राकेश बिहारी हिन्दी कथा और कथा आलोचना के एक स्थापित नाम हैं। कुछ सालों पहले मेराकी पर प्रकाशित उनकी एक कहानी 'परिधि के पार' बहुत चर्चा में रही थी। आज प्रस्तुत है उनके द्वारा रचित एक और कहानी 'फाँस'। मानसिक रोग और उससे जुड़े अतीत के पन्ने खोलती यह कहानी हमें स्तब्ध कर जाती है और अपने पीछे छोड़ जाती है कई अनुत्तरित प्रश्न। 

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उत्तरार्द्ध



सामने बैठे दो व्यक्ति, एक स्त्री और एक पुरुष बतिया रहे हैं आपस में...
"मिस्टर मोहंती की हालत में कोई नया बदलाव या सुधार...?
वह सैंडविच कुतरते हुए देख रहा है टुकुर-टुकुर, यह मिस्टर मोहंती कौन है? और यह औरत?
औरत देख रही है उसकी तरफ गहरी और उदास दृष्टि से...  " कोई खास नहीं।  हां सोने की अवधि में थोड़ी कमी जरूर आई है।  लेकिन पहचानते तो अब भी नहीं हैं वह...  डॉक्टर, मैंने यह नहीं चाहा था ...  सोचा भी नहीं था...  और आप...  आपने भी तो... "
डाक्टर कहे जानेवाले उस शख्स का हाथ उस औरत की हथेलियों पर है...  वह उठता है और उन दोनों की हथेलियों के ऊपर अपनी हथेली रखता हुआ एक खेल खेलता है...  "अटकन-चटकन दही चटाकन... "
वह औरत और रुंआसी हो उठती है और ढह पड़ती है सोफे की पीठ पर... "ऐसे नहीं चलेगा शिखा जी, हिम्मत रखनी होगी आपको।  धीरे-धीरे ठीक हो जायेगा सब कुछ... "
शिखा नाम कुछ चीन्हा है, कुछ अन्चीन्हा... वह बुदबुदाता है- शिखा... शिखा आशा भरी नजरों से देखती है उसकी ओर...  पर पहचान की कोई लकीर नहीं है उसकी आंखों में...  वह और ज्यादा उदास हो उठती है...
डॉक्टर और शिखा बैठे हैं बिलकुल पास-पास।  डाक्टर का दाहिना हाथ शिखा के कन्धों पर है। उसे लगता है जीभ लपलपाती कोई छिपकली शिखा के कन्धों पर आ बैठी है।  वह चुपके से उठता है, छुपता-छुपाता सोफे के पीछे-पीछे बढ़ता है और पेपरवेट उठा कर दे मारता है उस छिपकली पर...  डॉक्टर व शिखा की दुहरी चीख से बेपरवाह वह चला जाता है अपने कमरे की तरफ।  उसने तो जीभ लपलपाती छिपकली को मारा था। कोई चीखे तो उसे क्या...  
वह जाते-जाते सुन रहा है "यह एक अच्छा सिमटम है शिखा जी, वह आप पर अपना अधिकार नहीं भूल सके हैं अभी।  रिश्ते भी याद आ ही जायेंगे, धीरे-धीरे। थोड़ा वक्त दीजिये उन्हें... और हां, कुछ भी याद करने के लिये मजबूर नहीं करना है उन्हें... " डॉक्टर कहे जाने वाले व्यक्ति के चेहरे पर पछतावे के भाव हैं। "मैंने भी ऐसा कब सोचा था... मैने देखा था सोडियम पेन्टोथैल की मात्रा बिलकुल थोड़ी थी, लेकिन शेखर कुछ ज्यादा ही सेंसेटिव हैं।   सिगरेट-शराब कुछ भी तो नहीं लेते... जाने इस विंदु पर तब क्यों नहीं गौर किया... "
दोनों अब भी खड़े हैं एक दूसरे से बतियाते। वह उंगÍलयों से गमले की मिट्टी कुरेद रहा है...  
"लेकिन शेखर की इच्छाशक्ति इतनी कमजोर भी नहीं कही जा सकती... बहुत जल्दी और आसानी से नहीं खुले थे वह... मैं पहली बार किसी केस मे फेल हुआ हूं और वह भी इस तरह... "गमले मे हिलते पौधे के साथ डॉक्टर के स्वर भी हिल रहे हैं।
"मैं ही... मैं ही ज़िद पर अड़ गई थी, पता नहीं क्या सूझा था मुझे" औरत के स्वर मे सुबकियों जैसा कुछ है... " पढ़ा था मैंने कि दुनिया के कई देश बहुत पहले आजमा कर छोड़ चुके हैं इसे।  कि किसी व्यक्ति के अधिकार और स्वतंत्रता का हनन है यह, बर्बरता है, मानवाधिकार के खिलाफ है यह...  लेकिन तब तो मुझे इन्हें ठीक करने की पड़ी थी...  कानूनी प्रावधानों पर भी बहुत नहीं सोचा" 
कभी-कभी उसे लगता है वे उसके बारे में ही बात कर रहे हैं लेकिन क्या, समझ नहीं पाता।  पर हां, उसका रोना, उदास होना, पछताना सब अच्छा लगता है उसे...  बहुत-बहुत अच्छा।  लेकिन डॉक्टर कहा जाने वाला यह शख्स उसे बिलकुल भी अच्छा नहीं लगता, शिखा कही जानेवाली उस औरत के आस-पास मंडराता तो और भी नहीं, बिलकुल मिट्टी से निकले उस जोंक की तरह, जिसे दूर फेंका है उसने अभी-अभी।  
डॉक्टर कुछ बोल रहा है, वह सुनना चाह रहा है कि आखिर क्या कह दिया उसने कि इस शिखा की आंखें चमक उठी हैं अचानक... "हो सकता है यह सब एक स्वांग हो...  खुद  को अपने अतीत को दूसरों की आंखों मे नंगा न देख पाने लिए किया गया स्वांग।"
डॉक्टर के हाथ फिर शिखा के कन्धों पर हैं।  शिखा चुप है उसकी इस बात पर, धीरे से बरजती है वह उसका हाथ...  मन में एक आशंका उभरती है, कहीं यह सब इस डॉक्टर की सोची-समझी चाल तो नहीं है उसे हासिल करने की।  लेकिन प्रत्यक्षत: कहती है - "यह पता कैसे चलेगा?"
"यह जानना मुश्किल है थोड़ा। इसे आप ही जान सकती हैं सिर्फ... " शिखा कुछ नहीं कहती। डॉक्टर जा रहा है...  और वह उसे जाते देख रही है चुपचाप।   
उसे फिर गुस्सा आ रहा है, उसने एक कंकड़ फेका है डॉक्टर की तरफ।  लेकिन यह क्या, वह पत्थर तो शिखा को लग गया।  वह छुप जाना चाहता है गमले के पीछे।  
शिखा मुड़ी है क्रोध से... पर क्षण भर मे मुस्कुरा उठती है वह - "डॉक्टर का आना तुम्हें पसन्द नहीं न... ?"
वह चुप है
"उसका मुझसे बात करना भी?"
वह चेहरा घुमा लेता है।
"तुम केवल मेरे साथ रहना चाहते हो?"
वह आंखें नीचे कर लेता है।
"तुम मुझसे प्यार करते हो न, बोलो... ?"
वह फिर से कमरे की तरफ भागता है, लगभग दौड़ता हुआ...  


पूर्वार्द्ध

सामने बैठे व्यक्ति के चेहरे पर नर्म सी मुस्कुराहट फैली थी, मूँछों के नीचे और पीछे से छल-छल बहते जलप्रपात-सी। चेहरा गोरा, लंबोतरा, उलझे-उलझे से घुंघराले बाल आगे से उड़े-उड़े। शेखर ने सोचा वह बेकार ही जिद लिए बैठा था, वह मिल सकता था इस शख्स से, अकेले भी। शिखा और उसने जो इतनी लंबी-लंबी बहसें की, नाराज़ हुए एक दूसरे से, खाना-पीना छोड़ा सब बेकार...
उसके भीतर बसी जिद पिघलने लगी थी, नाराजगी घुलने लगी थी, अपनापा और प्यार पसरने लगा था गर्मी से पिघलते चाकलेट की तरह। क्या था इस चेहरे में ऐसा जो उनके शीतयुद्ध को सम पर ला रहा था। शायद उसकी हँसी, हाँ हँसी बिल्कुल पिता जैसी। ऐसी हँसी नहीं जो किसी पर हँसने के लिए हँसी गई हो, व्यंग्य बिल्कुल नहीं... स्नेह-सौहार्द से घुली-मिली... एक निर्मल और मुक्त हँसी।
हँसता हुआ चेहरा मेरी तरफ़ मुखातिब था। आवाज से, मन से... एकदम भीतर से निकली आवाज़...
‘‘गुड मार्निंग, मिस्टर शेखर मोहंती।’’
मैंने जवाब में बस हौले से सिर हिलाया था।
आप विप्रो इंडिया में सीनियर एक्जक्यूटिव हैं न?’’
मैं चौंक गया था, जैसे चोरी पकड़ ली गई हो मेरी। कुछ-कुछ सहम भी गया था मैं, इसे मेरे बारे में यह सब कैसे पता। मेरा सोचना शायद मेरे चेहरे तक छलक आया था।
‘‘चौंकिए मत मिस्टर मोहंती। आपकी पत्नी ने अप्वायंटमेंट लेते हुए फोन पर आपका परिचय दे दिया था मुझे। कुछ सोच रहे थे आप शायद। इतना मत सोचा करिए। इतना सोचना भी अच्छा नहीं होता सेहत के लिए।’’
मैं झेंप-सा गया था।
‘‘हाँ तो बताइए, आप अपनी परेशानियों के बारे में...  नहीं, परेशानी नहीं अपनी उन आदतों के बारे में जिनसे आपकी पत्नी परेशान होती हैं।’’
‘‘नहीं, ऐसा तो कुछ भी नहीं।’’
‘‘मिस्टर मोहंती, कुछ भी। कोई छोटी-सी भी बात...’’
‘‘छिपकलियाँ...  दीवार पर रेंगती, जीभ लपलपती, कीड़ों को पीछे से धर दबोचती, लिजलिजी छिपकलियाँ मुझे बहुत घिनौनी लगती हैं। मुझे उबकाई आती हैं उन्हें देखकर, और... ’’
‘‘और क्या मिस्टर मोहंती?’’
‘‘नहीं, जाने दीजिए... और कुछ भी नहीं...’’
‘‘और कुछ कैसे नहीं... दफ्तर से घर आते हैं थके-माँदे और डंडा लिए पड़ जाते हैं उन छिपकलियों के पीछे। शुरू-शुरू में तो मैं भी करती थी इनकी मदद। लेकिन अब तो... दीवार पर रेंगती छिपकलियां ही क्या घर से बाहर उस तरफ बेचारे मेढकों के पीछे भी पड़ जाते हैं ये...’’
शिखा, यानी मेरी पत्नी के बीच में इस तरह बोलने से शर्म और झिझक की पतली-सी झिल्ली पसर गई है मेरे चेहरे पर, जैसे कोई बच्चा चुराकर मिट्टी खाते पकड़ लिया गया हो।
‘‘हाँ, होती है मुझे इन चीज़ों से दिक्कत। मुझे बहुत सारी चीज़ों, दृष्यों से परेशानी है। उन सारे दृष्यों से जिसमें कोई ताकतवर अपने से कमजोर को अपना ग्रास बनाना चाहता है।’’
‘‘मैं समझ सकता हूं मिस्टर मोहंती। कई केसों में होता है ऐसा। और आप तो छात्र राजनीति से गहरे जुड़े थे कभी। शायद किसी पार्टी के होल टाइमर भी बनने वाले थे... ’’
मेरे चेहरे पर अब विस्मय नहीं, खरगोश जैसा चैकन्नापन है। क्या-क्या पता है इसे मेरे बारे में। शिखा ने क्या-क्या बात रखा है इसे। कहीं वह सब भी तो नहीं बता दिया उसने। चौकन्नेपन ने शायद कान भी खड़े कर दिए हैं मेरे। मैं सहज होने की कोशिश करते-करते भी शिखा को उलाहने भरी दृष्टि से देख ही लेता हूँ। शिखा के चेहरे पर उग आए असमंजस को नजरअंदाज़ कर रहा हूँ मैं... गलती है उसकी। जब मैं तैयार हो ही गया था यहाँ तक आने को तो फिर क्या ज़रूरत थी खुद उसे यह सब बताने की...  आखिर क्यों कर रही है वह ऐसा... क्या साबित करना चाहती है वह...
शायद डॉक्टर ने भी भाँप लिया है मेरी इस उधेड़बुन को... ‘‘देखिए, मैं पूछता रहा हूँ इनसे, आपके बारे में कुरेद-कुरेदकर। मुझे आपके व्यक्तित्व के बारे में ज़्यादा से ज़्यादा जानना अच्छा लगा, शायद इसलिए भी। आपका व्यक्तित्व निहायत ही खूबसूरत और दिलचस्प है। तमाम तरह के उतार-चढ़ाव समेटे हुए। मुझे आपसे दोस्ती करने की इच्छा हुई। कुछ लोग अपनी तरफ खींचते हैं, हठात्। आप में भी कुछ ऐसा ही है, खास होने जैसा कुछ।
शिखा जी ने तो बाद में मना ही कर दिया था मुझे कि आपको काउंसिलिंग की कोई जरूरत नहीं। पर मैं आपसे एक दोस्त की तरह मिलना चाहता था, किसी चिकित्सक की तरह नहीं। आपको तो खुद भी पता है आप रोगी नहीं है... क्यों, क्या मैं दोस्त बनने के काबिल नहीं?’’
मुझे उसकी हँसी के साथ अब उसकी बातें भी अच्छी लगने लगी है।
एक पितृविहीन गरीब लड़के से सीनियर एक्जक्यूटिव तक की वह यात्रा... एक लंबा दिलचस्प सफ़र... बीच के कितने पड़ाव, पहले गायक और फिर होलटाइमर बनने की चाह... कुछ नहीं, कुछ भी नहीं से इतना कुछ अर्जित करने की एक सहज और गतिशील यात्रा।
घोंघे की तरह मैं भी अपनी खोल से निकलने का उपक्रम करता हूँ, पर उतना ही, जितने में सुरक्षित-संरक्षित रह सके मेरा मैं।’’ बताने लायक जैसा कुछ भी नहीं है मेरे पास। लोगों की जीवन-यात्रा तो इससे भी दुरूह होती है, डॉक्टर... ’’
‘‘फिर भी कोई खास घटनाक्रम, कोई ऐसा दृश्य जिसने आपको परेशान किया हो देर तक?’’
‘‘शायद नहीं। छोटा होने के बावजूद पिता की मृत्यु को पूरी जिम्मेदारी और गंभीरता से लिया था मैंने। मुझे पता था कोई भी मर सकता है, कभी भी। मेरे आंसू तक नहीं निकले थे। जबकि पिता को बहुत प्यार करता था मैं। उनके लिए कोई भी क्षोभ, कोई आक्रोश नहीं था मेरे भीतर।’’ मैं बहुत धीरे-धीरे अपनी ज़िंदगी को खोल रहा था।
‘‘रोना अवसाद को धो देता है। लेकिन कई बार नहीं रोने के कारण अवसाद अपनी तहें बैठाता रहता है भीतर तक। तब शायद नहीं समझ पाते हम लेकिन उम्र के साथ धीरे-धीरे प्रकट होता है यह। कई रूपों में हमारे सामने आ सकता है यह- फ्रस्ट्रेशन, डिप्रेशन यहां तक कि नर्वस ब्रेक डाउन के रूप में भी।’’
शिखा की हथेलियाँ मेरी हथेलियों को भींच रही हैं। पसीने की बूँदें मेरे चेहरे से ज्यादा उसके चहरे पर छलछला आई हैं। मैं जानता हूँ उसकी यह हालत मेरी ही चिंता में हो रही है। लेकिन अचानक ही मैं अपनी हथेलियों को उसकी हथेलियों से मुक्त करना चाहता हूँ... और क्षण भर में झटक ही देता हूं उसका हाथ... यही सब सुनाना-समझाना चाहती थी वह मुझे... पल भर पहले उसके प्रति उमड़ा स्नेह पलक झपकते हीं कर्पूर की मानिंद हवा हो चलता है। आखि़र बार-बार वह क्यों जताना चाहती है कि मैं एबनार्मल हूँ...  अनायस ही बीते हुए कुछ माह हमारे बीच फेंस की तरह उग जाते हैं।
‘‘आपकी हरकतों से मुझे बार-बार शर्मिंदगी उठानी पड़ती है... मेरे भाई हँसते हैं मुझ पर... बहनें मुस्कराती हैं पीठ पीछे... डरती रहती हूं मैं कि पर्व-त्योहार, फंक्शन, पार्टी कब-कहाँ शुरू कर देंगे आप अपनी ऊल-जुलूल हरकत। अजीब होते जा रहे हैं आप, आफिस से आते ही छिपकलियों-मेढकों का शिकार और बिस्तर पर लाख मनुहार के बाद मुंह फेर लेना... किसी से कह भी नहीं सकती अपना दुख... लेकिन आपको क्या... आप तो डॉक्टर के यहाँ भी नहीं जा सकते। पता भी है आपको आपका बेटा आपके सामने पड़ने से कतराता है... इतनी पाबंदी... इतनी हिदायतें... चैकन्नापन...
पिछले कुछ महीने की किचकिच मुझे लगातार परेशान कर रही थी... मैं वहाँ होकर भी नहीं था... कि तभी मुझे लगा शिखा कुछ बोल रही है।
‘‘डॉक्टर साहब एक और खास बात है इनके बारे में।’’
‘‘हाँ-हाँ, जरूर बताइए। आपका सपोर्ट बहुत जरूरी है मेरे लिए। मिस्टर मोहंती ने तो वैसे भी अब तक कुछ खास बताया नहीं है। शायद कुछ खास बता भी न पाएँ।’’
‘‘बस एक बात। हमारी एक बेटी है-साक्षी। बारह साल की और फिर एक बेटा। बड़ी अजीब सी बात है, इन्हें साक्षी को लेकर कोई चिंता-फिक्र नहीं है। न उसकी पढ़ाई-लिखाई को लेकर न उसके भविष्य के लिए। उसे पूरी आज़ादी दे रखी हैं जो मन हो करे, जहां चाहे जाए। जैसे मन हो कपड़े पहने। लेकिन आदित्य यानी बेटे के पीछे हाथ धो कर पड़े रहते हैं ये। पल-पल का हिसाब माँगते हैं उससे... कितनी देर तक कहाँ थे, लंच आवर में क्या किया... पिकनिक, क्लास-टूर तो दूर की बात है, दोस्तों के जन्मदिन तक पर जाना अलाउ नहीं करते उसे और चाहते हैं कि वह दिन-रात मैथ्स और सिर्फ मैथ्स पढ़ता रहे। मैथ्स की एक छोटी सी भूल के लिए भी कड़ी से कड़ी सजा दे देते हैं उसे...
मेरा चेहरा लाल हुआ जा रहा है... यह भी कोई कहने की बात है... अपने बच्चे की परवाह करना भी दोष हो गया मेरा... काश मैं अदृश्य हो सकता... डॉक्टर की तीखी निगाहों का सामना तो नहीं करना पड़ता... कुछ घंटे पहले जिसकी हँसी खींच रही थी मुझे अब उसकी आँखें अजीब लगने लगी हैं... जैसे खँगाल लेगा वह मुझे भीतर तक, सिर्फ देखकर ही... और यह सब हो रहा है इस शिखा की जिद के करण... लेकिन तभी...
‘‘बेटे के भविष्य की चिंता लाजिमी है, मिसेज मोहंती। सारी दुनिया बेटों में अपना भविष्य, अपना अक्स तलाशती है। शेखर अगर ऐसा कर रहे हैं तो इसमें असामान्य कुछ भी नहीं।’ उसने पहली बार मुझे मेरे फर्स्ट नेम से बुलाया है। मैं समझ नहीं पा रहा वह किसकी तरफ़ है... मेरी या फिर शिखा की तरफ...
‘‘शेखर, क्या आप अपने बेटे को इंजीनियर बनाना चाहते हैं?’’
‘‘नहीं...’’
‘‘वैज्ञानिक?’’
‘‘नहीं... वह क्या बनना चाहता है, यह उसका निर्णय होगा मेरा नहीं।’’ मैंने अपनी आवाज़ को शांत-संयत किया है। आखिर क्या चाहता है वो मुझसे...  कौन-सी ऐसी बात जो उसके अनुसार, उसे मेरी समस्या के तह तक पहुंचा सकती है। उसे लग रहा है कुछ छुपा रहा हूँ मैं। लेकिन मेरे पास है ही क्या जो छिपाता फिरूँ... मैं चुपके से अपने भीतर उतरता हूँ... भीतर के गंदे पानी को उलीचते खुद को तलाशते... और भीतर... लेकिन यहां तो सिर्फ काला घना अंधकार है... मैं आँखें फाड़-फाड़कर तलाशता हूँ... पर सिवाय उस अंधेरे के मुझे कुछ नहीं दीखता... कितनी तो कोशिश की है मैंने खुद भी लेकिन एक अनाम सी बेचैनी... एक अजीब-सी उलझन लिपट जाती है मुझसे... नहीं खोज सकता मैं और कुछ... नहीं उतर सकता मैं इससे भीतर... दूर तक फैला यह अंधकार अकेला कर देता है मुझे और मैं अकेला नहीं होना चाहता।
‘‘शेखर साहब, क्या सोच रहे थे आप? कुछ याद आया खास?’
‘‘नहीं, सिवाय इसके कि अकेलेपन से डरता हूँ मैं। आज से नहीं, बचपन से। जबकि भीड़ भी मुझे पसंद नहीं। हाँ अपनों का साथ मुझे हमेशा चाहिए।’’
‘‘सोचिए आराम से। अपने बचपन, अपनी गरीबी को लेकर कोई गिल्ट?’’
‘‘नहीं बिल्कुल भी नहीं।’’
मुझे खुशी होती है, पेशे और चेहरे की स्निग्धता के खिलाफ शिकन की कुछ रेखाएँ उभर रही हैं उसके चेहरे पर, कुछ नहीं खोज पाने की शिकन... एक गैर मामूली सी खुशी तैरती है मेरे भीतर- मैं नार्मल हूँ, पूरी तरह नार्मल।
‘‘मैं शिखा जी से कुछ पूछूँ? कोई ऐतराज?’’
‘‘नहीं। लेकिन जहां तक मुझे लगता है जितना मुझे मेरे बारे में पता है उतना ही शिखा को। और शिखा तो सब आपको पहले ही बता चुकी है।’’
‘‘हो सकता है आप सही हों। मैं भी यही चाहता हूं। लकिन फिर भी... ’’
‘‘मिसेज मोहंती, आपने बताया की आपकी शादी के तेरह साल हो चुके। पहले भी कभी शेखर बाबू में कुछ ऐसा लगा जो...’’
‘‘नहीं, कभी नहीं। वो तो छह-सात महीने पहले की बात है, ये आदित्य का ऐडमिशन छठी क्लास में करवा कर आए थे, दफ्तर से छुट्टी ले रखी थी...  और उसी दिन पहली बार छिपकलियों पर टूट पड़े थे। तब मुझे कहाँ पता था कि... ’’
डाक्टर से मुलाकातों का सिलसिला लगातार चल रहा है। अब तो एक साल पूरा हो गया है यहाँ आते हुए...  लेकिन यह शिखा मानती ही नहीं... हर बार फालतू के सवाल...  डाक्टर बेवकूफ बना रहा है और वह कि पैसे फूँके जा रही है...
‘‘मिसेज मोहंती, अब तक की बातों से मुझे कोई पक्का सूत्र नहीं मिला है लेकिन पता नहीं क्यों मुझे इसका संबंध किसी न किसी घटना से जुड़ा लगता है जिसके बारे में मिस्टर मोहंती बता नहीं रहे। हो सकता है उन्हें याद भी न हो। कई बार ऐसा देखा गया है कि हमारे भीतर कुछ ऐसी बातें दबी होती हैं जिसका पता हमें खुद भी नहीं होता। उन्हें जबरन धकेल देते हैं हम विस्मृति की कंदराओं में, बाहर कोई बड़ा पत्थर रखकर। वह मेरे जीवन की घटना नहीं, इसे भूल जाना है मुझे... और आश्चर्य कि कई बार हो भी जाता है ऐसा। पूरी ज़िंदगी बीत जाती है विस्मृति में। कई बार कोई छोटी घटना भी, जिसका साम्य हो उस विस्मृत घटना से, परेशान करती है हमें बार-बार। यह कुलबुलाहट दरअसल उसे उजागर करने की ही चाह होती है लेकिन विस्मृति का पत्थर दबाए रहता है उसे जिसकी परिणति असामान्य हरकतों में होती है।’’
‘‘लेकिन उसका पता कैसे चल सकता है? कोई उपाय? कोई थेरैपी?’’
मुझे फिर से क्रोध आ रहा है इस डॉक्टर पर और उससे भी ज्यादा शिखा पर... ये दोनों मुझे पागल साबित करके ही मानेंगे। मैं चाहता हूँ भाग जाऊँ यहाँ से। लेकिन ऐसा करना उनके संशय को और मजबूत ही करेगा। एक बार फिर पसीने से भर आई हथेलियों को मसलता हुआ क्रोध पीकर रह जाता हूँ मैं।
‘‘तरीका है, इसका, पर गारंटी नहीं। लेकिन प्रयोग किया जा सकता है।
‘‘कौन-सा तरीका?’’ मैं अब झुँझला उठता हूँ।
‘‘दवा के प्रभाव में आपके अवचेतन की तलाश।’’
मैं कुछ बोलूँ इससे पहले शिखा चौंक पड़ती है- ‘‘कहीं आप नार्को अनालिसिस की बात तो नहीं कर रहे हैं?’’
‘‘आप ठीक समझ रही हैं।’’
तो अब मैं इसे पागल के बाद अपराधी भी लगने लगा। मैं अब उन दोनों के बीच कुछ नहीं बोलना चाहता। देखूँ यह शिखा क्या-क्या करवाती है मुझे एबनॉर्मल  साबित करने के लिए।
‘‘लेकिन यह परीक्षण तो खूँखार अपराधियों से गुनाह कबूल करवाने के लिए होता है।’’
‘‘आप फिल्मों, समाचारों की बात कर रही हैं। मैं एक साइकेट्रिस्ट की हैसियत से बोल रहा हूँ। और फिर अपराधी भी तो मनोरोगी ही होता है। वैसे मैंने तो उपाय भर बताया है। निर्णय तो आपका होगा।’’
‘‘डॉक्टर इसका कोई साइड इफेक्ट! शेखर ठीक तो हो जाएंगे न?’’ नहीं कोई साइड इफेक्ट नहीं है इसका। लेकिन मैंने पहले ही कहा है कोई गारंटी नहीं है ठीक होने की।’’
और हां, शेखर बाबू आइ एम सारी। मैंने आपको बहुत परेशान किया। यूं तो डॉक्टर के लिए हर केस महत्वपूर्ण होता है लेकिन यकीन मानिए, मेरे लिए यह महज एक केस नहीं है। आप अब हमारे दोस्त हैं। आप ऐसा मत सोचिए कि यह परीक्षण आपको एबनार्मल साबित करने के लिए है। दरअसल सबकुछ ठीक रहा तो इससे ही यही साबित होगा कि आप नार्मल थे, नार्मल हैं।’’
डॉक्टर हमें छोड़ने खुद कार पार्किंग तक आया है।’’ मिसेज मोहंती आपलोगों का जो भी निर्णय हो, बताइएगा ज़रूर। यह दोस्ती जारी रहेगी।’’
मुझसे ज्यादा शिखा परेशान है। लेकिन मैं जानता हूँ वह मानेगी नहीं। उसे अपनी जिद के आगे कुछ भी नहीं सूझता। डर तो मुझे भी लग रहा है लेकिन... इतना जानता हूं वह मुझे सचमुच प्यार करती है... पता नहीं क्यूं मैं चाहकर भी उस पर गुस्सा नहीं कर पा रहा। अचानक ही मेरे भीतर यह शांति कहाँ से आ गई है। कहीं मेरे इस तोष की वजह उसकी बेचैनी तो नहीं है...  मैं करवटें बदल रहा हूँ। वह इंटरनेट खंगाल रही है...  बार-बार गुगल इंजन सर्च कर रही है। बीसियों पोर्टल के लिंक चेक कर चुकी है वह। वह अपनी तरफ से पूरी तसल्ली कर लेना चाहती है। नार्को अनालिसिस क्या है? कैसे किया जाता है? इसके साइड इफेक्ट्स क्या हैं? वह जितने पन्ने पढ़ती हैं उसकी बेचैनी और बढ़ती जाती है। बीच-बीच में एक संतोष भी छलकता है उसके चेहरे पर और अब जब उसने इंटरनेट से लॉग आउट किया है उसकी आंखों में नींद की जगह निर्णय के निशान हैं।  वह जानती है कि जो भी चिकचिक होनी थी पहले हो चुकी है जब एक बार मैंने डॉक्टर से मिलने को हाँ कह दिया तो पीछे नहीं हटूँगा।
शिखा रास्ते भर मेरा हाथ अपने हाथों में लिए है। हम चुप हैं। लेकिन हमारी चुप्पी बतिया रही है आपस में बहुत कुछ... मुझसे नाराज हो?... नहीं खुद से... मैं जानती हूं तुम बिल्कुल नॉर्मल हो... लेकिन वो छोटी-छोटी बातें... वो रातों को तुम्हारी बेरूखी... वह आदित्य का रोज सहमते जाना... लेकिन तुम कहो तो हम अभी भी... मैं उसके होठों पर अपनी उंगलियां रख देता हूँ...
आज डॉक्टर ने हमें लेबोरेट्री में बुलाया है। आज वह अकेले नहीं है, उसके साथ एनैस्थीसीया एक्सपर्ट भी है और एक ट्रेंड नर्स भी। सबने हरा एप्रन, टोपी और मास्क पहन रखा है। हमारी कल्पना की लैबोरेट्री से ज्यादा आपरेशन थिएटर का दृश्य लग रहा है यह। शिखा भी मेरे साथ रहना चाहती है लेकिन डॉक्टर मना करता है। शिखा डॉक्टर को हिदायत दे रही है, ‘‘डॉक्टर, सोडियम पेन्टोथैल की मात्रा का ध्यान रखिएगा। मैंने रात इंटरनेट पर पढ़ा है कि उसकी थोड़ी-सी ज्यादा मात्रा सबकुछ तबाह कर सकती है। यदि ऐसा कुछ हुआ तो... ’’ उसकी आंखें छलछला आई हैं। ‘‘आप निश्चिंत रहिए मिसेज मोहंती, मैंने एक्सपर्ट को बुला लिया है, कुछ भी नहीं होगा शेखर बाबू को।’’
उदास शिखा मेरा हाथ थाम लेती है, ‘‘बेस्ट ऑफ लक। मैं बाहर ही खड़ी हूं।’’
नर्स ने मुझे बेड तक पहुंचा दिया है। अब वह दूसरे डॉक्टर की मदद कर रही है। हमारा डॉक्टर सिरहाने सामने की कुर्सी पर बैठा है। यह क्या, वो दूसरा वाला डॉक्टर मेरी तरफ झुका आ रहा है। उसके चेहरे की मासूमियत कहीं बिला गई है। उसकी आंखों का रंग बहुत पहचाना सा लगता हैं। मैं पूरी ताकत से उसे परे धकेल देता हूं। वह गिरते-गिरते बचा है।
‘‘क्या हुआ आपको, मैं तो बस इंजेक्शन के लिए वेन तलाश रहा था।’
‘‘नहीं, कुछ नहीं हुआ। मेरा दम घुट रहा है। घबराहट हो रही है। मैं अकेले नहीं रह सकता यहाँ... डर लग रहा है मुझे। डॉक्टर प्लीज शिखा को बुला दीजिए।’’
‘‘मैं अभी मिसेज मोहंती को बुलवाता हूँ वह रहेंगी आपके पास।’’
शिखा के हाथों में मेरे हाथ हैं, सांत्वना भरे हाथ। मैं डरता क्यों हूँ... छिपाने लायक क्या है ही मेरे भीतर... मैं क्यों घबराऊं... अंधेरा धीरे-धीरे घेरने लगा है मुझे... चारों तरफ अंधेरे का सागर उग आया है... लेकिन शिखा की उँगलियां ले जाएँगी मुझे इसके पार... सबकुछ तैरने लगे हैं... कुर्सी, टेबल, डॉक्टर, नर्स, शिखा... मैं तैर नहीं पा रहा।
यह क्या डॉक्टर ने क्या इशारा किया है... शिखा भी धीरे-धीरे दूर जा रही है मुझसे। अब डॉक्टर भी नहीं दिख रहा... मैं फिर अकेला...

उसके चेहरे पर पहले दिन की तरह मुस्कान है। पता नहीं अब क्या चाहता है वह? मैं या शिखा कुछ पूछें उसके पहले ही वह बोल उठता है-
‘‘मिसेज मोहंती, लगता है हम सही रास्ते पर चल रहे हैं। डिप्रेशन की दवा से मिस्टर मोहंती का कुछ नहीं होने वाला। हमने इस पर काफी सोचा है और इस निर्णय पर पहुंचे हैं कि क्यों न उस दिन की रिकार्डिंग आप दोनों को इकट्ठे दिखाऊं। शेखर बाबू की समस्याओं का रास्ता यहीं से निकले, शायद।’’
फिर वही अंधेरा कमरा, हम सब बैठे हैं... धड़कते दिल लिए। पता नहीं उस दिन क्या कहा था मैंने। मैं एक बार फिर पसीने से तर-ब-तर हो रहा हूं। और तभी सामने स्क्रीन पर वही दृश्य उभरते हैं। मैं, दोनों डॉक्टर, नर्स और एक मद्धम सी तांबई रोशनी। नर्स मेरे मुंह से निकल आए झाग को साफ करती है और फिर डॉक्टर का स्वर गूंजता है...
‘‘याद कीजिए मिस्टर मोहंती, अपने बचपन की कोई बात, जिसने आपको बहुत तकलीफ पहुंचाई हो। कोई घटना... कोई व्यक्ति...’’
प्रत्युत्तर में मेरे अस्फुट से जो स्वर निकल रहे हैं वे औरों के लिए भले ही ध्वनि मात्र हों पर मेरे आगे तो जैसे दृश्यों के जंगल उग आए हैं। सब कुछ एक बार फिर से घटित हो रहा है मेरे आगे... मैं शर्मिंदा हूं, छुप जाना चाहता हूं किसी दूसरे अंधरे में... इस कमरे का अंधेरा तो जैसा मुझे और अनावृत कर रहा है...
मैं छठी क्लास में हूँ। उम्र है कोई नौ साल। माँ चाहती हैं मैं खूब पढूँ, बड़ा आदमी बनूँ। मैं चाहता हूँ गायक बनूँ, पिता भी यही चाहते थे। लेकिन अब पिता नहीं रहे सिर्फ़ माँ हैं, और उनके सपने भी। माँ ने गांव के नामी शिक्षक रामसेवक बाबू से बात कर ली है। मैंने वहीं सैनिक स्कूल, नेतरहाट और इसी तरह की कई अन्य प्रतियोगिता परीक्षाओं की तैयारी के लिए पढ़ना शुरू कर दिया है।
रामसेवक बाबू अपनी अनुशसनप्रियता और कठोर सजा के लिए पूरे गांव में जाने जाते हैं।
‘‘तुम्हारे सामने दो सजायें हैं, तुम्हारी मर्जी जो चुन लो। पांच सौ बार कान-पकड़कर उठक-बैठक या फिर पढ़ाई खत्म होने के बाद चक्रवृद्धि व्याज के दसों प्रश्न हल करके ही घर जाओ’’ मैंने दूसरे विकल्प के लिए हामी भर दी है। साथ के सारे बच्चे अपनी-अपनी किताबें और लालटेन लेकर घर जा रहें हैं... मुझे अंधेरी रात में अकेले लौटने का डर अभी से सताने लगता है।
‘‘तो तुम सवाल बनाओ, मैं खाना खाकर आता हूँ।’’
रामसेवक बाबू जब तक लौटे मैं पांच प्रश्न हल कर चुका हूँ।
‘‘बन गए सारे सवाल?’’
‘‘अभी तक पांच ही बने हैं।’’
‘‘लाओ देखूँ कितने ठीक हैं।’’
‘‘चलो ये तो ठीक हैं। अब जाओ काफी देर हो गई है। कल पूरा बना कर लाना।’’ 
‘‘तुम अभी तक गए नहीं?’’ रामसेवक बाबू के हाथ-पैर धोकर आने तक मैं वहीं खड़ा हूँ।
‘‘अकेले डर लग रहा है। पंकज कह रहा था कि जंगली माई के पास भूत रहता है।’’
‘‘चलो, उठाओ लालटेन तुम्हें सड़क तक छोड़ दूँ।’’
दूसरे दिन मैं सारे प्रश्न हल करके लाता हूं। रामसेवक बाबू गणित में और मेहनत करने की बात करते हुए मेरी कॉपी पर गुड लिख देते हैं। ‘‘तुम चाहो तो सुबह जल्दी जा आया करो। मैं तुम्हें अलग से गणित पढ़ा दूँगा।’’
अब मैंने गणित का अभ्यास और तेज कर दिया है। रामसेवक बाबू अब मुझे पहले से ज्यादा मानने लगे हैं। ट्यूशन में कोई पाठ पढ़ाते वक़्त बच्चों की झुंड में मैं अब बिल्कुल उनके पास खड़ा होता हूँ। अब मैं उनका सर्वप्रिय छात्र हूँ और कुछ लड़के मुझसे जलने भी लगे हैं।
जाड़े के दिन हैं। सुबह अंधेरा देर तक पसरा रहता है। लेकिन मुझे क्या जैसे रात वैसे भोर। मैंने सूरज उगने से पहले ही गणित पढ़ने जाने का क्रम नहीं तोड़ा है।
‘‘आज कुछ तबीयत ठीक नहीं लग रही। पूरा बदन टूट रहा है। सारी रात बुखार था। तुम बगलवाली चौकी पर खुद ही कुछ अभ्यास करो। मैं थोड़ी देर और सो लेता हूं।’’ दरवाज़ा खोलने के बाद आज पहली बार रामसेवक बाबू रजाई में घुस गए हैं।
मैं किताब के पन्ने पलट रहा हूं। उधर रामसेवक बाबू करवट बदलते हुए कराह रहे हैं।
‘‘सर तबीयत ज्यादा खराब है? पैर दबा दूँ?’’
‘‘अरे नहीं बस यूँ ही।’’ मैं उनके पैर दबा रहा हूँ।
‘‘अरे तुम तो बहुत अच्छा पैर दबाते हो। कहाँ से सीखा इतना अच्छा पैर दबाना।’’
‘‘सर, इसमें सीखना क्या है? घर में दादाजी के पैर दबाता हूं। कभी-कभी माँ के भी।’’
‘‘नीचे का दर्द खत्म हो गया अब जरा जांघ भी दबा दो ऐसे ही। रामसेवक बाबू पीठ के बल लेट गए हैं। और मैं गुरू सेवा में तल्लीन हूँ। उन्होंने खुद ही मेरा हाथ और ऊपर तक खींच लिया है- ‘‘जरा इधर भी’’ मैं सकपका जाता हूँ, रामसेवक बाबू ने जांघिया नहीं पहना है। ‘‘वैसे ही दबाना जैसे नीचे दबा रहे थे... पूरा दर्द निकल गया बस इतना ही बचा है।’’ और थोड़ी ही देर में मेरा हाथ गीला हो जाता है। मुझे घिन-सी हो आती है।  ‘‘छोड़ दो अब। बहुत सेवा की तुमने। अब शायद नींद भी आ जाए। ’’
पूरे दिन एक घिन-सा चिपका रहता है मेरे हाथों में। बार-बार हाथ धोता हूँ पर लगता है जैसे कुछ गीला, लिजलिजा सा मेरी हथेलियों में चिपका हुआ है। उन हाथों से खाने का भी मन नहीं हो रहा। मैं माँ से कहता हूँ माँ मुझे अपने हाथों से खिला दो।’’ माँ मुस्कुराती हुई मुझे कौर-कौर खिला रही हैं। इतना बड़ा हो गया पर बच्चों जैसी लाड़।
इस बार मंथली टेस्ट में मुझे सौ में सौ अंक आए है। और मेरा ऊहापोह भी कमा है कुछ। कितनी खुश हैं माँ। धीरे-धीरे फिर सब कुछ पूर्ववत होने लगता है। मैं भूलने लगा हूँ उस दिन को, उस दिन की घटना को। मुझे लगता है, अब मुझे गणित के अतिरिक्त ट्यूशन की जरूरत नहीं।
जब से रामसेवक बाबू ने नौकरी कर ली है, सुबह के बैच में उन्हें जल्दी रहती है। इन्हीं दो घंटों के बीच थोड़ा वक्त निकालकर वे नहा लेते हैं। बगल वाले का मकान आजकल खाली ही है। उन्होने चाभी रामसेवक बाबू को ही दे रखी है सो वे नहाने अक्सर वहीं जाते हैं। सर के नहाने के लिए चापाकल चलाने के लिए बच्चों में होड़-सी रहती है। एक तरफ पढ़ाई से कुछ देर की छुट्टी और दूसरी तरफ सर के कृपापात्र होने का सुख। और आज तो उन्होंने मुझे खुद ही चलने को कहा था।
‘‘बहुत देर तक कल चलाना पड़ा न, हाथ दुख गए होंगे और खड़े-खड़े पैर भी। आओ आज तुम्हारी देह मैं दबा देता हूँ।’’ मेरे ना-ना कहने के बावजूद रामसेवक बाबू मुझे जबरदस्ती बिस्तर पर लिटाकर मेरे पैर दबाने लगते हैं।
‘‘सर, यह क्या कर रहे हैं आप? आप शिक्षक हैं मेरे। मुझे जाने दीजिए। अभी स्कूल का सबक तो बचा ही हुआ है। लेकिन वे नहीं मान रहे। उनका यह अप्रत्याशित व्यवहार परेशान कर रहा है मुझे। मेरा पैर दबाते-दबाते जैसे वे लेट ही गए हैं मेरे ऊपर। मैं कोशिश करता हूँ पर उनके भारी वजन से मुक्त नहीं हो पा रहा। अचानक उन्होंने मेरी हाफ पैंट नीचे कर दी है और मैं एक बेइंतहा दर्द से कराह उठा हूँ। मैं भाग नहीं पा रहा उनके चंगुल से। मेरी चीख जैसे दरवाजों से लड़कर लौट-लौट आ रही है।
मैं स्कूल नहीं जाता हूँ। कुएँ पर बैठा रो रहा हूँ। सारा दिन। दर्द रिस-रिसकर बह रहा है। सोचता हूँ माँ से कह दूँ यह सब, लेकिन कैसे, शब्द नहीं समझ में आ रहे...
मैंने ट्यूशन जाना छोड़ दिया है। हाँ सुबह-शाम घर से निकलता जरूर हूँ पर बैठा रहता हूँ जाकर उसी कुएँ पर जहाँ अब लोग पानी भरने नहीं आते... कुँआ सूखा तो नहीं है लकिन कभी साफ नहीं होता और उसमें झाँको तो मेढकों को लपकते साँप दिखाई पड़ते हैं।
‘‘रामसेवक बाबू आए थे। कह रहे थे तुम आजकल पढ़ने नहीं जा रहे।’’
‘‘माँ मेरी तैयारी हो गई है। अब फालतू पैसे देने से क्या फायदा। अब तो सिर्फ परीक्षाएँ ही शेष हैं, मैं अभ्यास घर पर ही कर लूँगा।’’ माँ खुश हैं, पिता की अनुपस्थिति में बेटा जल्दी बड़ा हो गया है इसे फालतू खर्च की समझ भी हो गई है, अब से ही।
मेरा चयन नेतरहाट स्कूल में हो गया है। अब मुझे गांव छोड़ना होगा। लेकिन स्मृतियाँ अब भी मेरे पीछे पड़ी हैं। जाने से पहले एक बार फिर मैं उसी कुएँ पर हूँ, उदास और भारी मन। अब गावँ छोड़ना होगा, माँ को भी। मैं कुएँ में ईंट-पत्थर का एक-एक टुकड़ा फेंक रहा हूँ साथ में अपनी सारी पीड़ा... सारी तकलीफ और वो स्मृतियां भी... आखि़री पत्थर मेढक को दबोचते सांप को लगा है... छपाक...
कमरे में रोशनी होते ही सकपका जाता हूँ मैं... यह अंधेरा तो नंगा कर गया मुझे... छुप जाना चाहता हूँ मैं किसी दूसरे अंधेरे में... मैं भाग जाना चाहता हूँ दूर, बहुत दूर। ठीक नहीं किया शिखा ने... डॉक्टर ने तो और भी नहीं, बहुत मुश्किल से भूल सका था मैं यह सब... और इन दोनों ने... मैं बिना कुछ बोले निकल पड़ता हूँ बाहर...  

***


                             रचनाकार परिचय 
                         
जन्म : 11 अक्टूबर 1973, शिवहर (बिहार)

पेशे से कॉस्ट अकाउंटेंट। कहानी तथा कथालोचना दोनों विधाओं में समान रूप से सक्रिय।

प्रकाशन : वह सपने बेचता था, गौरतलब कहानियाँ (कहानी-संग्रह)
       
  केंद्र में कहानी, भूमंडलोत्तर कहानी  (कथालोचना)

सम्पादन :  स्वप्न में वसंत (स्त्री यौनिकता की कहानियों का संचयन),‘खिला है ज्यों बिजली का फूल’ (एनटीपीसी के जीवन-मूल्यों से अनुप्राणित कहानियों का संचयन), ‘पहली कहानी : पीढ़ियां साथ-साथ’ (‘निकट’ पत्रिका का विशेषांक) ‘समय, समाज और भूमंडलोत्तर कहानी’ (‘संवेद’ पत्रिका का विशेषांक)’, बिहार और झारखंड मूल की स्त्री कथाकारों पर केन्द्रित 'अर्य संदेश' का विशेषांक, ‘अकार- 41’ (2014 की महत्वपूर्ण पुस्तकों पर केन्द्रित), दो खंडों में प्रकाशित रचना समय’ के  कहानी विशेषांक।

वर्ष 2015 के लिए ‘स्पंदन’ आलोचना सम्मान से सम्मानित।

संपर्क: D 4 / 6, केबीयूएनएल कॉलोनी, काँटी बिजली उत्पादन निगम लिमिटेड,
पोस्ट– काँटी थर्मल, जिला- मुजफ्फरपुर– 843130 (बिहार)
मोबाईल – 9425823033; ईमेल – brakesh1110@gmail.com



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संतोष अर्श युवा रचनाकार और आलोचक हैं और अपने सुचिन्तित लेखन और अध्ययन से हिन्दी साहित्य में एक सुदृढ़ पहचान बन चुके हैं। वाणी प्रकाशन से हालिया आए बहुचर्चित संग्रह 'मेरी राशि का अधिपति एक साँड़ है' पर लिखते हुए वह न सिर्फ़ वीरू सोनकर की कविताओं से गहन संवाद स्थापित करते हैं बल्कि उसके साथ -साथ इक्कीसवीं सदी की हिन्दी कविता और उसकी प्रवृत्तियों को भी रेखांकित करते चलते हैं। 



इक्कीसवीं सदी की हिन्दी कविता में कवियों की भीड़ के साथ अनेक तरह की विकल्पहीन अप्रतिबद्धताएँ (यहाँ आशय रचना की प्रतिबद्धता से है), संदिग्ध तटस्थताएँ और अराजकताएँ भी हैं जो लेखक की मृत्यु की उत्तर-आधुनिक घोषणा के औचित्य की (प्रतीति की) संवाहक हैं. संभवतः सुव्यवस्थित सामानांतर आलोचना-कर्म के अभाव ने इन परिस्थितियों को और भी शोचनीय बनाया है. किन्तु इन्हीं में रचना-प्रतिबद्ध निर्वासित स्वर भी हैं जिन्हें इस प्रायोजित शोरगुल और पार्टटाइम (या अभिरुचि आधारित) लेखन के मृत-सागर में सुना जा सकता है. कुछ युवा कवियों ने अपने ज़रूरी मूल्यांकन की आवश्यकता से विमुख रह कर भी कविता का (अति) रचनात्मक साथ नहीं छोड़ा है. वीरू सोनकर उनमें बहुत समर्थ, विश्वसनीय, रचना-प्रतिबद्ध, मौलिक काव्य-प्रतिभा से संपुष्ट और गंभीर नाम हैं. उनका जन्म आठवें दशक के उत्तरार्द्ध में हुआ और रचना-यात्रा इक्कीसवीं सदी के डेढ़ दशक बीत जाने के बाद प्रारम्भ हुई. कविता-रचना की इन विपरीत परिस्थितियों में, जब बहुत सारा काव्य पिछली सदी के दो अंतिम दशकों की कविता की भाषा (शुष्क गद्य)  और शिल्प के प्रभाव से लस्त-पस्त और दिशाहीन है, वीरू सोनकर का स्वतः स्फूर्त शिल्प और अर्जित-भाषा-युक्त-काव्य न केवल आकर्षित करता है, बल्कि उसके सही पाठ, संरचनात्मक स्वरूप और काव्यात्मक अंतर्दृष्टि को खोलने-परखने की माँग भी करता है. अत्यंत सूक्ष्म कलात्मक अभिव्यक्ति से पुष्ट यह काव्य स्थूल भाववाद और शाब्दिक कलाभ्रम उत्पन्न करने वाले काव्य-मण्डल में विक्षोभ पैदा करता है.

     वीरू की कविता पर बात करने से पूर्व हमें ध्यान रखना होगा कि हिन्दी की अकादमिकता, जो आलोचना के बहुत पुराने पड़ चुके स्वरूप और पद्धतियों से समझौता करने के लिए कभी साहस नहीं जुटा पायी, जड़ता के नियम से नवाचार और परिवर्तन की बात सुनते ही घबरा जाती है. मुझे अकादमिक दिनों के अपने एक प्राध्यापक की बात याद आती है कि, ‘ऐसी रचना के लिए आप कौन से टूल्स इस्तेमाल करेंगे ?’ औज़ार बनाने की मौलिक सृजनात्मकता से हीन अकादमिक परिदृश्य को कौन से टूल्स के इस असमर्थ प्रश्न के प्रकाशवृत्त में देखा जा सकता है. इससे मालूम होता है कि आलोचना भी रचना की भाँति मौलिक सृजनात्मक क्षमताओं के साथ यादृच्छिक प्रविधि व सैद्धांतिकी की माँग करती है. पिछले दिनों किसी कवि की आनुष्ठानिक स्तुतियों जैसी कविताओं पर टिप्पणी करते हुए एक आचार्य ने कहा कि साहित्य-सर्जना सनातनधर्मी अनुष्ठान है.यह सही है कि सुमेरी-बेबिलोनी-इज़िप्टियन देव-देवी-स्तुतियों और प्रशस्तिगानों से लेकर वैदिक ऋचाओं तक साहित्य का ओरिज़न आनुष्ठानिक है, परंतु समय के अनुरूप जनधारा ने जड़ शास्त्र व्यामोह त्याग कर परिवर्तनकारी मूल्यों को ग्रहण कर उसकी सिद्धि की है. शास्त्रानुगम परम्परा को जीवित रखने लिए उचित है, किन्तु उसे परिवर्तनशील कालधारा के आगे ठेलना जड़ता और संकीर्णता को न्यौता देना भी है. हिंदी भाषा और साहित्य को वैश्विक साहित्यिक परिदृश्य में सशक्त रूप में प्रस्तुत न कर पाने में ये संकीर्णताएँ अत्यंत उपयोगी सिद्ध हुई हैं. अब साहित्य-रचना कोई अनुष्ठान नहीं है, वह भाषा की सभी सृजनात्मक संभावनाओं से अदृश्य और अकथ्य की कलात्मक रचना, पुनर्रचना है. धर्मी, अधर्मी, कुधर्मी, विधर्मी सभी परिस्थितियों में उसकी व्याप्ति थी और रहेगी. वह मुक्तिप्रदाता भले न हो, परंतु मुक्ति की आकांक्षा का स्पष्टीकरण अवश्य है. 

     वीरू सोनकर की कवितायें वर्ष २०१५ के आस-पास साहित्यिक हलके में यदा-कदा दिखने लगीं थीं. कई ई-माध्यमों से लेकर पाखी, वागर्थ, पूर्वग्रह और पहल जैसी हिंदी पत्रिकाओं में उनकी कविताएँ पढ़ी गईं. वर्ष २०२० में उनका संग्रह मेरी राशि का अधिपति एक साँड़ है वाणी प्रकाशन से छपकर आया है. इस संग्रह में कुल छियासी कवितायें हैं. इसके ब्लर्ब में इन्हें अंतर्व्याप्त यंत्रणा और प्रतिरोध की विलक्षण कवितायें कहा गया है. यंत्रणाओं की भुक्ति, हताशाएँ, संत्रास आदि सभ्य मनुष्य की बुनियादी सामाजिक-सांस्कृतिक प्रवृत्तियाँ हैं और भाषिक प्रतिरोध (लेखन) मुक्ति की ओर बढ़ने का उसका एक आधुनिक रचनात्मक क़दम है. नई कविता के संदर्भ में इन पदों को बेतहाशा प्रयोग किया जा चुका है. वीरू की कविता इन पदानुक्रमों से आगे का मार्ग प्रशस्त करती हुई काव्याभिरुचि की स्रोतस्विनी बनती है.

     बेनेदेत्तो क्रोचे ने अपनी पुस्तक थियरी ऑफ़ एस्थेटिक्स में स्थापित किया था कि सभी मनुष्य कवि होते हैं. कुछ छोटे और कुछ बड़े. इस प्रकार काव्य भी मनुष्य की आधार-प्रकृति से जुड़ी हुई विधा है. भाषिक अभिव्यक्ति पूर्व संभावित काव्य का उद्घाटन है. भाषा के अभाव में काव्य उद्घाटित भले न हो, परंतु उपस्थित रहता है. उपस्थिति काव्य की शर्त है. अपने संग्रह के आत्मकथ्य में वीरू की स्वीकारोक्ति उपस्थिति के रूप में है:
“मेरी उपस्थिति मेरी दुनिया का सबसे बड़ा सच है और मैं इसके नशे में हूँ.” (आत्मकथ्य)
यह उपस्थिति अस्तित्त्ववादी दर्शन के अत्यंत निकट है. इतनी निकट कि उपरोक्त पंक्ति सार्त्र की प्रसिद्ध पुस्तक बीइंग एण्ड नथिंगनेस की उक्ति, “I exist, that is all, and I find it nauseating” का लगभग हिंदी रूपांतरण लगती है. इससे ध्वनित होता है कि कवि अपने अस्तित्त्व को लेकर अत्यंत सजग है. इस अतिसजगता का परिणाम अस्मिता के संकट के रूप में आना अवश्यंभावी है. किन्तु वीरू के लिए यह संकट इतना बड़ा नहीं है कि कविताओं का केंद्रीय विषय बन जाय. आइडेंटिटी क्राइसिस शुरू में अस्मिता पर किए गए अतिक्रमण से उपजी त्रासदी और अंत में वह स्व की खोज का दार्शनिक मार्ग बन सकती है. वीरू की कविताएँ दूसरी ओर प्रवृत्त होती हैं और उसकी कविता यात्रा स्व (सेल्फ़) की खोज़ से आगे बढ़ कर मानवीय राग का भावात्मक, करुणा-प्रसूत संवेदना-पथ ग्रहण करती है.

     क्या, क्या है ? वीरू का कवि इन प्रश्नों को लेकर अत्यंत सजग है. यह दर्शन (देखने) से उपजी प्रथम जिज्ञासा है. इनके उत्तर सपाट लहजे में नहीं दिये जा सकते. जिस प्रकार सत्य को उसके निकट पहुँच कर सरल करना दुर्गम मन: यात्रा है, उसी प्रकार क्या, क्या है ? जानने के पश्चात् यह बताना भी बहुत दुष्कर है. उस क्या के भीतर प्रकृति का सम्यक विस्तार, उसका विराट रूप और पदार्थ जगत (तत्त्व) की रहस्यमयताएँ अंतर्निहित हैं. वीरू उस क्या को बहुत नयी (दार्शनिक ढंग की) सर्जनात्मक अभिव्यक्ति से व्याख्यायित करते हैं. एक ऐसी अवस्था में जब इन सब के विषय में नाना प्रकार से बताया जा चुका है. वैज्ञानिक इंद्रियजनित ज्ञान से लेकर आध्यात्मिक अवबोध तक सृष्टि और तत्त्व का महाआख्यान विस्तृत है, जो भाषिक रचनात्मकता से लेकर अन्य ललित कलाओं में पैबस्त है. अमूर्त का मूर्तन और मूर्त का अमूर्तन अभिव्यक्ति-कलाओं में महत्त्वपूर्ण और विशिष्ट कौशल है. वीरू ने इसे अपनी काव्यात्मक चुनौतियों में स्वीकृत किया है. इस रचनात्मक टकराहट में वीरू की काव्य-प्रतिभा विजयिनी बनती है. क्या, क्या है? पदार्थ क्या हैं ? सृष्टि क्या है ? पर्वत-पठार-वृक्ष-नदी-ताल-सर-कुएँ-मिट्टी-शोर-एकांत-मौन-धरा-गगन-पशु-पक्षी-मृत्यु-जीवन-काल-अकाल और वह सब सूक्ष्मतम-महानतम, दृश्य-अदृश्य जिसमें मानवीय अस्तित्त्व उसकी बुद्धि के साथ आभासित है. जहाँ वह क्षुद्र है, जहाँ वह महान है. जहाँ वह निरीह है, जहाँ वह शक्तिमान है. क्या, क्या है ? कुछ काव्य पंक्तियों में देखा जा सकता है:
फिर मुझे घड़े का मुँह मिट्टी की हँसी-सा लगा
और जान गया कि समुद्र का पसीना है उस पर तैरता फेन
मैं समझ गया हर कुआँ, पृथ्वी की आँख है
और गुफाएँ गायब हो जाने का आग्रह
नदी, पृथ्वी की पीठ पर सिल दी गयी शिराएँ हैं
पानी उनमें दौड़ता ख़ून.         (पुनर्जन्म)   

कि एकांत एक अभ्यास है...
भीड़-शोर अज्ञात का फैलाया हुआ एक जाल है
एकांत, ज्ञात की ओर बढ़ता एक क़दम.    (एकांत एक अभ्यास है)
    
एक खिला हुआ फूल, एक टूटा हुआ फूल
और डाल पर ही अनदेखा रह गया एक मुरझाया हुआ फूल
अपने-अपने तरीक़े से भविष्य तक की गयी एक यात्रा ही तो है...
सभ्यता के नंगे पैर में लगा ज़ख्म भी है
एक तरह का सुलगता हुआ भविष्य ही.                   (कल के आदमी के जूते) 

शोर का भरोसा न करो
कान सन्नाटे के ज़्यादा शुक्रगुज़ार होते हैं...
एकांत एक बन रहे पर्वत की देह है
उबर रही एक नदी
साँस भरता हुये समय का एक समुद्र है...               (एकांत शोर)

जंगल एक रंगबाज़ कर्फ़्यू भी है
जो तय करता है रात को कौन निकलेगा और दिन में कौन ?   (जंगल)
अनुभूति और मुक्त दर्शन आधुनिक-काव्य की प्राथमिक दशाएँ हैं. नई कविता आंदोलन के पश्चात् से अनुभूति का यह स्तर व्यापक होता गया. महावृत्तांतों में स्थूलताओं को छिपाने का सुगम अवकाश रहता था. सूक्ष्म कविता रचने हेतु प्रत्येक वृत्तांत को टुकड़ों में प्रतिपादित करने की आवश्यकता होती है. अतः यह प्रक्रिया और कठिन हो जाती है. मिथक, भक्ति और अनुष्ठान के आलंबन के बिना, शास्त्रसम्मतियों को त्याग कर, सम्यक काव्य-रचना कठोर श्रम, प्रतिभा, चिंतन और विशिष्ट शैली की माँग रखती है. वीरू की कविता का दर्शन महावृत्तांत से उसे अलगाते हुए एक नये अप्रस्तुत का प्रतिपादन करता है. यह तब संभव है जब कवि को सृष्टि के विषय में कुछ बताए बिना उसे वहाँ अकेला छोड़ दिया जाय और वह अपनी इंद्रियों से अर्जित पदार्थवादी ज्ञान, अनुभूति और कल्पना के रचाव से कविता में नयी स्थापनाएँ प्रस्तुत करे. वीरू की कविता में ये प्रवृत्तियाँ सर्वथा नवीन हैं. कवि ने कविता में पुनर्जन्म लिया है और नौनिहाल दृष्टि से पुनः इस विराट स्थापत्य को देख रहा है. महादृश्य को एक बार में देख मूढ़ मनुष्य अपनी मूर्खता से कुंठित हो जाएगा. इसलिए कवि उस बहुआयामी परावर्तनों से भरे हुए शीशे पर अपना सिर पटक कर उसे तोड़ देता है. वह ज़ख़्मी होता है, परंतु दृश्यों का अर्थ टुकड़ों में बाँटता है. जिससे देखा हुआ औरों को दिखाया जा सके.
चश्म हो तो आईनाख़ाना है दहर
मुँह नज़र आता है दीवारों के बीच.      
     एक सपाट, अबूझ दृश्य को देखकर कल्पना में उसे सुलझाना कविता के लिए बेहद मुफ़ीद व्यापार है. वीरू की कविताओं में यह उपक्रम आश्चर्यजनक ढंग से सुफलित है. जैसे दृश्य ! दृश्य क्या है ? क्या यह वही है, जो दिखायी दे रहा है ? क्या यह वही है, जो सुनायी दे रहा है ? क्या व्यक्ति वही है ? जिसे वह जानता है ? हाइडेगर की उक्ति है, प्रत्येक कोई और है, कोई एक भी स्वयं नहीं है. यह सब जानने के लिए दृश्यों और ध्वनियों में उतरना ज़रूरी है. जो अंततः फ़ैन्टेसी में परिणत होता है. किन्तु यहाँ फ़ैन्टेसी में परिणत हुए बिना दृश्यों का खुलना अधिक है. जैसे कोई द्वार खोल दिया जाय और भीतर गये बिना चौखट से ही सब देख कर सही-सही बता दिया जाय. यह दोष हो सकता है कि वीरू का कवि दृश्यों के भीतर कम उतरता है, किन्तु इस कमी की पूर्ति वह दृश्य के बाहर और अधिक सजगता से खड़े हो कर करता है. फ़ैन्टेसी का प्रयोग किए बिना भी इन कविताओं में दृश्यों को सुलझाने की प्रक्रिया अधिक है. मसलन प्रकृति और उसके आनुषंगिक तत्त्वों को कैसे देखा जाय ? पहाड़ कैसा दिखायी देता है ? पानी-पेड़-पत्ते आदि कैसे दिखायी देते हैं ? क्या वैसे ही, जैसे वे हैं ? वीरू की कविताओं में यह तत्त्वमीमांसक दृष्टिकोण (Metaphysical approach) अभिनव है. बल्कि यह तत्त्व-मीमांसा का एक विशेष अनुशासन सत्ता-मीमांसा (Ontology) है. यहाँ अस्तित्त्व और अस्तित्त्व की प्रकृति, प्राणियों और पदार्थों की प्रकृति, उनके गुणों और संबन्धों का दर्शन है. एक दृश्य को प्रत्येक आयाम से देखने का सौंदर्य यथार्थ, सापेक्षता और समीक्षात्मक यथार्थ के लिए विशेष है. यह स्थापनावाद (Foundationalism) सत्य को जानने और सरलीकृत करने के लिए भी उपयोगी है, क्योंकि यह प्राथमिक वस्तुजगत से प्रारम्भ है. यानी प्रकृति में पदार्थों, वस्तुओं के अस्तित्त्व के मध्य अपने मानवीय अस्तित्त्व को चीन्हने, पहचानने और उसे सरलीकृत करने के काव्यात्मक प्रयास. यह काव्य और कवि के दार्शनिक पक्ष को प्रगट करता है. कलाएँ इसी प्रकार दर्शन से जुड़ती हैं. अरिस्टाटिल ने इसे प्रथम दर्शन कहा था. वस्तु-जगत् के प्राथमिक कारक और सिद्धांत. वीरू की कविता में दर्शन की इन प्रवृत्तियों को देखते हुए- देकार्त की Existence is a perfection, कान्ट की being is a logical not real predicate और पारमेनिडेस की being is; not being is not जैसी दार्शनिक उक्तियों का स्मरण होना स्वाभाविक है.

     मेरी राशि का अधिपति एक साँड़ है- पंक्ति, संग्रह के शीर्षक के रूप में बीइंग का ही काव्यात्मक विस्तार है. ज्योतिषी में राशि का अर्थ जो भी हो, किन्तु प्रचलित अर्थ में वह समूह, पुंज या और सरलीकृत रूप में amount है. और इस बीइंग का अधिपति या स्वामी एक वृषभ है. साँड़ का लोकप्रचलित रूप छुट्टा, बेखौफ़ घूमने, यहाँ-वहाँ बेझने, सींगे ताने रहने और लड़ने-भिड़ने से निर्मित होता है. यह प्रतीक बीइंग के अहं (कार्ल जुंग के ego) को धारण किए हुये एक उजड्ड का बयान कविता में मानव जीवन की क्षुद्रताओं के साथ ध्वनित है. साँड़ और उजड्ड. उजड्डता, उदण्ड का तद्भव संस्करण है किन्तु उजड्ड के समक्ष कितना निष्प्रभावी. उजड्डता उजड्ड शब्द से अधिक पुरानी है और उदण्डता के पर्याय से उसका अभिजात संस्करण नहीं बनाया जा सकता. उजड्डता का अलग ही सौन्दर्य है. यहाँ कविता में इसका अर्थ ध्वनिमय और व्यंजनापूर्ण है. जीवन के अनेक प्रभावी क़िस्सों के साथ यह एक आम आदमी की अभिव्यक्ति है. उजड्डता कहाँ से आई ? जीवन की यातनाओं से ! परन्तु उजड्डता अपने वर्गीय कारकों में परित्यक्त मनुष्य की पीड़ा बन जाती है. यहाँ एक एलिएनेशन है. औरों से अलग अकेला कर दिये जाने की त्रासदी है. गहरे अँधेरे वर्ग-कूप में धकेल कर भूल जाने का षड्यंत्र:
मेरी राशि का अधिपति एक साँड़ है और माँ कहती है मैं उल्टा पैदा हुआ था
दोस्त कहते थे कि निरा उजड्ड है अपना साथी
मेरी उजड्डता एक सुविधा थी उनके लिये पलायन की
उजड्डता की इसी पतली गली से निकल भागी थी
मेरी प्रेमिका भी एक दिन.          (एक उजड्ड का बयान) 
इस उजड्डता के पार्श्व में जीवन की गहरी यातनाएँ अनभिव्यक्त और लंबित पड़ी हुई हैं. साँड़ की इस मनमानी पाशविक प्रवृत्ति के पर्दे से जीवन की पीड़ा को छिपाया गया है. साँड़पन (Bullying) आमतौर पर अपने से कमज़ोर लोगों को डराने के अर्थ में प्रयुक्त होने वाला शब्द रहा है. यहाँ कविता में यह अपनी वर्गीय लाचारी को ठीक उल्टे ढंग से प्रस्तुत करने के लिए है और यह व्यंजित भी हो रहा है:
तेरी खाल इस धरती की सबसे चीमड़ खाल है
यह चाहनाओं से नहीं बनी
इसमें घुली है एक बगावती पेड़ की साँसें और पगलाए साँड़ का गर्म ख़ून      (वही) 
पगलाये साँड़ के गर्म ख़ून से भरी ये कविता अपने नवें खण्ड तक आते-आते आत्मपरकता से सर्वजनता की ओर बढ़ती है. व्यक्ति की उजड्डता एक व्यापक जनसमूह की उजड्डता बन जाये तो क्या होगा ? वह भी पगलाये साँड़ जैसी उजड्डता ! स्वानुभूति की हरारत और जीवनानुभवों का ताप अब भी कविता के लिए प्योर कच्चा माल है. उजड्ड, संघर्ष करने वाले समाज का कितना सुंदर शब्द है. कवि की उजड्डता के पीछे छिपा हुआ अवसाद कविता में आ कर उजड्डपन नहीं लग रहा है, इससे आगे बढ़कर, वर्गीय प्रवृत्ति बन कर नाटकीयता ग्रहण करता है. विद्रोह (यहाँ अराजकता का आभास है) का आवेग चरित्र में जो उग्रता पैदा करता है वह प्रचलित मान्यताओं के लिए असह्य हो कर उजड्डता या आभिजात्य के मायालोक में उदण्डता घोषित हो जाता है. अन्याय करने वाले सदा अन्याय सहने वालों के विषय में व्यंग्योक्ति के रूप में कहते रहे हैं कि यह बहुत मोटी खाल का है.’ वे चाहते हैं कि ज़ुल्म सह कर आह की जाय, चीख़-पुकार मचायी जाये जिससे उनके हिंसक बर्तावों की व्याप्ति का अनुमान हो सके और भीति उपजे. किन्तु वैसी ही मोटी खाल वाला उजड्ड कह रहा है :
तेरी यह खाल जब उतरेगी
तो दुनिया का सबसे मजबूत जूता बन कर बरसेगी       (वही) 
चीमड़ खाल का मजबूत जूता बना कर तटस्थता पर बरसाने का ख़याल आने की प्रक्रिया वस्तुतः व्यक्तित्वांतरण है. और यह तभी संभव होता है जब अपनी जाति के अहंकार में बौराया हुआ व्यक्ति धकेल दिया गया हो अपने होने की अनिच्छा से भरे एक गुमनामी कुएँ में.’ यह सारी उजड्डता यंत्रणा ही से उत्पादित हुई है. इसमें वर्गीय अहं की तुष्टि भी प्रछन्न है या कहा जा सकता है कि उजड्डता एक तरह का प्रतिरोध है, लिजलिजे और बनावटी पूँजीवादी शिष्टाचार के प्रति. एक उजड्ड का बयान कविता कवि के आभ्यांतरिक संघर्ष की उत्तम रचना है. इसकी जड़ें नई कविता के आत्मसंघर्ष से जुड़ी हुई हैं. इसमें बाह्य का संघर्ष अंतर्मुख काव्य-संवेदना की सिल पर घिस कर चमक रहा है. इस तरह वीरू के कवि के दो रूप बनते हैं. एक जहाँ वह दृश्यों में खोया हुआ विस्मय से भरा निरीह कलाकार है जो निसर्ग के ऐंद्रजालिक कल्पना-लोक में खो जाता है और कला के चरम क्षितिज को, कल्पना की तीव्र ढाल पर दौड़कर छू आना चाहता है, तो दूसरा यथार्थ से टकरा कर अपनी उजड्ड प्रतिमा का स्व-शिल्पी साधारण मनुष्य. एक साधारण मनुष्य जिसका केवल वर्ग ही नहीं है जाति भी है. वर्ग के भीतर जाति, जाति के भीतर वर्ग. एक मोटा जाल और एक झीना, अदृश्य किन्तु मोटे जाल से भी मजबूत जाल. वर्गीय लाचारी जाति में और अधिक घनीभूत हो जाती है:
मैंने बहुत देर से जाना
कि मेरी जाति मेरे साथ घट गया सिर्फ़ एक दुर्योग है
दुनिया यह पहले से जानती थी...
मैं जिसे किसी दुर्योग की तरह देखता हूँ
वह दुनिया के हाथ लग गया एक सुखद संयोग है.   (जाति)    
     जाति और वर्ग के दोहरे जाल में रचनात्मक क्षमताओं का संग्रहण ढलान से ऊँचाई की ओर भार के साथ एक चढ़ाई है. वीरू का कवि अपनी जाति को ढाल नहीं बनाना चाहता. न ही वह जाति के शिकंजे में फाँस लेने वाले दयावानों की सहानभूति चाहता है. उसके पास जाति की वंचना का कोई विलाप नहीं है, बल्कि एक उदासीनता है. जाति को अपनी देह से उसने माँस के लोथड़े की तरह काट कर फेंक दिया है, जिस प्रकार शल्य चिकित्सक जीवन के लिए सांघाती बन गए किसी ट्यूमर को निकाल कर फेंक देता है. जाति के संयोग और दुर्योग के बीच वह कुटिल त्रासदी है, जिसमें माँस का यह काट कर फेंका गया लोथड़ा हाथ में लिये लोग उसके पीछे चले आ रहे हैं. कृत्रिम सहानुभूति लिये. इस अमोघ भारतीय शस्त्र के इस्तेमाल के लिए. और इसे देख कर कवि को और अधिक पीड़ा होनी लाज़िमी है. ऐसी त्रासद परिस्थितियों में कवि की रचनात्मकता बिना किसी वंचना के अकुंठ रूप में विकसित हो रही है, तो यह रचना से प्राप्त सामर्थ्य है. कवि का यही सामर्थ्य समष्टि का सामर्थ्य बनता है. वह कला के लिए वर्ग को भूलता है, निष्ठुर वर्ग उसे वापस खींचता है. कला उसे वर्गच्युत करती है और वर्ग उसे कलाच्युत करता है. इस संघर्ष से उसकी कविता और निखरती है. रचना और जीवन का यह द्वंद्व कवि होने की पहली शर्त (कंडीशन) है.

     मेरी राशि का अधिपति एक साँड़ है- संग्रह की कविताओं में बिखराव नहीं है. किन्तु रचना प्रक्रिया में एकरसता है. कुछ कविताओं को यदि अलग कर दिया जाय तो अलग-अलग हो कर भी सभी कविताएँ एक ही थान के हिस्सों सी खुलती हैं. यह शिल्प में अधिक है. संरचनात्मक स्तर पर वीरू का सौष्ठव उसके समकालीनों से बहुत अलग है. उसकी कविता को देख कर कहा जाएगा कि ये वीरू ही की कविता है. व्यंग्य उसके यहाँ शालीन और चुप्पा होते हुए भी मारक है. किसी जगह उसने एक प्रसंगनुमा कथा लिखी थी:
कवि एक मज़दूर से पूछता है क्या तुम मार्क्स को जानते हो ?
मज़दूर ने कहा : मैं अपने ठेकेदार को जानता हूँ
कवि ने कहा, तुम नहीं जानते ठेकेदार तुम्हारा शोषण करता है
मज़दूर ने कहा: मैं बस इतना जानता हूँ कि वह सरकार से कम क्रूर है.  (कवि-संवाद कथाएँ) 
यह कवि जो मज़दूर से संवाद कर रहा है, स्वयं भी श्रमिक ही है. मार्क्स और ठेकेदार के मध्य का अंतराल मुखर (या भीषण) व्यंग्य है. पूँजी की हाहाकारी शक्ति ने मार्क्स और मज़दूर के मध्य ठेकेदार को डाल दिया. कितनी शालीनता के साथ व्यंग्य का प्रयोग है. संवाद-शैली में रची गयी एक और व्यंग्यपूर्ण कविता संवाद है. यह प्रेम के छली रूप से ठगी गयी स्त्री का आर्त्त चित्र है. सपाट और सतर्क पुरुष प्रवंचना को छिपाने के लिए दार्शनिक बन जाता है. स्त्री उसके धोखेबाज़ पुंसत्त्व से नयी स्त्री का चेहरा बना लेती है. व्यंजना की शक्ति से स्त्री के प्रति कितनी करुणा रच लेती है यह कविता. इसे ध्वन्यालोक-लोचन की उक्ति व्यंग्योप्यर्थ: ध्वनिरिति व्यवहृत: के साथ भी सुना-देखा जा सकता है-   
उसने शंकालु हो कर पूछा
क्या तुम किसी और से ?
और पुरुष की ज़ुबान से कुछ पाषाण झरे
दृश्य विहीन कुछ भी नहीं, जहाँ तक दृश्य है संभावनाएँ हैं.           (संवाद) 
पुरुष की ज़ुबान से पाषाण झरना, जैसे निष्ठुरता का सबसे प्रभावी रूप में मूर्त हो जाना. मूर्ति पाषाण से ही गढ़ी जाती है. इसी पुरुष में कृष्ण के उद्धव और गोपियों को भी देखा जा सकता है और उच्च-आधुनिक समय की स्त्री की सभी स्त्रीवादी प्रतिस्थापनाएँ भी. प्रेम की इस संभावना में स्त्री का चेहरा प्रथम स्थान पर है. लिहाज़ा पुरुष का पराजय-बोध से लज्जित हो जाना कवि का स्त्री को विजयी बनाना नहीं है, अपितु यह स्त्री की ओर से प्रेम की जय-पराजय में दी गयी एक दलील है. कविता में व्यंग्य करुणा से उपजता है, चिढ़ या कुंठा से नहीं- इस कविता में इसका प्रमाणन है.
     वीरू का स्वर बहुत संयत है. वह चीख़ता नहीं है. चीखने से उसकी वेदना मद्धिम हो जाएगी. उसमें वह काव्य-चिढ़ भी नहीं है जो इधर के युवा कवियों का आइडेंटिटी-कार्ड है. जिसे दिखा कर वे अपने समकालीन कवियों को हेय या अकवि साबित करने की शीघ्रता में रहते हैं और बुज़ुर्ग कवियों की कविताओं को बिराती हुई लयहीन पैरोडियाँ लिखते हैं. उसकी कविता में कविता को लेकर कोई संशय नहीं है. यह साधना से रची गयी कविता की आश्वस्ति है. वीरू की कविताओं में यह आत्मविश्वास साफ़ और शांत आब की भाँति दस्तयाब है:
मैं जितना देह में था, उतना ही उस भाषा में
मैं उस भाषा-देह के व्याकरण में आत्मा सा घुला था.       (भाषा)
भाषा और व्याकरण उसके यहाँ प्रतीक रूप में ख़ूब है. वह भाषा को कई बार विस्मय से बरतता है- जैसा घुसता है व्याकरण एक भाषा के भीतर’. भाषा को वह एक कारीगर की तरह देखता है. जैसे कुम्हार मिट्टी को. इसीलिए वह अपने देखे को अपनी भाषा में बता पाता है. नदी को उसने कैसे देखा और लेखा है ?
-नदी किसी जर्जर इमारत-सा ढहती है
और पानी-पानी हो जाती है.
-मछलियाँ नदी की गूँगी बहनें हैं
-जंगल नदी के आलिंगन में लिपटा अतृप्त प्रेमी है.        (नदी)    
उसका दु:ख भी बुद्ध का दुक्ख है जिसके दूर होने के उपाय सुलभ नहीं हैं. दु:ख में उसने सुख के हरे उपहारों को हताशा के पीले पत्तों-सा चबाया है. उसकी डूब-नींद’, ‘हमारी जाग होगी. जब वह बुद्ध के रास्तों पर निकलेगा:
मैं निकल जाऊंगा एक दिन
समय के चक्रव्यूह की तमाम लिखत-पढ़त को बेपरवाह फाड़ता हुआ
बुद्धकालीन किसी वृक्ष के नीचे जा कर
एक डूब नींद बिछाऊंगा
देह और आत्मा का एक संयुक्त बयान ज़ारी कर सो जाऊंगा
कि तथागत आयें तो मुझे दोबारा जागा देना.     (संयुक्त बयान)                     
यह धम्मपद के बालवग्गो पञ्चमो (जेतवन सावत्थी) के उस उपदेश की थकान और अनिद्रा है, जहाँ भिक्खु सुनते हैं- दीघा जागरतो रत्ति दीघं संतस्स योजनं’. जागरण करने वाले की रात लंबी होती है. थक गये व्यक्ति के लिये मार्ग (योजन) लंबा हो जाता है. कविता में तथागत के आने की संभावना उसी अंतर्व्याप्त पीड़ा और संत्रास के उपचारित हो जाने का भाव है जो इसके अभाव में वेदनानुभूत है.
     मेरी राशि का अधिपति एक साँड़ है- संग्रह की कविताएँ यातनापूर्ण जीवन, अलगाव और अजनबियत से घिरे मनुष्य की पीड़ा, उसके करुणापूर्ण हृदय और प्रतिरोध की बुनियादी प्रवृत्तियों से रची गई हैं. इन कविताओं की विशिष्टता, नवीनता और प्रासंगिकता इनकी गंभीर रचना-प्रक्रिया के साथ भाषा की उस संप्रेषणीय ताक़त में निहित हैं जिस पर कवि ने कई कविताओं में बात की है. संग्रह में भाषा पर- भाषा, तुम्हारी भाषा में, शब्दकोश जैसी कविताएँ हैं जो भाषा के प्रति कवि की लक्षित सजगता और उससे उसके जुड़े हुए व्यापार के रहस्य खोलती हैं. पूर्वग्रह में प्रकाशित वीरू सोनकर की लंबी कविता आग की भाषा और पहल में भग्नावशेष भी उनकी दंग कर देने वाली काव्य-प्रतिभा का प्रस्तुतीकरण हैं. लंबी कविताओं का सुगठित रचाव और सधाव दर्शनीय है. प्राथमिक तत्त्वों को आदिम प्रतीकों के रूप में अत्यंत कलात्मक प्रयोग इन कविताओं का असाधारण सौंदर्य है. आग की भाषा दस भागों में रची गयी है और भग्नावशेष अठारह भागों में. दोनों कविताओं को वीरू के संग्रह के साथ पढ़ने पर अनुभव होता है कि वह निरंतर विकसित हो रहा रचनाकार है और उसका विकास हिन्दी की गंभीर कविता के क्षेत्र में लीला की भाँति घट रही कोई घटना है. इन दोनों कविताओं से कुछ अंश देखे जा सकते हैं:
आग को कोई सलीक़ा ही नहीं, राख उसका शृंगार है.
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स्मृति आग के चेहरे पर भीगते हुए नाचती है.
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मैं विशेषज्ञों में अंतिम हूँ
विश्लेषकों का अंतिम शिकार
मेरी हत्या मेरे समय की सबसे ज़रूरी बात होगी.
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स्मृतियाँ नीरस विषय याद नहीं रखतीं.
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मुझे अपना शहर याद नहीं रहता
मुझे रोशनियाँ याद रहती हैं.
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एक भाषा के भीतर व्याकरण की तरह उतर जाना
मेरा सबसे आदिम अभ्यास है.
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ज्वालामुखी से नीचे उतरते तमाम लाल अजगर
रेंगते हुए नहीं, दौड़ते हुए नारा लगाते हैं.           (आग की भाषा)

बिछड़ गए प्रेमियों के भग्नावशेष
भागने में ठिठक गयी प्रेमिकाओं के चेहरे पर मिलते थे
और किसी मेकअप से नहीं छुपते थे.
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पृथ्वी पर दु:खों के नव-निर्माण होते रहते हैं
सुख भग्नावशेषों में सुरक्षित है.
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उनके पास हँसने की बेशुमार जगहें थीं
जहाँ वे हँसने का अभिनय करते थे
बुक्का फाड़ कर रोने के कोने इस धरती पर बहुत कम थे    
वहाँ कभी अभिनय नहीं होते थे.     (भग्नावशेष)   
आग की भाषा और भग्नावशेष जैसी कविताएँ इस सदी की हिन्दी कविता का सद्य: उद्घाटित परिदृश्य हैं. ये काव्यानुशीलन की सभी प्रचलित और पुरा-प्रविधियों को नकारने वाली हैं. इनके विश्लेषण हेतु सम्यक चिंतन और अवकाश की दरकार होगी. परंतु इनके आधार पर यह कहा जा सकता है कि वीरू सोनकर की दृश्य-मीमांसा काव्य में जिस विलक्षण रूप के साथ प्रस्तुत हुई है, वह हिन्दी में शांत और ठोस उपस्थिति है। व्यवस्थित बिम्ब-विधान वीरू सोनकर की कविता का अत्यंत पुष्ट और कलात्मक भाग है. बल्कि बिम्ब उसकी ताक़त है. दृष्टांत और बिम्ब जहाँ मिलते हैं, वहाँ कविता का रूप-रंग प्रगाढ़ हो जाता है, शुष्कता जो अधिकतर हावी रहती है, कुहासे की भाँति छँट जाती है:   
अगर गिराना हो मुझे
तो चिड़िया की चोंच से निकले पहले स्वर की तरह
सुबह की गोद में गिराना.          (आग की भाषा)   
कभी एजरा पाउंड ने कहा था कि एक बिम्ब एक विचार से कहीं अधिक है. बिम्ब अप्रस्तुत और अप्राप्य की मानसिक या कल्पनाजनित अभिव्यक्ति होती है. वीरू की कविता में बिम्ब सबल पक्ष बन कर उभरते हैं. बिंबों के साथ प्रयोग भी है. कविता में बिम्बों को नये रंग की छायाओं (शेड्स) में निरूपित किया गया है. अमूर्तन का मूर्तन, रूप-अरूप की क्रीड़ाएँ और बिम्बावलियाँ वीरू की कविताओं में डूबे हुए को अनबूड़े बूड़े तरे, जे बूड़े सब अंग जैसी काव्य-उक्तियों का बोध कराएंगी. कवि कहीं दृश्यों को उलट देता है, कहीं उल्टे हुए दृश्यों को सीधा करता है. कविताओं में दृश्यों का आश्चर्यलोक है, यह उनमें विचरने वाला जान पाएगा. कवि वस्तुओं को उनकी वास्तविक उपस्थिति के साथ देखता है और कहता है कि इसे इस तरह देखो. यह वस्तुजगत् को देखने की कवि की क्षमताओं का प्रसार है. रूप और अरूप की कविता, जितनी रूपवादी उतनी ही अरूपवादी. चित्रकला के दोनों पक्ष- डेकोरेटिव डिज़ाइन और एब्स्ट्रेक्ट डिज़ाइन. काँक्रीट को एब्स्ट्रेक्ट और एब्स्ट्रेक्ट को काँक्रीट में परिवर्तित करने का भाषिक लाघव और भाव-संवेदन से उसमें प्राण फूँक देने का काव्य-कौशल. और इसी में आता है उक्ति-वैचित्र्य और चित्रमय वर्णन (pictorial statement). इस पैमाने पर वीरू सोनकर हमारे समय के सबसे अधिक कलाप्रवण (या कलावादी) कवि हैं. जो काव्य में कला के लिए जान दिये रहते हैं, ऐसे कलावादियों को वीरू की कविताओं से अविलंब गुज़रना चाहिए.
     परम्पराप्रियता कबड्डी के खेल की भाँति है. जब कुछ नया रचने में दम उखड़ने लगे तो परम्परा के पाले में लौट भागो. वीरू ने अपनी कविता को पारंपरिक प्रपंचों से बचाया है. उसमें परंपरा का वह हिन्दी-काव्य-प्रचलित आग्रह नहीं है, जिसकी नींव पर असमर्थ और चतुर कवि वर्चस्ववादी, पौराणिक और मिथकीय शास्त्रीयता का कवच पहन कर समकालीनता में खड़ा होता है. बिना परंपरा की आड़ लिए, वह दुर्लभ काव्य का रचयिता है. वह कविता में मनुष्यता की सबसे विनम्र मुद्रा में उस स्थान पर खड़ा है, जहाँ उसके साथ प्रत्येक मनुष्य और जीव उसी अवस्था में आक्रांत हुए बिना, तटस्थता और पूर्वग्रह के अतिरिक्त कोई अन्य विकल्प ढूँढ कर खड़ा हो सके. परंपरा की ढाल और ढोल लेकर कवि सांस्कृतिक प्रतिरक्षा तो अर्जित करता है, परंतु उसमें व्याप्त सरवाइवल ऑफ फिटेस्ट के फ़ासिस्ट विषाणु उसे खींच कर एक दिन उस स्थान पर पहुँचा देते हैं जहाँ वह ऐतिहासिक नरसंहारों की पृष्ठभूमि में खड़ा एक तटस्थता का ढोंग करता नपुंसक बन जाता है. वीरू की कविता में वह चिढ़ भी नहीं जो इस समय के युवा कवियों की रोगक है. वह अकुंठ काव्यचेतस् वैरागी है, जिसमें स्वाभिमानी कवि का उजड्डपन है. कविता में जिसकी स्वीकृति भी है-
इस भाषा के तकिये पर सिर टिकाये
मैं सबसे अधिक मौलिक था
सबसे अधिक मुखर
सबसे अधिक विस्तृत
सबसे अधिक कल्पनाशील था.  (भाषा)

वीरू सोनकर में उपरोक्त सभी ख़ूबियाँ हैं. वह हिन्दी का एक संग्रह तक सीमित रह जाने वाला कवि नहीं है. वह बहुत दूर से आया है और बहुत देर तक रहेगा.

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 डॉ. संतोष अर्श