विशेष उभरते हुए युवा कवि हैं. इधर उन्होंने अपनी कविताओं के विषय और उनमें मौज़ूद विविधता से लगातार ध्यान खींचा है और संभावना के नए स्वर के रूप में उभरे हैं. विस्थापन, महानगर का अकेलापन और युवा सपनों के कई आयाम इनकी कविताओं में मिलते हैं. समकालीन लेखन को ध्यान से पढ़ते हुए उनके अंदर अपनी ख़ुद की जमीन और शैली तलाशने की ललक भी दिखाई देती है और यही चाह उन्हें भविष्य की नयी आवाज़ के रूप में भी गढ़ेगी. आइए 2019 की शुरुआत इस नयी कलम को पढ़कर करें क्योंकि 'एक बेशकीमती दिन बचा रहता है कल के आने तक'.

मंगलेश जी हर बातचीत में यह ज़रूर कहते हैं कि एक कवि को गद्य ज़रूर लिखना चाहिए और यह सुनते हुए मुझे रसूल हमज़ातोव याद आते हैं जिन्होंने लिखा है 'कितनी ही बार मैंने अपने काव्य गगन से नीचे, गद्य के समतल मैदान पर यह ढूँढते हुए नज़र डाली कि कहाँ बैठकर आराम करूँ ... पढ़िए एक कवि की डायरी ...

गौरव गुप्ता नए संभावनाशील कवि हैं जो सहज, सरल शब्दों में अपनी बात कहते हैं और वह मन को छू जाती है। पिछले महीने हुए मुक्तांगन- कविता कोश काव्य पाठ में उनकी अभिव्यक्ति को श्रोताओं ने बहुत सराहा। मुम्बई में हुए लिट फेस्ट में गौरव की कविता पांडुलिपि को प्रथम पुरस्कार  दिया गया है। साहित्य की राजनीति से दूर चुपचाप लिख रहे गौरव जैसे कवि इस पूरे परिदृश्य में एक सुकून, एक सकारात्मक उम्मीद देते हैं कि कविता को अभी लंबा सफ़र तय करना। आशा है कि वह अभी अपनी लेखनी को और मांजेगे, नए बिम्ब, नए विषयों के साथ कविता का अपना नया वितान गढ़ेंगे। इन्हीं शुभकामनाओं के साथ पढ़िए नवोदित कवि गौरव गुप्ता को। आपकी टिप्पणी उन्हें आगे और बेहतर लिखते रहने के लिए प्रोत्साहित करेगी।