बॉलीवुड सेल्फी हिन्दी की ऐसी किताब है जिसमें फिल्मी सितारों की जिन्दगी से जुड़ी प्रामाणिक कहानियाँ हैं। इस किताब में लेखक ने सितारों से जुड़े प्रसंगों को इस तरह से पाठकों के सामने पेश किया है कि पूरा दौर जीवन्त हो उठता है। इसमें ग्यारह फिल्मी हस्तियों को केन्द्र में रखकर उनकी जिन्दगी का विश्लेषण और अनछुए पहलुओं को उजागर किया गया है। इस किताब के नाम से ही साफ है कि इसमें सितारों के जीवनानुभव के आधार पर लेखक उनके व्यक्तित्व का विश्लेषण करते हैं। इस तरह से यह किताब हिन्दी में अपनी तरह की अकेली किताब है।
अपनी एक टिप्पणी में हिन्दी आलोचना के शिखर पुरुष नामवर सिंह ने लेखक अनंत विजय की भाषा के बारे में कहा है कि -  मैं अनंत विजय के लिखने की शैली की दाद दूँगा। इतनी अच्छी भाषा है, पारदर्शी भाषा है और पारदर्शी भाषा होते हुए भी थोडे़ से शब्दों में हर लेख अपने आप में इस तरह बाँधे रखता है कि आप आलोचना को कहानी की तरह पढ़ते चले जायें। ये निबन्ध नहीं लगते बल्कि एक अच्छी दिलचस्प कहानी के रूप में हैं, इतनी रोचक, पठनीय और इतनी गठी हुई भाषा से ही मैंने पहली बार अनंत विजय की प्रतिभा को जाना।
फिल्मी सितारों की जिन्दगी से जुड़े अनबूझे पहलुओं को लेखक अनंत विजय प्रोफेसर नामवर सिंह के उपरोक्त कथन को इसी पुस्तक में साकार करते हैं। फिल्मी सितारों पर लिखी इस किताब में भाषा की रोचकता के साथ पाठक एक विशेष अनुभव यह भी करेंगे कि पुस्तक को जहाँ से भी पढ़ना आरम्भ करेंगे, वही रोचकता अन्त तक बनी रहेगी।
हिन्दी में फिल्म लेखन पर गम्भीर किन्तु रोचक लेखन हुआ है। फिल्मों की समीक्षा तो बहुत लिखी जाती है लेकिन फिल्म और उससे जुड़े रोचक प्रसंग पुस्तकाकार रूप में उपलब्ध नहीं हैं। इस किताब में ऐसी तमाम कमियों को पूरा करने का प्रयास किया गया है।
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सत्यजित रे भले ही फिल्म समीक्षकों को सिनेमा और दर्शकों के बीच का सेतु मानते रहे हों, लेकिन हिन्दी सिनेमा ने समीक्षकों को शायद ही कभी तरजीह दी है। रे का तो मानना था कि फिल्म समीक्षकों के सिनेमा की समझ का स्तर निर्देशक से ऊपर रहना चाहिए, तभी वह फिल्म निर्माण की पूरी प्रक्रिया को समझते हुए फिल्म को विश्लेषित कर सकता है। वास्तव में हिन्दी सिनेमा यह मानने को तैयार ही नहीं हो सका है कि उसे विश्लेषण की जरूरत है। उसने सीधा अपने दर्शकों से संवाद कायम किया और भरसक उस गूढ़ता से परहेज किया जहाँ किसी तरह की व्याख्या की आवश्यकता हो। सिनेमा ने दर्शकों के सौन्दर्यबोध को चुनौती देने के बजाय उसके सामने समर्पण बेहतर समझा, नतीजतन दर्शकों को भी कभी सिनेमा के लिए समीक्षकों की आवश्यकता नहीं हुई। तब भी जब विमल राय फिल्में बनाया करते थे और अब भी जब साजिद और फराह खान फिल्में बना रहे हैं। आज भी समीक्षकों के 4 स्टार के साथ आने वाली जेड प्लसको थिएटर तक नसीब नहीं हो पाता जबकि बकवास करार दी गयी हैप्पी न्यू इयरकमाई का रिकार्ड बना लेती है।' - विनोद अनुपम

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लेखक परिचय

अनंत विजय
जन्म: 19 नवम्बर।
शिक्षा: स्कूली शिक्षा जमालपुर (बिहार) में। भागलपुर विश्वविद्यालय से बी.ए. ऑनर्स (इतिहास), दिल्ली विश्वविद्यालय से पत्रकारिता में पोस्ट ग्रेजुएट, बिजनेस मैनेजमेंट में पोस्ट ग्रेजुएट डिप्लोमा, पत्रकारिता में एमएमसी।
प्रकाशित कृति: प्रसंगवश, कोलाहल कलह में, मेरे पात्र, विधाओं का विन्यास।
सम्पादन: समयमान पाक्षिक के सम्पादक रहे, अखिल भारतीय कहानी प्रतियोगिता में पुरस्कृत कहानियों के संग्रह कहानीका सम्पादन।
स्तम्भ लेखन: नया ज्ञानोदय, पुस्तक वार्ता, दैनिक जागरण, दैनिक ट्रिब्यून, चौथी दुनिया।
सम्प्रति: IBN7 में डिप्टी एक्जीक्यूटिव प्रोड्यूसर।

सिकुड़ते और फैलते , रेटिना की शरारतों में , उसने कब मुझे पढ़ लिया , मुझे पता भी नहीं चला , लफ़्ज़ों से मेरा गला रेतते हुए , उसने पूछा ,"दर्द ?" मैंने कोने में बैठे , बुद्ध की करुणामयी आँखों में झाँका , और कहा ,"नहीं |" ************************************** 
उस दिन से , मैं रोज़ बुलाता हूँ तुम्हे , अपनी कविता में,जैसे मरने से पहले कोई बुलाये , पादरी को , और कनफैशन किये बिना , उसे विदा करदे , एक कप काफी पिला कर. 



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1.   

तुम्हे देखना
भिखारी के कटोरे का
लबालब भरना है
ना देख पाना रेगिस्तान में घूमने निकले
नितांत अकेले की मश्क का रीत जाना है !
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तुम्हे तो पता है न
बोल ही तो नहीं पाता मैं
पर कह दूँगा इस बार
मुझे जाना ही नहीं है
यह पृथ्वी छोड़ कर जबतक
तम यहाँ हो
और तुम तो रहोगी ही
क्योँकि तुम्हारे होने से ही है
पृथ्वी भी पृथ्वी !
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रोज़ मिलने की ख्वाहिश
और कभी न मिलने के अहद में
उलझी जिंदगी
कसाई की दूकान पर ,हुक से टंगे
उलटे लटके बकरे सी हो गयी है
सीने से खून टपकता है
कपडा मार कसाई हर नए ग्राहक से
पूछ लेता है ,क्या दूँ साहिब ?
एल रोता दिल ,एक फूंका जिगर या फिर
एक बेचैन जेहन ?



2.  तो पढ़ा मैंने अपना चेहरा भी

धीरे से बदल जाती है दुनिया,
एक शोर से भरी सड़क से,
बिना पानी की झील सी स्तब्धता में,
डूबती तैरती,हरे पत्तों के बीच के अन्धकार सी रौशनी,
मेरे चेहरे पर तुम्हारा चेहरा छाप देती है .

अपने होने के भीतर भर जाता है,
तुम्हारे होने का पानी,
प्रेम में होने की निरीहता,
चेहरे से ओले की तरह टपकती है,
मैं जानता हूँ उन पलों में होता हूँ मैं,
कील निकले मुहांसे सा ,दीगर
कोई मिला कर नहीं देखता मेरे चेहरे को,
मेरे चेहरे से उस एक पल में .

मेरी मुस्कराहट में खाई में उतरते होने सा अवसाद,
मेरी नाक की नोक पर टिकी शिकारी कुत्ते सी सूंघ,
तुम्हे मेरे आसपास टोहती है,
अपने भीतर मैं देख रहा होता हूँ,
घुप्प अँधेरे में फड़फड़ा उड़ते कबूतरों को .
(बहुत दिन निर्वात में तुमसे बतियाते,आज आईना देखा .....तो पढ़ा मैंने अपना चेहरा भी )


3.   

उसने गिन कर चार धान पानी में बहाये, अक्षत की कल्पना और कामना दोनों को नीले रंग से रंगा। एक हरे भरे खेत के बारे में सोचा, जबकि पता था उसे, धान दानों से नहीं होता...घुटनों पर झुक, उसकी कलम लगानी पड़ती है। पानी में डूबी, कच्ची मिट्टी कुरेदती उँगलियों के नाखूनों में, एक नाम लिखा जाता है, जो सुबह को एक अंजान लिपि में लिखा हर्फ लगता है। चार दाने....

चार सौ पच्चीस नंबर बस के पायेदान पर
कदम रखते ही, सोचा उसने
शायद आज उसे ना आना हो
या शायद वह चढ़ गया हो इस बार भी
नेहरू प्लेस की जगह
दरियागंज जाती बस में

तलब एक मुजस्समा है
जो देख सके दुनिया
कि सिर्फ आँख कह देती है
तुम्हें जाना है जमुना पार
या गुजार देना है वक्त
सही बस तलाशते हुए
और संझा को कह देना है
मैं  अजनबी हूँ तुम्हारे शहर में
एक बार मुझे बताओ
तुम तक पहुँचने के रास्ते
कहाँ कहाँ से गुजरते हैं

बताओ मुझे
सब रास्ते पार कर चुकने के बाद भी
क्या हम पीयेंगे कॉफी
एक ही मेज के दोनों ओर बैठ
बेशक, तुम पीना मद्रासी कॉफी
और मैं एस्प्रेस्सो

दरअसल शहर मुद्दा नहीं होता
बस तो कत्तई नहीं
कॉफी कोई मसाला ही नहीं
नेहरू प्लेस एक काल्पनिक जगह है
सवाल कोई और है
तुम्हें पता है वह सवाल क्या है



4.   

वक्त के होठों पर एक प्रेमगीत लिखा था। वक्त चाहता था, वह गीत आज की रात कोई किसी के लिए गाये। गाने वाले सुर तलाशने थे, सुनने वाले के कान। लड़के ने अपनी आँख में भरी प्यास को मृगतृष्णा बनाया है और रेत के बीचोंबीच अपना अपना पहला कदम रखते हुए कुछ यूं सोचा –

बहुत थोड़े से अंतराल में
शब्दों ने कहना सीख लिया
वह सब भी जो भाषा ने कभी नहीं सिखाया
व्याकरण में उलझे, शालीनता ढोते
उसके स्वर ने साथ दिया
उलझे उलझे सुलझते हुए
वह कह पाया, प्रेम

जानते हुए भी अपने अकेलेपन को
एक सुन्न, चुप, मुरझाये कमरे में
अपनी कमीज उतार
उसने अपने फेफड़ों में भरी खूब सारी हवा
मकड़ी के जालों को ताकते हुए
अलगनी पर टंगे, कपड़ों को
मुलायम उँगलियों से सहलाते
फिर कह पाया वह प्रेम

चार अलग अलग दिशाएँ
सोते से जाग, सिहर उठीं, कि
लोग रोते सिसकते थे और
फुसफुसाते थे प्रेम
उद्दाम वेग, कामना और प्यास से भरे
कुछ देर से नहीं कहा था किसी ने
फिर फिर फिर कहता रहा वह प्रेम


5.   

शहर के सूनेपन ,और
तुम्हारी चुप्पी
दोनों के साथ,
एक साथ निबाह और
संभव नहीं था .
इसीलिए रुई के सट्टे में
दिवालिया हुए सेठों की तरह,
मैंने रातोंरात घर छोड़ दिया
चंद तस्वीरें बुतां, कुछ हसीनो के खतूत,की
तर्ज़ पर निकलते हुए
मैंने अपने साथ रखी
एक पीले कागजों वाली कापी
जिसमे अनगिनत ख़त थे,
जो मैंने तुम्हे लिखे,और
कभी भेजे नहीं,
स्कूल की एक पोस्टकार्ड,
साइज़ फोटो जिसमें,
तुम दूसरी लाइन में ,
बाएं से चौथे नम्बर पर खड़ी हो ,और
मैं तीसरी लाइन में दायें से पांचवें ,और
उस शहर का आसमान ,
जिसमें सितारे बहुत थे, पर
चाँद एक ही .
2 .
समय बहुत
निकल गया है ,पर
आज भी जहाँ कहीं मैं जाता हूँ ,
हर पता
उसी पीली कापी में
लिखता हूँ ,
हर रात तुम्हारे शहर के
उसी आसमान की
चादर ओढ़ कर सोता हूँ,और
उसी तस्वीर को
धुंधलाती आँखों से
देखता हूँ ,
जिसमें सितारे बहुत हैं,पर
चाँद एक ही .





दीपक अरोड़ा 
 "मैं कविता क्यों लिखता हूँ ?
======================== 
गोया मैं पानी क्यों पीता हूँ ?रोटी क्यों खाता हूँ ?नींद क्यों लेता हूँ ...............इसी तर्ज़ का सवाल है . मैं कविता लिखता हूँ ,कि मेरी दैहिक /जैविक आवश्यकताओं की तरह ,और उतनी ही सच्ची मानसिक और भावात्मक इच्छा अपनी अभिव्यक्ति की भी है . मैं जब कविता लिख रहा होता हूँ .....तब मैं कुछ कह रहा होता हूँ .........जिसे मैं सोचता हूँ कुछ लोग समझेंगे . दीगर अपने भीतर ही भीतर मैं कह रहा होता हूँ ,"बक रहा हूँ जुनूँ में क्या क्या मैं .....खुद करे कुछ ना समझे कोई ."


किताबें युं तो बोल नहीं सकती लेकिन शब्द के साथ वो भी बोल पड़ती हैं । यह आदत भी ठीक नहीं थी कि किसी पेज का पता याद रखना होता तो कभी बीच से तो कभी हाशिए पर मोड दिया करता था। शायद बहुत से पाठक ऐसा ही करते हों। याद है कि बीती बार कुछ ऐसा करके दिनों भूल गया । किताब अभी और पढी जानी है…एक कहानी उसी मोड पर खडी रही जहां छोड आया था। समझ नहीं पा रहा शायद लेकिन अपनी भी एक अधूरी कहानी छोड आया था। आज जब लौट रहा हूं  तो अजनबी सा महसूस हो रहा है। कहानी तो इंतजार में थी… अब उसे फिर से एकात्म कर आगे पढना है। उस पेज को अनफोल्ड किया…ताज्जुब होता है अक्षरों पर कितने सब्र से बैठे रहे ! वहीं मिले जहां उन्हें होना था। पेज से किताब का एक खूबसुरत रिश्ता होता है। जनम-जनम के साथ की तरह। आप यह भी देखें कि पेज से लफ्जों व वाक्यों का भी एक नाता तो है। दो सामानांतर को एक दूसरे के लिए इस तरह जीते कम देखा था। चूंकि अब फिर से पढने लगा एक तीसरी चीज भी साथ हो गयी थी। जिस तरह का नाता हमारा कायम हुआ वो आदमियों सा था। दोस्त का दोस्त से सरीखा रिश्ता। एक प्यारा सा खुशनुमा रिश्ता। रिश्ता कोई भी हो वो इम्तिहान जरुर लिया करता है।
कोई रिश्ता बनाकर मुतमईन होना नहीं अच्छा
मुहब्बत आखिरी दम तक आजमाती है।
किताबों के साथ बढिया फील होता है। किसी की होकर खुद को सुपुर्द कर दिया करती है। किताब के तलबगार थोडे इंसान ही हैं…उसे उसके जैसा प्यार लौटा देते है। नहीं हो सके तो गम नहीं मगर कोशिश की तारीफ करनी चाहिए । एक तरह से प्यारा सा बंधन कह सकते हैं। इन्हें करीब से देखकर हैरान हूं कि कोई साथी क्या इस क़द्र भी साथ निभा सकता है ? बेपरवाह ही हूं कि कभी कभी  कुछ किताबें  इधर उधर अथवा खो जाया करती हैं।  क्या कोई उसे यहां से मांग ले गया था? हो सकता है। कहना होगा कि बेहद उपयोगी किताब थी…अफसोस संभाल कर रख ना सका! अब तो सिर्फ उसका वो वरक ही बाक़ी रहा जो शायद कट कर निकल गया था। किताब की झलक गर किसी को देखनी हो तो वरक को देख लेना वाजिब था । पाठ से जुदा होकर उसे ठीक नहीं लगा था… युं ही कमरे में मारा फिरता है। इतना ज़्यादा अकेला नहीं रह सकता...वो खो जाएगा इसका डर था । आओ एक ख्वाब सजाएं…किसी के साथ जीने की राह तलाशो …अब वो तन्हा मुसाफिर नहीं, सिर्फ भीड में अकेला रह रहा। दूसरी किताब के पन्नों बीच जी रहा । किसी खूबसुरत किताब का कोई एक पन्ना खो जाए तो खालीपन बनने लगता है। पुरानी से पुरानी किताब को संभालकर रखना किसी जिंदा दास्तान को संभाल रखने बराबर होता है। तकनीक ने कंटेंट से उस तरह का रिश्ता थोडा बदल दिया…लेकिन उसके संरक्षण की आदत खत्म नहीं की। यही वजह रही कि रेडियो पर सुनाई गयी कहानियों को पुस्तक का रूप दिया गया । टीवी धारावाहिकों ने किताब की शक्ल अख्तियार की ।
यह सोच लिया कि किसी को आवाज़ नहीं देनी मोहसिन
कि अब मैं भी तो देखूं कोई कितना तलबगार मेरा ?
कुछ अजीब सी हैं यह किताबें भी…प्यार सिखाना तो समझा जा सकता लेकिन नफरत भी?  जोडना भला होता है, फिर उसी को तोडने की बातें? एक जोड रही तो दूसरी मोड रही। कोई किसी को महान बताती तो कोई और को । ठहरा तो यह ख्याल आया कि अरे किताब नहीं उसे लिखने वाला,प्रसार करने वाला, पढने वाला ज्यादा जिम्मेदार होता है। किताबें तलबगार को वही रोशनी या राह दे रहीं जिस कामना से वो उसका चुनाव करता है। कबीर की साखियां ग़ालिब की गजलें और मीर के दीवान तो यहीं पढे थे। वाल्मिकी –तुलसीदास की रचनाएं कोई भूला सकेगा भला? याद आ रहा कि रसखान कृष्ण भक्ति के दीवाने थे। सुना था फराज़ को ग़ालिब व कैफी से दिली मुहब्बत थी…पढा भी यही। हिन्द जब तकसीम हुआ पाकिस्तान बन गया… दोस्तों कुछ पुरानी किताबों में रेखाएं एक हैं। अपना वतन अपना घर...सियासत ने सगे भाईयों को जुदा कर दिया।
आता है याद मुझको गुजरा हुआ ज़माना…वो बाग़ की बहारें वो शब का चहचहाना
आज़ादियां कहां  वो अब अपने घोंसले की ?…अपनी खुशी से आना,अपनी खुशी से जाना।
कहानियां-कविताओं के साथ जीना बेशुमार जिंदगियों के साथ जीना है। किताब का तलबगार तय करे कि किताब से कौन सी निस्बत है। क्या उसकी रूचि कहती है? तलाश करें नग़मा मिलेगा, किस्सा-कहानी अदब और अदीबों की दुनिया यहीं सांस लेती है। एक कहानी हर पल बन रही…लिखी जा रही। एक अधूरी रह जाती है। क्या यह बदली भी जा सकती थी…दूसरा रुख ले सकती थी?  बहुत सी कहानियां को अनुभव कर… उसे उस तरह देख कर तब्दील करने का मन भी होगा  । साहित्य की जीत इसे कहना चाहिए ! मुक्कमल कहानियों की उम्मीद नहीं होती,मिल जाए तो स्वागत है। रचना की दुनिया फिर भी अधूरी रह जाए तो ठीक होता है…क्योंकि शायद अधूरापन…पाठक को थोडा प्यासा छोड देना ही रचनात्मकता का कारण है। कहानी का आदमी से एक वास्ता होता है…बहुत बार उसमें अपनी ही कहानी नजर आती है। उसके पात्रों में पाठक खुद का अक्स पा लेता है। युं तो हररोज ही एक कहानी घट रही, लेकिन लेखक की नज़र से ओझल चीजें सृजन से बाहर हो जाया करती है। एक मामूली सी दिखने वाली घटना को भी रचना में शामिल करने की क्षमता लेखक को सक्षम बनाती है। कहानियों से गुजरते हुए हम उन घटनाओं के समक्ष रहते हैं जो किसी ने देखी थी। देर से सही रचना के माध्यम से पाठक भी उसको देख पाता है। कह सकते हैं कि अनदेखी-अनजान दुनिया से रूबरू कराने में किताब सरीखा सृजनात्मक माध्यम कमाल हैं।
बडा करम है यह मुझपर, अभी यहां से ना जाओ…बहुत उदास है यह घर,अभी यहां से ना जाओ
यहां ना था कोई दिन-भर,अभी यहां से ना जाओ।
सभी तरह की किताबों से एक ही जगह मिलने के लिए पुस्तक मेला व पुस्तकालय की तामीर हुई थी। मेला में अपनी पसंद की किताब तलाश करना एक जिज्ञासु काम होता है। लेकिन आयोजक मेले में आने वालों को पुस्तकों से जुडी बहुत सी बातों से भी रूबरु कर देता है। अब का पुस्तक मेला एक सकारात्मक सांस्कृतिक मूवमेंट का रुप ले कर हमसे बेहद करीब हो चुका हैं।
दोस्तों तर्क़-ए-मुहब्बत की नसीहत है फुजुल
और ना मानो तो दिल-ए-ज़ार को समझा देखो….|

समाज-देश के हित में एक विमर्श हमेशा से जरूरी रहा है। जिस व्यक्ति ने पुस्तक नहीं पढी हो उसे भी धारा का साझेदार बनाने में पुस्तक मेला सफल होता  है। किसी सुपरिचित लेखक से संवाद करने का अवसर रोज नहीं हुआ करता। शहर-दर-शहर मेले का आयोजन से यह मुमकिन हो सका है। पुस्तक मेले को केवल पब्लिसिटी का पैरोकार नहीं मानना चाहिए क्योंकि यह उसे देखने का गलत नजरिया होगा । वो सृजन-संवाद-रचनात्मकता का सारथी है। पाठको को उनकी रुचियों तक पहुंचाने का एक दिलचस्प नेटवर्क।

सैयद एस तौहीद
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सैयद एस तौहीद। जामिया मिल्लिया से स्नातक। सिनेमा केंद्रित पब्लिक फोरम
की लोकप्रिय साईट से लेखन की शुरुआत। आजकल साहित्य एवं सिनेमा तथा
संस्कृति विशेषकर हिंदी फिल्मों पर लेखन। उनसे passion4pearl@gmail.com
पर संपर्क किया जा सकता है।

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जेएलएफ में नयी कहानी को लेकर उठे सवालों पर प्रसिद्ध पत्रकार और आलोचक अनंत विजय का ताजा तरीन  लेख बहुत प्रासंगिक है और इस बात को आगे अवश्य बढ़ाया जाना चाहिए अगर नयी कहानी को आगे बढ़ना है। अङ्ग्रेज़ी साहित्य की विद्यार्थी होने के नाते कह सकती हूँ कि हिन्दी साहित्य को अभी अपने संकीर्ण खोल से निकलने में लंबा वक्त लगेगा। लंबा समय लगेगा अपने फतवों और गिरहों के पार धड़कती ज़िंदगी को देखने में, उसके स्पंदन को सही तरह से महसूस कर पाने में और जिन्होने भी उसकी नब्ज़ पकड़ने की कोशिश की है , मंटो से लेकर इस्मत चुगताई तक, मैत्रेयी पुष्पा, मृदुला गर्ग से लेकर गीताश्री तक, उन्हें शुरुआत में इसी अश्लील के ठप्पे के साथ खारिज करने की कोशिश की गयी है । लेकिन प्रश्न यह उठता है कि अपने आस पास के परिवेश से आँखें मूँद कर क्या कोई रचनाकार अपने लेखकीय कर्तव्य से मुँह नहीं मोड लेगा। साहित्य कोई फैंटेसी नहीं। फैन्टेसी पर आधारित कोई रचना पाठकीय पहुँच बना भी ले उसकी कोई भावनात्मक अपील नहीं बन सकती। जब हमारे आस पास का परिवेश तेज़ी से बदल रहा। बहुत तेज़ी से बदल रही अच्छे- बुरे की परिभाषा, नैतिक –अनैतिक के खांचे। जब आज कोई नज़रिया अपनी उत्पत्ति के साथ ही उसकी काट ले कर आता है और पहले की तरह हम चीजों को अलग –अलग डिब्बों में नहीं बंद कर सकते ताकि अपनी सुविधानुसार इस्तेमाल कर सकें तो क्या नयी कहानी से दूर रह पाएगा यह बदलाव ! अगर रहता है या जानबूझ कर किया जाता है तो यह लेखनी से, लेखकीय कर्म से धोखा है । क्या आप देख नहीं पा रहे या देखकर भी अपने शुद्धतावाद के खयाली महल से आदर्शों की कहानियाँ बुनते रहना चाहते हैं कि अब तीसरी –चौथी कक्षा में पढ़ने वाले बच्चे जलते हुए सवाल लेकर आते हैं औए कई बार जिसका कोई उत्तर तक देते नहीं बनता। अभी तो सवाल यह होने चाहिए कि हमारे दायरे, हमारी सोच से बाहर हो रही इस नयी पीढ़ी की जिज्ञासाओं और संभावनाओं को कैसे साहित्य द्वारा बेहतर से बेहतर समाधान देने की कोशिश की जाये लेकिन हम तो अपने दुराग्रहों से ही नहीं उबर पाये अब तक। चाहते हैं ताले ही जड़ें रहें हर नयी सोच पर। कब बड़े होंगे हम! दिल करता है इन्हे कहा जाये, ग्रो अप....नो वन इज़ किड हियर....
अगर रोज महसूस की जाने वाली जिंदा भावनाएं कहानी में दिखाना अश्लीलता है और नयी पीढ़ी की कहानी अश्लील है तो मेरे विचार से इस पूरी नयी पीढ़ी को ही अश्लील मान लिया जाना चाहिए क्योंकि इस पीढ़ी ने अपनी सहज मानवीय भावनाओं को छुपाने के लिए किसी आवरण का सहारा नहीं लिया। इस पीढ़ी ने जीना सीख लिया है या कम से कम जीने के रास्ते बनाना सीख गयी है। इस पीढ़ी को अपनी भावनाओं, अपनी कामनाओं पर शर्म नहीं आती बल्कि वह उसे सहजता से एक्सेप्ट करती है।
एक और बात इसी परिपेक्ष्य में कि इन मॉरल पौलिसिंग के ठेकेदारों को खतरा किस बात से ज्यादा है। कहानी में बढ़ती अश्लीलता से या कि स्त्रियों के खुलकर खुद को अभिव्यक्त कर पाने से जो बिना किसी फतवे के डर के, बिना किसी गढ़ों और मठाधीशों से डरे गढ़ रही हैं नए सपने, खोल रहीं हैं हर बंद रास्ता।

हाँ, इस लेख ने जो सबसे जरूरी मुद्दा उठाया वह यह कि कहानियाँ किसी कारखाने में पैदा नहीं की जा सकती। अगर वह वर्जित क्षेत्रों में बेधड़क प्रवेश करने का माद्दा रखती हैं तो साथ ही उन्हें अपनी बुनावट, अपनी कारीगरी पर भी अपेक्षित श्रम करना पड़ेगा। अंतत: वही कहानी पाठकों के जेहन में रह जाएगी जो उनकी संवेदना से जुड़ेगी। उनकी आत्मा तक पहुंचेगी।

अनंत विजय जी का लेख यहाँ पढ़ें : 

कहानी पर अश्लीलता के आरोप





Goodreads: 

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एक ऐसे वक्त में जब भारत में बचपन को लेकर कई आंदोंलन चल रहे हैं। ये सच है कि छुटपन के दिन को प्रकाशित करना बेहद मुश्किल काम था। प्रकाशकों के निराशाजनक रवैये के बाद लेखक ने इसे स्वंय प्रकाशित किया तो नतीजा उम्मीद से बेहतर साबित हुआ। जिस बाज़ार के ना होने की बात प्रकाशक कर रहे थे उसी बाज़ार में किताब बेस्ट सेलर बनी।
पांच छोटी कहानियां जो अलग अलग रेशों की तरह बुनी गई हैं और उनसे मिलकर छुटपन के दिन का रचना संसार बना है।
ये कहानी श्रृंख्ला की पहली कड़ी है। या यूं कहें कि पहला पार्ट है। इसके बाद जो किरदार हमने देखे सुने हैं वो कैसे आगे बढ़ते हैं। ये देखना दिलचस्प होगा।
हर कहानी को बच्चों के बीच किये स्टोरी सैशन के जरिये आज़माया जा चुका है।
हाथ की सफाई, मस्ताना, पेट-पेजा, मिट्टी का शेर, और टिल्लू की साइकिल ये कहानियां किसी फंतासी की उपज नहीं है। हमारे अपने ही जीवन से ली गई हैं। जहां हाथ ना धोने की वजह से बच्चे बिमार पड़ते हैं और कई बार डायरिया जैसी बिमारियों के चलते जान गंवा देते हैं। ये एक ऐसी समस्या है जो वैश्विक स्तर पर हावी है। वहां हाथ की सफाई का उप्पू स्वामी कैसे हाथ धोने के बारे में सीखता है कहानी का पेंच ये है!
ठीक इसी तरह टिल्लू की साइकिल एक बच्चे के साइकिल ना खरीदन पाने की विडंबना के बाद, सही खान पान का नतीजा बताती है।
मस्ताना जंगल और इंसानी के बीच बढ़ते खतरों को बेहद हल्के से रेखांकित करती है।
पेट पूजा  आजकल के दुनियावी छलावों के बीच बच्चों के करप्ट होने और फिर सही रास्ते पर लौट आने की बात कहती है।
मिट्टी का शेर पीका-डिज़आर्डर के बारे में रोचक तरह से संकेत करती है।
ये कहानियां उनके लिये भी है जो खालिस कहानी पढ़ना चाहते हैं और बचपन को याद करना चाहते हैं। ये कहानियां उनके लिये भी हैं जो खासतौर से घरों मे दादी-नानी के अभावों से जूझ रहे हैं और बच्चों के कहानी सुनाने में विश्वास नहीं रखते हैं।

लेकिन सबसे खास ये कहानियां उन बच्चों के लिये है। जो विज्ञापनों की दुनिया में भी कहीं पीछे छूट गये हैं। जो स्कूली तंत्र के बीच में सीख या समझ नहीं पा रहे और कक्षा में हाथ खड़ा करने से घबरा रहे हैं क्योंकि जो भाषा वो जानते हैं वो टीचरों को समझ नहीं आती और जो टीचर को आती है वो बच्चा नहीं समझ पा रहा है। ऐसे में छुटपन के दिन की भूमिका और जरुरत बेहद जरुरी हो जाती है।

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लेखक परिचय  


A Writer , A child , An Explorer
Everybody is here for a reason and Tushar is searching the meaningfulness in his life. Some answers he know, some he is searching. To cut short in brief let's come to the point. He is the Writer whose First book "The days of childhood" making headlines all over the media. It’s a bestselling now. The first feature film As a Casting Director-Asst.Writer-Asst.Director : ZED PLUS is released In November 2014.He is Making corporate films for clients all over the country and Helping children to read-write makes him educated. The next few projects are on the way such as a feature film where he is the Screenplay and dialouge writer and a TV Mini series where his extensive historic research helps to make an epic saga.
He used to be a TV journalist and that's why his thirst for creativity never dies. Besides this he is the proprietor of PIXELOSOME PRODUCTIONS ,where he creates Corporate Films/Documentary for clients and he is also associated with many welfare society as an ADVISOR and making their curriculum

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About The Book
You Me and Zindagi

Life, so complex yet so charismatic, it's all about what we make it...

You, Me n Zindagi is all about Life and Us, sometimes life is a satire, sometimes it's a mystery, and sometimes just a wishful thought, sometimes it is just love, sometimes betrayal, sometimes its doodling between options, sometimes the pros and cons of living, sometimes a tender love and sometimes a wise companionship, sometimes winning over the odds life has to go on....
            You, Me n Zindagi is all about the shades of lives around us and a life that we wish for... Come, let's celebrate the Joy of Life, The Joy of living, the joy of celebrating You, Me and our life.... Let's live!

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About the Authors



You me n Zindagi is collection of 12 beautiful stories contributed by Amrit Sinha,Apurv Jain,Barun Bajracharya,Elora Rath,Nainika Gautam,Nikhil Uprety,Prachi Priyanka,Rikky Bhartia,Swagnikaa Roy,Vin Singh, and compiled by Gaurav Kabeer & Arpita Ghosh Sarkar .

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