओ में लग गयी थी, जिसके लिए वह वोलंटरी काम करता था। दिन दिन बार वह खातों में सिर खपाता और कमरे पर जाते ही उसका दिल होने लगता कि अंजली के पास चला जाए। खाते कुछ और कहते थे और उस एनजीओ का विजन और मिशन कुछ और, जो उन्हें दिया जाता था। क्या दो चीज़ों में इतना अंतर हो सकता है? क्या दो एकदम विपरीतार्थी हो सकते हैं?
अंजली का घर अब दो कमरों का फ़्लैट था। जो उसने अपने काम के सिलसिले में लिया था। कब और कैसे उनमें से एक कमरा बलदेव का हो गया, किसी को पता न चला। अंजली ने बाज़ार से जो काम उठाना शुरू किया था, उसे उसमें मज़ा आने लगा था, उसे वैसे ही लिखना पसंद था, इसने उसे एक नई दिशा दे दी। अम्मा बाबा को हर महीने पैसे भी भेजने शुरू कर दिए थे। टूर्स एंड ट्रेवल्स में डिप्लोमा के कारण उसे यह पता चल गया था कि बाज़ार को कैसी हिंदी पसंद है। यूट्यूब पर उसकी कविताओं का चैनल भी चल रहा था। कुल मिलाकर उसका काम धीरे धीरे अपनी रफ़्तार पकड़ रहा था।
बलदेव के साथ बैठकर उसकी शामें कट रही थीं। अब शामें रातों में बदल गयी थीं। बलदेव अब न ही अपने कमरे में सोने जाता और न ही अंजली के घर में दूसरे कमरे में। वह उसीकी रजाई में उसीके लम्हे चुरा लेता। इतना बुरा भी नहीं था सब कुछ! बहुत कोमलता से प्रेम करता था। आहिस्ता, आहिस्ता! जैसे वह केवल प्यार देना ही जानता हो। दिन भर जो वह मूल्यों के भटकाव में भटकता, रात में कोई भटकन नहीं, कोई उलझन नहीं थी। उसके लिए अंजली केवल एक शरीर नहीं थी, बल्कि वह उसकी आत्मा में छिपी वह कबूतरी थी जिसे वह हर कीमत पर बचाना चाहता था। इसलिए वह भरसक कोशिश करता कि अंजली को वह हमेशा सुख दे।
अम्मा का हर छ महीने पर आना बदस्तूर जारी था। जब फसलों का मौसम नहीं होता तो वह आ जातीं। तब अंजली का काम बढ़ जाता था। उसे बलदेव का वह पायजामा छिपाकर रखना पड़ता था, और उसके साथ ही सिगरेट के पैकेट भी, एशट्रे भी!
तुम्हें पता अंजली, इस बार हमारे ऑफिस वाले दीवाली पर क्या गिफ्ट दे रहे हैं हम लोगों को?”सितम्बर की एक रात बलदेव ने अंजली को जैसे नेपथ्य में झांकते हुए बताया
उहूं! नहीं तो! मैं तो कहीं नौकरी करती नहीं, तो मुझे क्या पता होगा कि दीवाली पर यह सब भी चलता है!”
न न, चलता है न! पूरा एक बजट में आइटम होता है! मैंने सजेस्ट किया था कि हमें गाँव में जो लोग कुछ स्पेशल सजावट के सामान बनाते हैं,उन्हें बल्क ऑर्डर देकर हम अपने हिसाब से बनवा सकते हैं और एक हिंदी की किताब दे सकते हैं। मगर जब मैंने यह सुझाव दिया तो सब हंसने लगे। और उन्होंने कहा कि “किसे गावों के सामानों में और हिंदी में इंटरेस्ट है। दुनिया पेट्रो-डॉलर से चलती है, बैलगाड़ी से नहीं। पेट्रो-डॉलर के जमाने में अगर हम बैलगाड़ी या तांगा के समय का गिफ्ट देंगे तो क्या होगा? हम इतने दोहरे क्यों हैं अजंली? अपनी जमीन, अपनी मिट्टी के लिए काम करने का दावा और अर्थव्यवस्था में योगदान बाहरी अर्थव्यवस्था को! गांधी जी के नाम पर आन्दोलन करते हैं और गांधी जी के उस सपने को एकदम भूल जाते हैं जो वह देखा करते थे। गांधी जी ने ही अपनी सभ्यता के बारे में कहा था कि जो सभ्यता हिन्दुस्तान ने दिखाई है, उसके आसपास दुनिया में कोई नहीं पहुँच सकता। जो बीज हमारे पुरखों ने बोए हैं, उनकी बराबरी कर सकें, ऐसी कोई चीज़ देखने में नहीं आई। रोम मिट्टी में मिल गया, ग्रीस का सिर्फ नाम ही रह गया, मिस्र की बादशाही चली गयी। मगर गिरा टूटा जैसा भी हो, हिन्दुस्तान आज भी अपनी बुनियाद में मजबूत है।”

तुम बहुत सोचते हो बल्लू! अगर तुम्हें ठीक नहीं लगता है तो तुम नौकरी बदल लो!” कहते हुए अंजली ने करवट ली!

क्या नौकरी बदलने से सब कुछ हो जाएगा? गांधी जी कहा करते थे कि हम पश्चिमी जाल में फंस गए हैं, और हमें उस जाल को तोडना है, अपनी चेतना को मजबूत करना है। मगर अंजली यहाँ पर तो हम अपनी मिट्टी की सेवा करने के लिए उसी जाल से पैसा लेते हैं, जिस जाल में फंसने के लिए गांधी जी ने मना किया था। मैं जितना सोचता जाता हूँ, मेरा सिर फटता जाता है। यह सब दोहरी दुनिया है। कहने के लिए गांधी जी, और करने के लिए? उनका सपना तोड़कर ऐसी किताब दीवाली पर गिफ्ट दे रहे हैं जिसमें अमीर कैसे बनें के तमाम तरीके सुझाए गए हैं। मुझे अमीर बनने से दिक्कत नहीं है, दिक्कत है कि जब ऐसी किताबें लिखने वाले हमारे यहाँ भी हिंदी भाषा में मौजूद हैं, तो उस लेखक की किताब क्यों खरीदना जो हमारी मिट्टी का नहीं है! अमीरी पश्चिम के हिसाब से अलग है, हमारे हिसाब से अलग! अगर हमें पश्चिमी विचार के हिसाब से ही अमीर होना है तो यह देशी लेबल की क्या जरूरत?”

अंजली उसके बालों में उंगली फिराती रहती। मगर वह बार बार उसके विचारों से सहमत होती हुई खुद पर गर्व करती कि उसका चयन गलत नहीं है। उसे ऐसी ही रीढ़ वाला प्रेमी चाहिए था। उसे ऐसे ही विचार रखने वाला प्रेमी चाहिए था। फिर हंसती, और सोचती कि क्या प्रेम में विचार मायने रखते हैं? हाँ, नहीं तो देह तो सभी की एक सी ही होती है।

दीवाली पर वह घर चलीगयी थी। अम्मा ने कई बार बुलाया था और फिर वह कई दिनों से गयी भी नहीं थी। काम इन दिनों उसके पास बहुत था और अब उसने अपना एक छोटा सा ऑफिस लेकर दो तीन लड़कियों की टीम भी बना ली थी। सभी ने एक हफ्ते की छुट्टियाँ ले ली थीं।

इस बार अम्मा ने उस पर शादी का काफी दबाव बनाया था। बनाती भी क्यों नहीं! अब तो वह शादी की उम्र की हो गयी थी। “देखो, अगर तुम्हें कोई पसंद है तो बता दो, नहीं तो हमारे हिसाब से कर लो!” बाबा ने उसके सामने शर्त रख दी थी। “बलदेव अच्छा लड़का है। अगर तुम उसके साथ शादी करने के लिए तैयार हो तो हमें दिक्कत नहीं है। अपनी ही जाति का है।” अम्मा ने उसका हाथ दबाते हुए कहा
हर रिश्ते में यह दबाव आना ही होता है। शादी तो करनी ही है। कब तक प्रोटेक्शन लेकर सारे काम होंगे। अब उसका काम भी ठीक ठाक चल ही रहा है, तो शादी भी कर ही लेनी चाहिए। बलदेव से बात करेगी इस बार वह!

मन में बहुत कुछ सपने लेकर वह घर से दिल्ली आई थी। बलदेव शाम को उससे मिलने आया। आते ही उसने उसके गले में बाहें डाल दीं, और होंठों को उसके होंठों के पास ले गया। वह देखना चाहता था कि इतने दिनों में क्या वही इस रिश्ते को नाम देने के लिए व्याकुल हुआ है या फिर अंजली ने भी कुछ सोचा है? अंजली सोच रही थी कि क्या शादी की बात वह आज ही करे या रुके? न जाने किस ऊहापोह में हवा दोनों के बीच आती थी। कुछ घड़ियों तक एक दूसरे के होंठों को इसी तरह देखने के बाद, अंजली ने अचानक से पूछा “चाय पियोगे?” शायद यह असहजता से बचने के लिए था या किसी और के लिए, वह समझ न पाई!
दोनों के बीच उतनी ही असहजता ने पैर पसार लिए थे जितनी असहजता बिखरे हुए क्षणों को समेटने में होती है। अंजली समझ नहीं पाई कि आखिर ऐसा क्यों हुआ है? उसकी बाहों से आज़ाद होते ही उसने देखा कि बलदेव के बाल आज कुछ ज्यादा ही तरतीब से हैं, उसकी देह से उसकी देहगंध नहीं बल्कि किसी और तरह की गंध है। वह तो किवड़ा की तरह महकता था, फिर आज? खैर उसने अपने दिमाग को झटक दिया। क्या क्या सोचती रहती है वह भी!

वह जल्दी से चाय बनाकर ले आई।

तुम जानती नहीं हो अंजली, इस बार मैंने तुम्हें कितना मिस किया?” अंजली कुर्सी पर बैठी तो वह उसके पैरों में बैठ गया। उसके पैरों को उसने अपनी गोदी में रख लिया और सहलाने लगा। ओह, यही स्पर्श! इस स्पर्श की आकांक्षा में तो वह चल सकती है अथक! अंजली ने अपनी आँखें बंद कर लीं, जैसे कि आँखें खोलने से सब कुछछूट जाएगा। यही रह जाएगा सब कुछ! जो कुछ क्षण पूर्व होंठों के बीच असहजता थी, उसे यह स्पर्श दूर कर रहा था। रात को बलदेव की तरफ से पार्टी थी और उसने पिज़्ज़ा मंगवाया था। अंजली को अजीब लगा क्योंकि उसे पिज़्ज़ा जरा भी पसंद नहीं था। कहता था कि हमारे देसी फ़ूड बिजनेस को यह सब नुकसान पहुंचा रहे हैं। खाने पीने से ही इंसान के विचारों का निर्माण होता है, और अगर खाएगा ही विदेशी, तो वह देश से कैसे प्यार कर पाएगा? मगर उसने ज्यादा सोचा नहीं क्योंकि अक्सर उसके ऑफिस में पिज़ा पार्टी होती ही रहती थी।
अगले दिन से वह काम में बिजी हो गयी क्योंकि प्रोजेक्ट्स आ रहे थे और वह अपनी टीम के साथ काम में बिजी हो गयी। कभी कभी उसे पूरी रात भी काम करना होता था। शादी की बात आज कल , आज कल में टलती जा रही थी। अब बलदेव का भी आना रात को थोडा कम हो रहा था। वह देखता कि अंजली बिजी है तो वह चाय पीकर ही चला जाता। कौन शादी की जल्दी थी अभी!
अंजली के माँ बाबा फोन करके पूछते तो वह काम सेटल होने की बात कहती।
बाबा, मैं आपकी बात समझती हूँ, पर मुझे अभी काम सेट करना है। इस कोम्पेटीशन के दौर में मुझे अपनी कम्पनी एक बार बना लेने दीजिए, मैं अगले ही दिन शादी कर लूंगी। और बलदेव से भी बात करती हूँ!”
उसे पता था कि अभी भी उसके पास इतने पैसे नहीं हो पाए हैं कि जमीन छुड़वा पाए। दो बहने और भी हैं। बाबा अब राशन की दुकान करे हुए हैं।
समय बीत रहा था और इस बीतते समय में वह देख रही थी कि बलदेव बदल रहा है। इतनी जल्दी तो लोग पार्टी नहीं बदलते, जितनी जल्दी वह बदल रहा था। उसकी शामें अब मॉल में बीतने लगी थीं। हौज ख़ास विलेज में बीतने लगी थीं। जब भी वह उसे फोन करती तो वह या तो खेल गाँव की तरफ जा रहा होता या फिर वह हौजखास विलेज की तरफ जा रहा होता ड्रिंक करने के लिए। “बियर तो अपने कमरे पर भी पी सकते हो,” वह मेसेज करती
उधर से कोई जबाव न आता,
अंजली का मन होता कि वह उसके साथ बैठकर गांधी जी की बातें करें, लोहिया जी की बातें करें, उसी तरह वह मार्क्स ने जो औरतों को आज़ादी की बात की कही थी वह बातें करे! वह बातें करे कि कैसे मार्क्स ने कहा था कि स्त्री श्रम करे, और व कहते थे कि अगर स्त्रियाँ घर से बाहर श्रम करेंगी तो वह नियंत्रक की स्थिति में आएंगी। उनपर नियंत्रण करना कठिन होगा और परिवार संस्था को भी सोचना होगा।
वह पहले की तरह ही बातें करना चाहती थी, फैज़ की, कबीर की, तुलसी की! सभी की!
वह चाहती थी कि दिल्ली की रूमानी शामों को वह उनकी बातों के साथ और पुराने साहित्यकारों के प्रेम को बांचें। वह चाहती थी कि वह इकबाल का अतिया फैजी के नाम लिखा गया खत पढ़े। वह इंग्लैण्ड के उस यात्री और इतिहासकार का अंतिम पत्र पढ़े जो उसने अपनी पत्नी एलिजाबेथ को भेजा था। उसे मौत की सजा इसलिए सुना दी गयी थी क्योंकि वह राजा के लिए सोने की खान खोजने में असफल रहा था।

अंजली को लगता कि कहीं वह भी तो बलदेव के लिए कुछ खोजने में असफल तो नहीं हुई है, जिसके कारण वह उसे इस तरह उपेक्षित मौत दे रहा है। फिर वह सिर झटक देती। मगर 31 दिसंबर की रात कुछ ऐसा हुआ जिसकी उसने उम्मीद नहीं की थी। बलदेव ऐसा करेगा उसने सोचा न था।

उस शाम वह बहुत दिनों के बाद उसके पास आया था। दीवाली से नए साल के बीच केवल दो ही महीने का तो अंतर था! यह दो महीने क्या सब कुछ उलट पुलट करने के लिए काफी थे। पिछले इतने वर्षों का साथ केवल इन दो महीनों में ही लड़खड़ा जाएगा? अंजली कई बार सोचती थी। मगर उसके पास शक करने का कोई कारण नहीं था। बलदेव के जीवन में उसके अलावा कोई लड़की नहीं थी, यह वह जानती थी। उसके सोशल मीडिया का पासवर्ड उसके पास था। वह मेसेंजर आदि देख सकती थी। मगर कुछ दिनों से वह देख रही थी कि बलदेव ने जो पेज लाइक किए थे, वह वैचारिक न होकर मार्केटिंग से जुड़े हुए थे। उनमें जर्मनी, अमेरिका आदि के कुछ प्रोडक्ट्स के पेज थे। वह पेज, जिनकी वह पहले आलोचना किया करता था। उसकी पोस्ट्स भी अब जीवन में कुछ बड़ा करना चाहिए जैसी हो गयी थीं।

अभी तक तो अंजली ने उन पर ध्यान नहीं दिया था। मगर इस बार जब वह आया तो उसकेहाथ में एक थैला था। उस थैले पर जो लिखा था उसे देखकर अंजली चौंक गयी! इतना महंगा ब्रान्ड? और वह भी केवल पजामे के लिए? उसे महंगे ब्रांड से कोई दिक्कत नहीं थी, मगर जब उसे लगता था कि यहीं के या फिर बांग्लादेश के गारमेंट हाउस में अधिकतर यह सारे कपडे बनते हैं और फिर वहां से यहाँ आकर उनके ब्रान्ड के साथ बिकते हैं, तो उसे ऐसे खर्च अजीब लगते थे। मगर उसने कुछ कहा नहीं! वह चाय बनाने लगी थी। आज ही दो बड़े प्रोजेक्ट्स का पैसा आया था, आज उसका मन था पार्टी करने का। उसने चाय खोलने रख दी। उतनी देर में बलदेव कपडे बदलने चला गया था।, ध्यान से! हाँ ओहम ही तो था? और यह तो बीस हज़ार से कम का होगा भी नहीं। उसने फटाफट से उसका फोटो लिया और गूगल इमेज में डाला। हाँ, ओहम का ही था और वह भी पच्चीस हज़ार का! मगर उसके पास इतने पैसे? और इतने पैसे केवल पर्स के लिए? इतने में वह अपने बाबा के लिए टूल किट ले सकता था और काम शुरू कर सकता था। यही तो उसका सपना था? फिर यह सब? अंजली की आँखों में जलन हो रही थी और उसके कानों में सन्नाटे के अलावा कुछ नहीं था। 31 दिसम्बर की रात वैसे ही इतनी ठंडी होती है कि सब कुछ जमा दे, मगर वह रिश्तों पर बर्फ जमा दे, यह उसने नहीं सोचा था!

तो, चाय ले आईं तुम? आज न जाने कितने समय बाद इस रजाई में बैठने का मौक़ा मिला है!” उसने रजाई में घुसते हुए कहा।
अरे यह तुमने देख लिया? बढ़िया है न!” बलदेव ने उसके हाथ से अपना वॉलेट लेते हुए पूछा
यह तुमने खरीदा?” जैसे बहुत मुश्किल से उसने शब्द उधार लेकर पूछा!
हाँ, क्यों? बढ़िया है न! सेल लगी थी, उसमें पंद्रह हज़ार का मिल गया! नहीं तो छबीस हजार का था।” उसने गर्वीली मुस्कान से कहा, जैसे बहुत कुछ पा लेने की उपलब्धि थी उसमें!
अंजली ने वह पन्ना छिपा दिया, जो उसके साथ पढ़ना चाहती थी। वाल्टर रेले ने मरने से पहले अपनी पत्नी के लिए पत्र लिखा था। वह पढ़ना चाहती थी और उसी चाहत को महसूस करते हुए वह शादी की बात करना चाहती थी। “मेरी सैलेरी भी बढ़ा दी गयी है। अब मुझे उस टीम का हिस्सा बनाया गया है, जो मार्केटिंग और पब्लिसिटी और उससे जुड़े काम देखती है अंजली! अब मैं खुश हूँ! तुम्हारे बाबा से भी हाथ मांग सकता हूँ। सब कुछ तो है मेरे पास अब, नौकरी है, ब्रांडेड कपडे और पर्स खरीदने लायक जेब है! बस अब तुम्हारे साथ चलूँगा और पूछ लूँगा तुम्हारे बाबा से कि “क्या आप अपनी बेटी का हाथ मेरे हाथ में देने के लिए तैयार हैं?”
वह बोलता जा रहा था और जब जब वह ब्रांडेड बोल रहा था तो उसका मन उसके पुराने बलदेव में घूम रहा था जो कहा करता था कि मैं अपने सामानों को एक ब्रांड बनाऊंगा! सब कुछ ऐसे कैसे बदल गया।
तुम्हें पता अंजली, कई बार मैंने सोचा कि मेरे भीतर बिखराव है। अपना देश देखूं कि खुद को अमीर करूं? बाबा की जमीन छुडाऊँ या फिर उनका काम चलवाऊँ? बाबा का काम चलने का कोई फायदा नहीं है, क्योंकि बाहर का इम्पोर्ट किया हुआ सामान बाबा के हाथ के सामान से ज्यादा सस्ता है, बाज़ार भरा पड़ा है उनसे! बाबा क्या बना पाएंगे? और मेरे भीतर की इच्छा क्या है? फिर मैंने वह किताब पढ़ी, हाँ वही, अमीर कैसे बनें! हा हा! और फिर मुझे ध्यान आया कि मुझे भी तो अमीर ही बनना है! मैंने अपने बॉस को देखा। देशी का प्रचार और विदेशी पैसे की भरमार! जो पहले मुझे दोगलापन लगता था मुझे वह प्रैक्टिकल बातें लगने लगीं। अब ज़िंदा रहने के लिए कुछ तो करना ही है! मैंने देखा कि लडकियों, मगर मैं हार गया। मैंने देखा कि गांधी थाली को लोग हजारों रूपए में बेच रहे हैं! गांधी अब ब्रांड हो गए हैं! फिर मुझे लगा कि मैं ही क्यों पीछे रहूँ? मुझे भी हक़ है अपनी डिजायर पूरी करने का। ग्रीड नहीं है मेरी। ग्रीड होती तो अभी तक तुम्हारी जगह ईवा हो सकती थी। मगर मेरी डिजायर है कि मुझे आनंद मिले, मुझे प्लेज़र मिले।”

इधर वह बोलता जा रहा था उधर वह संज्ञाशून्य होती सोच रही थी कि क्या यह वही है, जिसके साथ उसने प्यार किया था? उसके लिए क्या जरूरी था? पैसा अब बलदेव के पास बहुत था। उसे वह क्षण याद आ रहे थे जब वह काम से फ्री होकर बलदेव के मेसेज का इंतज़ार करती थी और जब उसे नहीं मिलता था तो फोन उससे कहता था “अभी भी कोई मेसेज नहीं है, तुम काम करो, जब आएगा तब मैं बता दूंगा!” मगर प्यार इतने सरल तरीके से मानने की बात होती है क्या? उसे कार्लाइल का पत्र याद आता जिसमें वह जेनवैल्श से कहता है “प्रियतमा पत्नी, अफ़सोस! लगभग एक सप्ताह से मुझे तुम्हारा पत्र नहीं मिला। आज सुबह मैं जर्मीन स्ट्रीट लभग दौड़ता दौड़ता गया, मुझे विश्वास था कि तुम्हारा पत्र मिलेगा। मैंने कह रखा था कि मेरा पत्र वहीं रोक लिया जाए! जिससे मैं उसे निश्चित समय से पहले पा लूं, मगर “तुम्हारा कोई पत्र नहीं कार्लाइल” ने मेरा स्वागत किया था।”
जब वह बलदेव का मेसेज नहीं पाती थी तो उसके दिल में वही पागलपन पैदा हो जाता था, मगर काम ने उसे डुबो लिया था खुद में! बलदेव ठीक है, यह उसे पता ही रहता था। मगर वह इतना बदल रहा है, कि उसने गांधी को ही ब्रांड बना दिया है, यह जानकार वह टूट गयी। उसने अपने पिता को टूलकिट लाकर देने के बजाय उनसे वह कला ही छीन ली और शहर लाकर बैठा दिया! टीवी के सामने! यह उसने पाप किया!
उसका दिल भीतर ही भीतर कांप रहा था। यह तो वह बलदेव नहीं था! मगर बाबा की नज़रों में यही बलदेव शानदार था, मिट्टी को सोना बनाकर बेचने वाला बलदेव? उसके लिए आदर्श था बलदेव! उसे नहीं पता कि कब देह ने उसके मन की बात नहीं सुनी और जैसे ही बलदेव ने उसके और खुद के बीच से दूरी मिटाई उसकी महीनों की प्यासी देह उसकी देह से जाकर मिल गयी! क्या देह और मन अलग अलग है? देह मन की बात नहीं सुनेगी? अपना रास्ता खुद तय करेगी? यह सब सोचते सोचते वह उन लम्हों से बाहर आने की कोशिश कर रही थी।
कम ऑन- बी अ स्पोर्ट यार!” यह सुनकर उसकी रही सही उम्मीद भी मारी गयी थी। प्यार स्पोर्ट नहीं होता! स्पोर्ट देह के साथ होता है, प्यार दिल से!
दरवाजा बंद होते ही वह वर्तमान में आ गयी। बलदेव चला गया था। चाय पीकर नहीं गया था। उसने जाते हुए कहा “मैंने अब चाय पीनी बंद कर दी है!”
नई और पुरानी आदतों के बीच क्या करना था यह तय अब अंजली को करना था। क्या उसे यह ब्रांडेड बलदेव चाहिए या फिर उसका बल्लू, जो अपने गाँव को ही ब्रांड बनाना चाहता था? वह भी तो काम कर रही है, उसके सामने क्या प्रलोभन नहीं आए, मगर बलदेव उसकी आत्मा रहा, वह डिजायर या ग्रीड नहीं बना! जबकि वह बलदेव के लिए अब केवल डिजायर रह गयी है। यह देह की डिजायर है, जो ईवा भी पूरी कर सकती है! उसका मन नहीं हुआ कि ईवा के बारे में ज्यादा जाने! अब उसका मन बलदेव से उचट रहा था। क्योंकि उसके विचार उचट रहे थे।
अम्मा कहती हैं कि लड़का बढ़िया कमाने वाला होना चाहिए, बाबा कहते हैं कि एब नहीं होने चाहिए। यह दोनों ही गुण अब बलदेव में है, मगर अब वह उसका बल्लू नहीं रहा है! वैचारिक विचलन वाला लड़का कहीं टिक सकता है क्या? क्या गारंटी है कि एक दिन वह डिजायर पुरानी हो जाए!
उसकी कुछ समझ नहीं आ रहा था। क्या करे? सिर दर्द के मारे फटता जा रहा था, मगर उसे जो भी फैसला करना था, शाम तक करना ही था, क्योंकि वह आज ही उसके बाबा से बात करने की जिद्द थामे बैठा था। क्या करे, इस छोटी सी बात के लिए इतने लम्बे समय के रिश्ते तोड़ का अंत कर दे? या फिर रुके? उससे शादी कर ले? बलदेव के घरवाले तो कब से तैयार हैं! वह बहुत ऊहापोह में थी।
आठ बजे से ग्यारह बज गया था। मगर वह रजाई से बाहर आने की हिम्मत नहीं जुटा सकी थी।
मगर हकीकत का सामना तो उसे करना ही था।
उसे तय करना था कि पेट्रो-डॉलर और आयातित ब्रांड के साथ ज़िन्दगी बितानी है या फिर खुद का ब्रांड बनाना है, कविता से भरा, विचारों से भरा! जहां अपनी मिट्टी की खुशबू हो! एनजीओ हो तो उसमें उसके बाबा की भी खुशबू हो, अम्मा के हाथों की बनी कैरी वाली अरहर दाल जैसी मीठी खटास हो!
उसने अनमने मन से अपना फोन उठा लिया। न जाने कितने मेसेज थे, मगर एक मेसेज पर उसकी निगाह टिक गयी! उसने उस मेसेज का जबाव “हाँ” में दिया और फिर फोन उठाकर बलदेव को मेसेज करने बैठ गयी
तुमने चाय पीना छोड़ दिया, मुझे अभी भी पसंद है। तुम्हें बीस हज़ार रूपए बाहरी बाज़ार पर खर्च करना पसंद आ गया हैं, मगर मैं अभी भी तुम्हारा दिया ही सपना देख रही हूँ। तुमने मुझे सपने दिए हैं, मैं चाहती हूँ कि अपनी ही मिट्टी का अपना ब्रांड हो! मैं तकनीक की विरोधी नहीं हूँ, मगर मैं बाहर की तकनीक से अपने देश के लिए काम करने का सपना अभी देखती हूँ। तुमने मुझे केवल डिजायर तक सीमित कर दिया है, जबकि तुम मेरी अभी भी आत्मा हो! और मैं अपनी आत्मा को डिजायर होते नहीं देख सकती। शाम को आने की जरूरत नहीं है। बहुत दिनों से गाँव गाँव की हस्तशिल्प की कहानियों को लाने के लिए एक प्रोजेक्ट पर बातचीत चल रही थी, आज फाइनल हो गया है। मैं उनके साथ जा रही हूँ। यहाँ पर मेरी टीम ऑफिस देखेगी। कब आऊँगी, पता नहीं, कब तुमसे बात करूंगी पता नहीं! ऐसा नहीं है कि मै तुमसे बात नहीं करना चाहती हूँ, मगर तुमसे बात करते ही मेरी देह में कुछ होने लगता है, फिर वह मेरे नियंत्रण में नहीं रहती। देह और विचार दो अलग हैं! देह अभी भी तुम्हें उतना ही चाहती है, क्योंकि तुम आत्मा हो। धीरे धीरे उसे समझ आएगा कि वह तुम्हारे लिए केवल डिजायर है और सम्हल जाएगी! अपना सोशल मीडिया का पासवर्ड अब तुम बदल लो, चाहो तो ईवा को दे दो! मेरे दिल में तुम्हारे अलावा कोई ख्याल तक नहीं आया और तुमने मुझे मजबूरी बनाकर ईवा का नाम ले लिया! मेरा जाना जरूरी है, गाँव मुझे बुला रहे हैं। मैं भी केवल एक बिजी एग्ज़ेक्युटिव की बीवी बनने के लिए दिल्ली नहीं आई थी और वह भी उसकी जिसकी रीढ़ न हो! बाय, फिलहाल के लिए!” और उसने मेसेज भेजकर सिम निकालकर फेंक दिया। दूसरा नंबर उसके पास कई दिनों से एक्टिव था।







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                                        रचनाकार परिचय 


सोनाली मिश्रा स्वतंत्र अनुवादक रूप से अनुवाद एवं लेखन कार्य करती हैं. 
वह जनगण के राष्ट्रपति, मूल्यों की पुनर्स्थापना सहित कई पुस्तकों का अनुवाद कर चुकी हैं. जन गण के राष्ट्रपति, भारत के पूर्व एवं सर्वाधिक लोकप्रिय राष्ट्रपति स्वर्गीय एपीजे अब्दुल कलाम आज़ाद के व्यक्तित्व पर लिखी गयी पुस्तक है.