कोई महिमामंडन नहीं करूंगी, किसी विशेषण, किसी अलंकरण से नहीं सजाऊँगी। स्त्री, तुम मानुषी हो, खुल कर सांस ले पाओ, जी पाओ हर गिरह खोलकर। कविता भी शायद एक स्त्री ही है। जीती –जागती, धड़कती, कभी ढेर सारा दर्द, कभी बेइंतिहा खुशी। स्त्री न हो तो क्या होगा जीवन! कविता नहीं हो तो कितना नीरस, कितना यांत्रिक होगा मन! स्त्री और कविता ....आओ इनको साथ बुन लें ....थोड़ा स्त्री जी लें अपने भीतर ...