सौरभ पांडेय की कविताओं का स्वर व्यक्तिपरक है । कविताओं में निजी दुख, प्रेम और विरह का स्वर प्रभावी है लेकिन इनकी ताजगी आकर्षित करती है । अनगढ़ होते हुए भी यहाँ कविता अपनी पूरी संभावना के साथ मौजूद है । बिंबों की सादगी और सहजता पाठकों से संवाद कर पाने में सक्षम होती हैं। अपने आस पास के वातावरण के लिए एक सजग दृष्टि और संवेदना ही कवि का आधार होता है । इस युवा कवि के पास वह संवेदनशील, सजग दृष्टि है जो भविष्य के लिए आशान्वित करती है । आइए पढ़ते हैं सौरभ पांडेय की कविताएँ -

Edina Barna

Words alone can not make a poem if they are not accompanied by emotions that pierce the soul and ravage the spirit – leaving you weak in the knees and yet unsatisfied, desirous of more. A poet’s eye is like a camera which can capture emotions through words. Edina Barna has tried to master the art of the unspoken, her words are felt rather than merely read and when the poems are complemented by the photographs that have been taken by Edina herself, they weave a spell so potent that none can escape it’s mesmerizing aftereffects.
These poems are like the shimmer magic of the ocean and the caressing touch of dawn air. The makings of a poet of unparalleled excellence are evident in her lines,
The soul doesn't know the distance,
it is just a mind`s perception...
Which are reminiscent of Pablo’s “And one by one the nights between our separated cities are joined to the night that unites us.”  Love, pain and separation are the major themes which come alive through these poems and photographs of Edina Barna.  
संजय की कविताओं में आम आदमी का संघर्षपूर्ण जीवन और पूंजीवाद के शोर में उसकी गुम होती जा रही पहचान को सहेजने की बेचैनी है । ये प्रतिरोध की कविताएँ हैं जो हाशिए पर पड़े लोगों के अधिकारों को स्वर देती हैं लेकिन कहीं-कहीं हताश भी नज़र आती हैं । यह हताशा आज के समय का सबसे बड़ा सच है जब संसाधनों का विषम वितरण दिनोंदिन बढ़ता ही जा रहा है। अपने आस पास के परिवेश को देखने की दृष्टि देती संवेदनशीलता से बुनती ये कविताएँ कहीं--कहीं नौस्टेल्जिक हो उठती हैं लेकिन उसके बहाने ये कुछ बहुत महत्वपूर्ण मुद्दों की ओर भी सोचने को बाध्य करती है: "आज मेरे खून में जितना अन्न है उतना ही ज़हर है/मैं जहाँ रहता हूँ वह मेरी आजीविका का शहर है/मैं क्या उगाता हूँ क्या बनाता हूँ/वह जो खुर्पियाँ बनाता है और कपास उगाता है
जानना चाहता है।"


"इस शहर में न कोई मुझे न ही मेरे
बच्चों को पहचानता है
मेरी कविताओं में मुझे मत ढूढो
कवितायें मैं पुरानी दीवारों पर
मकड़ियों को जाले बनाते देखके लिखता हूँ |" कवि की इन पंक्तियों से  बरबस ही रसूल हमजातोव या आ जाते है ...."कि एक तीसरा आदमी भी है जो बिलकुल कविता नहीं करता । शायद यह तीसरा ही असली कवि है ।"

अपने आस पास के परिवेश को देखने के लिए एक नयी दृष्टि  देती ये जरूरी कविताएँ ख़ुद को पढे और गुने जाने की मांग करती हैं । पढिये एक युवा स्वर संजय कुमार शांडिल्य को ...


१.हिलती हुई पृथ्वी


कुछ थोड़े से लोग हमेशा टापुओं पर रहते हैं
तो मैं रोजोशब खुले समुद्र में रहता हूँ

मुझे हरबार लहरें दूर ,बहुत दूर
लाकर पटक देती हैं
इतनी दूर कि मेरे देश का नौ क्षेत्र
मुझे दिखाई नहीं देता


एक बड़े झंझावात में इस दुनिया की छत
उड़ रही होती है
और हिमालय और आल्पस जैसे पहाड़
भसकते हुए अपने मलबे के साथ
मेरी ओर लुढ़कते हैं


कुछ थोड़े से लोग तब पबों में जाम टकराते
हुए मेरी इस बेबसी पर हँसते हैं
मुझे इस मृत्यु की नींद में उनके ठहाके
सुनाई पड़ते हैं


मैं जब एक दूब की तरह सिर उठाता हूँ
अपने ऊपर के आसमान से मेरा सिर लगता है


कुछ थोड़े से लोग अंतरिक्ष से खेलते हैं
और मेरी पृथ्वी रोज़ हिलती है ।

2..हम मृत्यु को प्रेमिकाओं से अधिक जानते हैं




कोई मृत्यु के अगणित भयों के साथ
एक जीवन जी जाता है

अंत तो प्रारंभ से ही रहता है
मृत्यु बहती है साथ-साथ
ईश्वर की
चलती रहती हैं गोलियाँ

ईश्वर के दरख्त से
लटकती रहती हैं गर्दनें
ईश्वर के कुएँ में
टूट जाती है रीढ़ की हड्डी

ईश्वर कारें चलाकर
रौंदता है
और ट्रैक्टर के पहिए से
कुचल डालता है

ईश्वर फेंक आता है
हमारी लाशें गंडक की दियर में
हम मृत्यु से नहीं
इस पृथ्वी पर अनंत
काल से ईश्वर से डर रहे हैं

मृत्यु तो साथ चलती हुई
सब्जी खरीद आती है
मृत्यु साईकिल चला कर
घरों में दूध की बोतलें
डाल आती है

मृत्यु कर आती है विदेश यात्राएँ
अंतरिक्ष में जाकर पृथ्वी
पर लौट आती है मृत्यु
सिर पर झुलती है
बिजली के तारों में

हम मृत्यु को प्रेमिकाओं से
अधिक जानते हैं
हमें ईश्वर मारता है
हम उसका पता नहीं जानते
हमने उसकी शक्ल नहीं देखी है

वह सात पर्दो में रहता है
और गोलियाँ बरसाता है ।


3.गुलमोहर से लगातार फूल झड़ते हैं




लोग तो इस गुलमोहर का भी बुरा मानते हैं
बिखेर देता है हरियाली छोड़ने के क्षण में
सिकुड़ा हुआ लाल फूल
तुम हँसकर पूछती हो कि तुम्हारा हँसना बुरा तो नहीं है ।
जैसे इस अँधेरे में एक-एक कर
डूबने लगेंगे रात के सितारे


एक बड़े गोते में सूरज एक दूसरे आकाश में निकलेगा
और पृथ्वी पर सुबहें नहीं होंगी ।
हँसने से अच्छा कोई व्यायाम नहीं है यह सामान्य वाक्य कहकर मैं परे देखता हूँ
सचमुच तुम्हारी हँसी के बिना यह दुनिया कितनी बेडौल हो गई है
मुझे एक सामूहिक ठहाके में वह पार्क अकबकाया और बदहवास दिखाई पड़ता है
जिसे शाम को खिलखिलाते हुए बच्चे थिर करते हैं ।
फैसलों का परिणाम जिस पर पड़ता हो उसे
फैसले लेने का हक़ होना चाहिए
तुम लगातार हँसती हो और गुलमोहर से लगातार फूल झड़ते हैं ।


4.परिन्दे उड़ने की सही दिशा जानते हैं




उत्तर से दक्षिण की ओर उड़ रहे परिन्दे
उड़ने की सही दिशा जानते होंगे

हम-आप बिलखते-चिलकते रह जाते हैं
इस धूप में, इस असमय बारिश में
इस बेलगाम रफ़्तार में चित्र-लिखित

इस ध्वंस के बाद की सिसकती मायुसी में
धरती के इस या उस करवट में
समुद्र के फेनिल उद्वेलन में
हर विषाद में ,हर यातना में
इस लहराते हुए समय की चिरंतन चेतना के
संगुफन में
इस प्रलय के घनान्धकार में
जो अनांदोलित हैं हमी हैं

उत्तर से मृत्यु की एक लहर आती है
और दक्षिण जीवन की दिशा है


जिन्हें एक पक्ष चुनना है-सुविधा का श्वेत पक्ष
फिर किसी और पेड़ पर
मिट्टी और रेशों से
नया घोंसला बनाते हैं
उनकी नींद में सपने हरे रहते हैं


इस विलाप के समय की अनथक
अनिद्रा में
हमारा चुना हुआ उजाड़ है
हमें यहीं रहना है
सँवलाए हुए सपनों को
सुबह-शाम जल देते ।


5.मेरी कविताओं में मैं





मैं जहाँ पैदा हुआ वह मेरे पिता की आजीविका का शहर था
मेरे बच्चे मेरी आजीविका के शहर में पैदा हुए
गाँव में पैदा हुए मेरे दादाजी,वे वहां बिना आजीविका के
जबतक रहे जीवित रहे


मेरी परदादी तकली पर कपास बाँटती थी गाँव में
मेरे परदादा कपास उगाते थे गाँव में
मेरा गाँव आज तक मुझे मेरे परदादा के
नाम से जनता है


वह लोहार जो कभी खुर्पियाँ बनाता था
वह मेरे पुरखों का पड़ोसी है


आज वह काले घोड़े के नाल की अंगूठियाँ बनाता है
मैं अपने समय के शनि और मंगल से
डरा हुआ उसके पास बैठता हूँ


न वह गाँव मुझमें रहता है
और न मैं उस गाँव में रहता हूँ
आज मेरे खून में जितना अन्न है उतना ही ज़हर है
मैं जहाँ रहता हूँ वह मेरी आजीविका का शहर है
मैं क्या उगाता हूँ क्या बनाता हूँ
वह जो खुर्पियाँ बनाता है और कपास उगाता है
जानना चाहता है


मेरे आस-पास कोई कुछ नहीं बताता
कि वह जो पैसे कमाता है,क्या बनाता है
कपास जैसा हल्का ,खुर्पियों जैसा ठोस
इस शहर में किसकी आजीविका क्या है
कोई नहीं जानता है


इस शहर में न कोई मुझे न ही मेरे
बच्चों को पहचानता है
मेरी कविताओं में मुझे मत ढूंढो 
कविताएँ मैं पुरानी दीवारों पर
मकड़ियों को जाले बनाते देखके लिखता हूँ |

लेखक परिचय

      
                      
संजय कुमार शांडिल्य          
सहायक अध्यापक
सैनिक स्कूल गोपालगंज 
पत्रालय-हथुआ
 जिला-गोपालगंज 
बिहार  
                     
 Mob-9431453709


  *सभी चित्र वरिष्ठ कवि और चित्रकार विजेंद्र जी के हैं। 



                          










तनु वेड्स मनु रिटर्न न सिर्फ बॉक्स ऑफिस पर धमाल मचा रही है बल्कि इसने लोगो के दिलों को भी छुआ है। कुछ लोग जहाँ इस फिल्म को छद्म नारीवाद या भ्रम में उलझा नारीवाद बता रहे है तो कुछ का कहना है की यह फिल्म भारतीय समाज की तरह ही एक डरपोक अंत की तरफ जाती है । सोशल मीडिया पर जितना इस फिल्म के बारे मे लिखा जा रहा है शायद ही किसी और फिल्म के बारे मे लिखा गया हो ।
आइए इस फिल्म के बारे में फेसबुक पर लिखे गए कुछ विचार पढ़ते है :-



बापिष्ट संस्कारों की पुनर्स्थापना के लिये तनु को पहले वैम्प और बाद में टिपिकल देसी पत्नी बना देना जरूरी था और दत्तो को पहले बिंदास और बाद में टिपिकल बलिदानी प्रेमिका बनाना भी जरूरी था। फ़िल्म को हिट कराने के लिए भी जरूरी था। लेकिन कंगना का अभिनय दिलकश है।
----आशुतोष कुमार



प्रेम में ही तो सब जायज़ है क्योंकि जंग कहां होती है अब। फिल्म तनु वेड्स मनु की वापसी वाली फिल्म की अगर बॉक्स ऑफिस से वफ़ादारी जारी है तो इसकी सबसे बड़ी वजह वो क्रियेटिव रिसपेक्ट है जो इसके लेखक हिमांशु शर्मा और  हिदायतकार आनंद एल राय के बीच फिल्म दर फिल्म स्पष्ट तौर पर समझ आयी है। आप इस फिल्म में हंसते हैं, डायलॉग्स पर तालियां बजाते हैं,सीटियां मारते हैं और जो दर्शक ये नहीं कर पाते वो भी आपकी इस तरह की प्रतिक्रिया पर नाराज़ होने की बजाय ख़ुश होते हैं। ये हौसलाअफज़ाई तनु वेड्स मनु रिटर्न्स की वो दौलत है जो इसे बेहतरीन फिल्म होने का खिताब बड़ी ईमानदारी से देती है, समीक्षक दिल खोलकर सितारों से नवाज़ते हैं तो कहीं कोई अतिश्योंक्ति नहीं लगती । इस कमाल की फिल्म को बार बार देखने का दिल करता है, और कंगना की अदाकारी सोने पे सुहागा। संगीत में भी ये अव्वल है, राजशेखर के शब्द और क्रिस्ना का संगीत पिछली फिल्म जैसा नहीं मगर फिल्म के साथ है। ये फिल्म दीपक डोबरियाल के किरदारी कमाल की गवाही उन्ही के अंदाज़ में देती है। पूरी फिल्म अपनी पहली किश्त जैसी बिलकुल भी नहीं है और यही इसकी सबसे बड़ी जीत है। मैं ऐसी ही फिल्में देखना चाहूंगा। ज़रूर देखिए।
-----प्रशांत पाण्डेय



बस एक बात कहें , आप लोग तनु वेड्स मनु रिटर्न्स कैसे पसंद कर सकते हैं !! अभी बस पंद्रह मिनट बीते होंगे और मुझे लगता नहीं कि मैं देख पाऊँगी आगे। गॉड !! क्या कहूँ तनु को वैम्पायर ..पति और पिता का खून पीने वाली एक बिगड़ैल लड़की जिसे अपने मुक्त होने का गन्दा भ्रम है .(फिल्म देखते समय)
सिनेमा हमेशा से चीज़ों को अतिरंजित कर दिखाता है और तनु एक अभिनेत्री है बस, उसे स्त्री मुक्ति के रोल मॉडेल के रूप में तो कतई नहीं देखा जा सकता , बल्कि वह तो अपने पति के पैसों पर पलने वाली एक सिरफ़िरी और बद दिमाग औरत है जिसे सही गलत की रत्ती भर समझ नहीं इसलिए ऐसी नायिकाओं को कोट कर स्त्री के अपना  स्पेस गढ़ने के लंबे संघर्ष को जिसमें उनकी आर्थिक और मानसिक आज़ादी भी निहित है , पागलपन करार देना और परिवार टूटने की वजह बताना, बहुत गलत है। हकीकत तो यह है कि हमारा बॉलीवूड अभी भी एक मुक्त स्त्री की छवि सही से गढ़ पाने में असमर्थ है। कोशिश करने पर यही घटिया , स्तरहीन किरदार ही निकलते हैं जिसे किसी भी सही माने में आधुनिक और मुक्तिकामी स्त्री से रिलेट नहीं किया जा सकता । (देखने के बाद )
------ रश्मि भारद्वाज




कुसुम ने दिल को छू लिया एकदम। दत्तो की भूमिका में जबरजस्त भूमिका निभाई। आत्मबल और हरियाणावी लहजे ने सहज कर दिया किरदार को।  कुसुम के भाई के किरदार में कलाकार ने भी उम्दा एक्टिंग किया । इस बार 'बन्नों तेरा स्वेगर लागे सेक्सी' के अलावा कोई भी गीत कर्णप्रिय नहीं लगे जबकि पिछली फिल्म के सभी गीत लाजवाब थे। मेरे फोन के रिंगटोन आज भी यही हैं 'कितने दफे दिल ने कहा, दिल की सुनी कितने दफे.. वैसे तो तेरी ना में भी मैंने ढूँढ ली अपनी खुशी.. तू जो गर हाँ कहे तो बात होगी और ही' , खैर ! आगे चलते हैं डायलाग पिछली बार से भी ज्यादा चुटीले हैं , पप्पी जी ने तो गर्दा मचा दिया है एतना कि मिजाज हरियरा गया है एकदम
फिल्म का फस्ट हाफ तेज है गतिशील है और सोचने के पहले ही नए सीन आ जाते हैं जबकि दूसरे हाफ में फिल्म धीमी है आगे क्या होने वाला है पता चल जाता है
अवस्थी जी का दो डायलाग-'साले ओरिजनल भी यही लेंगे डुप्लीकेट भी यही लेंगे' और 'ईंट से ईंट जोड़ने के लिए सीमेंट चाहे जेके हो या अंबुजा मुझे फर्क नहीं पड़ता है' लाजवाब है
अंत में माधवन पहली फिल्म से आज तक मेरे फेवरेट हैं , इस फिल्म में भी श्रेष्ठ भूमिका निभाई है |
----- सौरभ



तनु वेड्स मनु रिटर्न्स के बहाने

परसों यह फिल्म देखी ,फिल्म ठीक लगी पर मैं जो इस फिल्म के बहाने एक महत्वपूर्ण सवाल उठाना चाहती हूँ वह यह कि मेंटल हॉस्पिटल व पुनर्वास संस्थान के लिए प्रचलित नाम पागलखानाको क्या अब बदला नहीं जाना चाहिए? इस फिल्म में जब जब यह नाम आया तब तब दर्शक सहानुभूति दिखाने की जगह हँसते हुए नज़र आए। यह हमारी किस मानसिकता को उजागर करता है?
फिल्म में नायक व नायिका किसी भी गंभीर मानसिक रोग से ग्रस्त नहीं थे बल्कि वे अपने शादीशुदा जीवन की आपसी समस्या को सुलझाने के लिए लंदन के एक मनोचिकित्सालय व पुनर्वास केंद्र में सलाह लेने जाते हुए दिखाये हैं जो कि अपने आपस की समस्या को सुलझाने की दिशा में उनके द्वारा उठाया गया एक बहुत ही अच्छा कदम था परंतु वहाँ अत्यधिक गुस्सा आने पर नायक को चार लोगों द्वारा पकड़ कर ले जाना एक बहुत ही गलत संदेश देता है फिर बाहर आकर नायिका द्वारा व अन्य लोगों द्वारा बार बार पागलखानाशब्द का प्रयोग तो उस से भी अधिक गलत संदेश देता है। इस प्रकार तो जो लोग अपने आपस की समस्या को सुलझाने के लिए डॉक्टर के पास अस्पताल में जाना भी चाहेंगे वे अब बिलकुल भी नहीं जाएँगे क्योंकि एक तो वैसे ही इस नाम के साथ एक सोशल टैबू जुड़ा है दूसरा यह संदेश जाता है कि वहाँ जाने वाले को पकड़ कर अंदर ही कर दिया जाएगा जेल की तरह। 
इस नाम के चलते ही तो मानसिक बीमारियों से ग्रसित आधे से अधिक अधिक मरीज न तो मनोचिकित्सालय जाते हैं और न ही मनोचिकित्सक के पास फिर वे या तो मंदिरों/ तांत्रिकों की शरण में जाते हैं या फिर साधारण डॉक्टरों के पास जाते हैं।
( यदि आप में से कोई मेरी सी बात को भारत सरकार व फिल्म निर्माता/निर्देशक तक पहुंचाने में मदद कर सकते हैं तो मुझे रास्ता सुझाएँ )
--- सुनीता सनाढ्य पाण्डेय



तनु जितनी आधुनिक दिखती है उससे कहीं अधिक वह पुरातन सोच की है .वह पत्नी नहीं जोंक है जिसको एक बार पत्नी की पोस्ट हासिल हो जाए तो वह जीवन भर निठल्ले रहकर पति का सामाजिक मानसिक शोषण करती रह सकती है . उसके दुख उसके अभाव सब उसके खालीपन की उपज हैं . रस उसके जीवन में इसलिए नहीं क्योंकि वह एक कर्महीन प्राणी है . जिन पत्नी अधिकारों की बात वह करती है वह सब हास्यास्पद हैं क्योंकि उसको खुद किसी कर्तव्य का अहसास तक नहीं है . उसके आंसू दर्द नहीं जगाते क्योंकि उनका कारण धोर स्वार्थी नजरिया है . दुनिया में अनगिनत पत्नियां हैं वह भी एक है जिसके जीवन की कोई सामाजिक उपादेयता नहीं .
कुल मिलाकर यह कि तनु और उस जैसी अन्यों में ऐसा क्या है कि उन्हें ज़रा देर भी चाहा जा सके . ये पत्नी बनने के लिए पैदा हुई और पत्नी के गुमनाम ओहदे पर. पैरासाइट की तरह जीते रहने को खुदा की नेयमत मानने वाली फूहड़ प्रजाति है .
इसके ठीक विपरीत दत्तो जैसी आधुनिक , संधर्षशील , आत्मनिर्भर ,सुलझी हुई , स्वाभिमानी लड़की से मिलवाने के लिए फिल्म की पूरी टीम का आभार .
नीलिमा चौहान



कंगना इस दौर की सबसे समर्थ अभिनेत्री है...
तनु वेड्स मनु रिटर्न्स में एक सीन है. मनु को छोड़ के तनु कानपुर लौट आई है. शादी ठीक नहीं चल रही उसकी. अभी अभी पति का भेजा तलाक का नोटिस मिला है उसे. उसे देख कर वो इतनी अस्वस्थ हुई है कि आवारागर्दी करने निकल पड़ी है. पुराने सारे बॉयफ्रेंडस् से मिल रही है. रास्ते से एक बारात गुज़र रही है. तनु उसमे घुस के बेसुध होकर डांस कर रही है. तमाम अजनबियों के बीच ज़मीन पर लेट लेट कर नाच रही है. और फिर अचानक डांस रोक कर चल पड़ती है. उस एक लम्हे में उसके चेहरे के हावभावों में ड्रामेटिक चेंज आता है वो अद्भुत है. एक फ्रैक्शन ऑफ़ सेकण्ड में बेफिक्री के भाव गायब हो जाते हैं और तमाम परेशानियों का अक्स उसके चेहरे से झलकने लगता है. बेखयाली में अपने बालों में हाथ फेरती तनु यूँ चलती चली जाती है जैसे दुश्वारियों का सामना करने के लिए जरुरी ताकत उसने अपनी आवारागर्दी से इकट्ठी कर ली हो. अपने अंतर्मन की भावनाओं को महज़ फेशियल एक्सप्रेशन द्वारा इतनी खूबी से प्रकट करने के लिए बहुत मेहनत, बहुत अभ्यास चाहिए. कंगना इतनी सहजता से ये कर जाती है कि वो फ्रेम आपके ज़हन में हमेशा के लिए दर्ज़ हो जाता है.
मेरा यकीन मानिए कंगना इस दौर की सबसे समर्थ अभिनेत्री है.
"क्वीन" ने इस बात को साबित किया था, तनु रिटर्न्स ने इस पर अमिट मोहर लगा दी है.
मुबारक अली



जिस तरीके से तनु वेड्स मनु रिटर्न्स के बारे में सकारात्मक टिप्पणियों की बाढ़ है, उसकी वजह से रात के डेढ़ बजे जब कि इस सिनेमा को मैंने देखकर पूरा किया मुझे जरूरी लगता है कि इस सिनेमा पर मै अपनी टिप्पणी जरूर दूँ ।
तनु वेड्स मनु रिटर्न्स मुझे कहीं से भी औसत से बेहतर नहीं लगी, अपनें सापेक्षिक सपाट चेहरे के वावजूद स्वरा का अभिनय कंगना से मुझे बेहतर लगा । कंगना की संवाद अदायगी में सुधार की बेहद गुँजाईस है, जिमि शेरगिल के छोटे चरित्र को और उभारने की जरूरत लगी, जबकि पप्पी और वकील का चरित्र निभाने वाले व्यक्ति नें बेहतर अभिनय किया ।
स्वैगर-स्वैगर वाले गानें के लिए युवक और युवतियों में जो मै पागलपन देख रहा हूँ, गाने को सुनने देखने के बाद वाकई यह पागलपन ही लगा ।
फिल्म की कहानी आधी अधूरी लगी, शादी से दुल्हन गायब करनें के बाद दुल्हन का जिक्र एकाएक गायब हो जाता है । माधवन नें सहजता से अपने जिम्मेदारियों का निर्वहन किया है और वह परिपक्व लगे ।
फिल्म में कई जगह कैमरे के एंगल बचकानें लगे, जबकि कई शीन लाँग शाट की माँग करते लगे । बैकग्राउंड स्कोर कई जगहों पर बेवजह शोर करता लगा ।
कुल मिलाकर, यह फिल्म मुझे टुकड़ो में अच्छी लगी, पर एक सम्पूर्ण फिल्म के रूप में यह मुझे औसत से उपर कतई नहीं लगी ।
___________________
(पुनश्च : मेरी टिप्पणी पर मेरी पत्नी की प्रतिक्रिया है कि अब मै वाकई बूढ़ा हो चुका हूँ और मुझे नए जमाने की फिल्में देखना बंद कर देना चाहिए, शायद वह सही कहती है ।)
--- कश्यप किशोर मिश्र



मैरेज इंस्टीट्यूट के पक्ष में एक मज़बूत स्त्री-विरोधी फ़िल्म -बहुत ही रोचक ढंग से फिल्माया गया है लेकिन वैचारिक स्तर पर देखें तो कहना होगा कि अभी भी हिन्दी सिनेमा में वह साहस नहीं कि मन्नु शर्मा की शादी कुसुम सांगवान से हो जाने दे. नव-उपनिवेशवादी माहौल में इससे बड़ी सफलता क्या होगी कि स्त्री को ही स्त्री के विरोध में खड़ा कर दिया जाये। मन्नु शर्मा की शादी तनु से करा कर एक बहुत बड़े पाप को टाला जाता है. विवाह-संस्था की शक्ति की गूँज लगभग ॐ जैसी ध्वनि के साथ फ़िल्म के अंतिम दृश्यों में समाहित है। अब अगर इसे एंटि-थीसिस के फोरम भी लिया जाए तो भी यह पुरुष-सत्ता के पक्ष में जाता है... कुसुम सांगवान से यदि शादी कारवाई जाती है तब भी सुरक्षित संवादों के कारण यह खेल रोचक दिखता है।– कुसुम तन्नु से कहती है कि --मैं तुम्हारी जैसी औरत नहीं--- मैं रोटी भी संभाल सकती हूँ और बच्चे भी... जबकि कुसुम के फ़ॉर्म को और भी बेहतर किया जा सकता था..... फ़िल्मकार दयावान ज्यादा नजर आते हैं.....
---- मजदूर झा



पॉप वाप सी रैप वैप सी बजती रग रग मे कंगना,
  तनु के रूप मे  एक बिगड़ैल नायिका जो प्रगतिवादी कम और अपने भीतर की अस्थिरता से जूझती एक लड़की ज्यादा लगती है! माधवन , एक नायक(?) जो डब्बू और डरपोक तो था ही अब तनु शर्मा की ड्यूप्लिकेट खोज कर  स्मृतिजीवी भी सिद्ध हुआ | स्वरा, एक  बिहारी लड़की पायल का किरदार जीती  है  जो टेस्ट ट्यूब बेबी के रास्ता अख़्तियार करती है। उसका सरदार जस्सी जो तमाम मर्दानगी को किनारे लगा कर बेबी और अपनी झूठी वाइफ को स्वीकार भी कर लेता है! एक रामपुरी भोकाली लौंडा जिसके जैसे उत्तर भारत की हर एक गली मे कंधे देते मिल जाएंगे  और वो कुसुम सांगवान का हरियाणवी भाई कैसे भूल गए  , जो खाप के खिलाफ खड़ा है , जिसे छोटे घर मे रहना कुबूल है पर छोटी सोच के साथ रहना कुबूल नहीं ( ये अलग बात है की बिजली कटिया लगा कर लेता है )। व्हाट्सएप  के मैसेज को इश्क़ का फरमान समझने वाला पप्पी (दीपक डोबरियाल) भी तो है । राजा अवस्थी का दबंग अंदाज़ तो खैर जिम्मी शेरगिल जी ही गए है।
और हमारी कुमारी कुसुम सांगवान, जिला झझर , हरियाणा ने तो कमाल किया है, कंगना इस अदाकारी के लिए ताउम्र याद रखी जाएंगी।
लेकिन फिल्म मे अगर किसी ने कमाल किया है तो वो लेखक हिमांशु शर्मा है, एक एक संवाद तबीयत से लिखा गया है और आनंद राय तो निर्देशन की एक नयी परिभाषा गढ़ रहे हैं  |
फिल्म के संवाद इस फिल्म की जान है और हमेशा की दर्शकों की तालियाँ बटोरने में कामयाब रहें हैं । संगीत भी बहुत कर्णप्रिय  है ।
---- गौरव कबीर


प्रस्तुति और संकलन 
गौरव कबीर
गौरव कबीर, सांख्यिकी और डेमोग्राफी जैसे विषयों पर कार्य करते हैं  और हाल फिलहाल मे ही  लिखना भी शुरू किया है। आप की कविताएँ पत्रिकाओ में  छप चुकी है तथा आप एक अँग्रेजी कथा संग्रह “You, Me and Zindagi-2” का सह-सम्पादन भी कर चुके है। घूमना, फोटोग्राफी और कुकिंग का शौक है ।



वीरू सोनकर
प्रेम हमेशा से ही कविताओं का रॉ मटिरियल रहा है। प्रेमविरह और दर्द की कविताओं से पाठक ख़ुद को आसानी से आइडेंटिफाई कर पाते हैंकारण है इनकी सहजतामधुरता,जीवन से उठाए गए बिम्ब और जीवंतता। युवा कवि वीरू सोनकर की प्रेम कविताएँ भी एकदम से ध्यान आकृष्ट करती हैं और अपना प्रभाव छोड़ जाती हैं क्योंकि यहाँ शब्दों से बुनी हुई बौद्धिक कृत्रिमता नहीं बल्कि ज़िंदा भाव हैं जिन्हें उतनी ही संजीदगी और संवेदनशीलता से कविताओं में व्यक्त किया गया है । शेलीकीट्स जैसे कालजयी रोमांटिक्स जिन्होने बहुत कम उम्र में ही अँग्रेजी कविताओं के इतिहास में अपना नाम दर्ज़ करवा लिया और आज़ भी प्रेम और दर्द का नाम आते ही सबसे पहले हमारी स्मृतियों में उतर आते हैं क्योंकि उन्होने सिर्फ प्रेम लिखा नहीं था उसे जिया भी था और पूरी शिद्दत से उसे शब्दों में बुन भी दिया थाकुछ उसी भावालोक में विचरती यह कविताएँ अपनी प्रेयसी ‘शिला’ के इर्द गिर्द बुनी गयी हैं और इन्हें पढ़ते हुए बस एक ही बात ज़ेहन में आती हैं कि यह कविताएँ सिर्फ शब्द नहीं हैं...यहाँ स्पंदन हैलय हैदर्द हैप्रेम है और है जीवन । बक़ौल रूमी,
“In your light I learn how to love. In your beauty, how to make poems. You dance inside my chest where no-one sees you, but sometimes I do, and that sight becomes this art.” 
(तुम्हारी रोशनी में सीखा मैंने प्रेम करनातुम्हारे सौंदर्य ने सिखाया लिखना कविताएँ , तुम बसती हो मेरे हृदय में जहाँ तुम्हें नहीं देख पाता कोई भीकभी –कभी देख पाता हूँ मैं और तभी बनती है यह कविता)
वीरू भी कुछ ऐसा ही कहते हैं अपने प्रेम और उससे उपजी कविता के बारे में “सातवें तल में छुपे किसी चोरी के सामान की तरहतुम बने ही रहे मुझमेंऔर उगती रही एक सूफी आवाज सी तुम मेरे कानो में
प्रेयसी को संबोधित करती लिखी गयी यह कविताएँ  बनारस के घाटों से उठकर जर्मनी की दीवार के टूटने और कोलंबस के समुद्री अभियान का ज़िक्र करती अपने चरम पर पहुँचती है और अपने समय से संवाद करने की सफल कोशिश करती हैं। पढिए वीरू सोनकर की कुछ प्रेम कविताएँ


मेरे प्रेम


1- भोर के प्रथम पहर में,
जब शिव आरती से गलियां गूंजने लगती है
काशी विश्वनाथ की कतार बद्ध पंक्तियों के बीच,
कहीं हम मिलते है
और
तब हमारी आँखे कह उठती है
बनारस की सुबह से भी सुन्दर
"हमारा प्रेम है"
अचानक से,
मंदिर की सभी घंटियां बज कर
हमे आशीर्वाद देने लगती है
और हम जान जाते है
हमारे प्रेम को किसी कसम की जरुरत नहीं!

2

बनारस हिन्दू यूनिवर्सिटी के पार्क में
तुम्हारी पीएचडी की बुक पलटते हुए,
अक्सर, मैं हैरान हो जाता था
और तुम कह देती थी
बाबू
ये आपके लिए नहीं !
तब मैं जानता था,
तुम चाहती थी कि मैं तुम्हारी आँखों को पढूं
सिर्फ तुम्हारी आँखों को
मेरा प्रेम गवाह है !
मैंने तुम्हे पढ़ा
बखूबी पढ़ा
खूब खूब पढ़ा

3
शिला !
तुम्हारे नाम का उपनाम,
जब मैंने जाना तुम्हारा उपनाम तुम्हे कितना प्रिय है
तब हमने ये तय किया था
यही नाम हमारे बच्चे भी धारण करेंगे
यही नाम !
मेरे प्रेम
तब नहीं पता था
ये उपनाम तो बना रहेगा तुम्हारे साथ
पर मैं अकेला ही रह जाऊंगा
तुम्हारे बिना

4

दशाश्वमेध घाट की सीढ़ियों पर हम बैठते है
और याद करते है
हमसे पहले
हजारो हजार साल पहले से
लोग यहाँ आते है
और
हमको हमारा प्रेम
अनवरत जारी गंगा आरती से भी पुराना लगता है
हम खुद को किसी किवदंती सा समझते है
और चुप चाप गंगा को देखते है
हमारे पैर
एक लय में हिलते है
जैसे हम किसी स्कूल के अल्हड बच्चे हो,
हम एक साथ कोई फ़िल्मी गीत गाते है
हमारे पैर और तेज़ हिलते है !
हम वहां की सांसे खींच खींच कर अपने फेफड़ो में जमा करते है
और एक दूसरे को देखते है
तय करते है
जब तक ये गंगा है
ये गंगा आरती है
और हम है
तब तक ये प्रेम बना रहेगा

5

गोदौलिया के बाजार की भारी भीड़ में तुम दुकानदार से लड़ती हो,
पंद्रह रुपये की झुमकी को पांच रुपये की बता कर,
और मैं हँसता हूँ !
तब मैंने
तुम्हे बिना बताये कुछ बेहद महंगे स्वप्न ख़रीदे थे
तब, जब तुम बाजार में टुच्चा सा मोलभाव कर रही थी
उन महंगे स्वप्नों में तुम थी
अपने उपनाम के साथ
शिला !
उन स्वप्नों की कीमत आज तक अदा की जा रही है
और शायद तभी
आज तक
मेरे हाथ में नकद नहीं रुकता

6

कहते है कि
शिव अपने भक्तो की खबर "नंदी" से लेते है
और हमने नंदी को भी खूब पटियाया था
सर से लेकर पूँछ तक जल अर्पण करके हम अपना काम उनके कानो में बताते थे
याद करो !
हम युगलप्रेमी नंदी के कानो में एक दूसरे का प्यार बता रहे थे
और तुमने आगे बढ़ कर
कहा था
बाबा हमे सात फेरे लेने है !
और,
मेरा गला रुंध गया था !

7
शिला सुनो
मेरे प्रेम सुनो !
वह महंगे स्वप्न
वह गंगा घाट
वह पुरातन काल का समझा हुआ प्रेम
तुम्हारी पीएचडी की बुक्स
तुम्हारे कैम्पस में संग संग की गयी वह चहल कदमी
शिला,
वह सब कभी याद नहीं आता
याद आता है
तुम्हारा आगे बढ़ कर
नंदी के कानो में कहा गया वह वाक्य,
बाबा हम सात फेरे लेंगे !
बाबा हम सात फेरे लेंगे !
बाबा हम सात फेरे लेंगे !
आगे बढ़ कर पीछे लौटना,
हमेशा-हमेशा के लिए पीछे लौटना याद आता है
मुझे पक्का यकीन है
नंदी बहरे नहीं थे
कभी उनके पास जाना और देखना
वह आज भी हमारे और तुम्हारे इन्तजार में चुपचाप बैठे है
वही !
शिव के चरणों में,
हमारी अर्जी लिए हुए
नंदी को अभी तक खबर नहीं,
तुमने इन सब बातो को,
एक मजाक कहा था
सिर्फ एक मजाक
शिला मेरे प्रेम सुनो,
लोग कहते है अब नंदी अर्जियां नहीं लेते
तो तुम जब भी उनके पास जाना
तो कानो में कह देना
"बाबा वह सब मजाक था !"
सिर्फ मजाक
मुझे यकीन है
हठी नंदी समझ जायेंगे


मेरे प्रेम (द्वितीय भाग)


दो मुठ्ठी चने की तरह
हथेलियों में
भरना चाहता हूँ तुम्हे
मेरे प्रेम,
जैसे एक थका हुआ यात्री
चाहता है
दो गज छाँव,
और एक टूटता हुआ आदमी मांगता है
अपने हिस्से का अपनापन,
मैं ये दो मुठ्ठी प्रेम मांगता हूँ
तुम्हारे संग जो पल
गुजर चुके है
उन्ही में से,
बस ये दो पल अपनी मुठ्ठी में भींचना चाहता हूँ
मेरे प्रेम
मेरी मुठ्ठी कभी नहीं खुलेगी
ये दो पल
हमेशा मेरे हांथो में बने रहेंगे,
किसी बर्बाद व्यापारी की आखिरी पूंजी की तरह
जब प्रेम-प्यास लगेगी न,
तब मैं
अपने हाथो की दोनों मुठ्ठियों को
बारी-बारी सूंघ लूँगा,
तब मेरी प्यास भर पानी
मेरी आँखे दे देंगी,
मेरे प्रेम,
तुम्हे तो पता है न
तुमने ही तो कहा था
मेरी आँखे,
किसी सागर जैसी गहरी है
और सागर
कभी नहीं सूखते,
सागर सिर्फ प्यास बुझाते है !
मेरे प्रेम,
मेरी मुठ्ठियों में
वह दो पल
मेरी अंतिम साँस की तरह बने रहेंगे,
मेरे प्रेम,
इस बार मैं तुम्हे जाने नहीं दूंगा



मेरे प्रेम ( तृतीय भाग )


जैसे एक आवाज किसी पहाड़ी से
टकरा कर,
कई बार वापस लौटती है
जैसे एक समुंद्र
तुम्हारी हर चीज़ वापस कर देता है
और...
जैसे एक पेड़
अपनी जड़ कभी नहीं छोड़ता,
मैं सबसे ऊँची पहाड़ी चोटी से
तुम्हारा नाम पूरी ताकत से चिल्लाना चाहता हूँ
चाहता हूँ
तुम्हारा नाम लिखी ख़ाली बोतल बार-बार समुंद्र में फेंकना,
और चाहता हूँ
एक बीज को तुम्हारे नाम से बोना,
मुझे पता है
पहाड़ी चोटी से प्रतिध्वनित आवाज के बदले
तुम वापस नहीं आओगी,
और
न ही वह बोतल
किसी समुद्री वरदान की तरह तुम्हे वापस लाएगी,
बीज भी पनप कर पेड़ ही बनेगा
वह पेड़
तुम कतई नहीं होगी,
ये सब तुम्हे पाने की कोशिश नहीं है !
मेरे प्रेम,
मैं हर संभावित जगह
हर कही
अपना पता छोड़ना चाहता हूँ
ताकि
तुम कभी भी
इनमे से किसी से मिलो
तो जान सको,
मैंने तुम्हे कितना ढूंढा !
पहाड़ी चोटी
तुम्हे मेरी पुकार सुनाएगी
पेड़ अपने हजारो बीजो से मेरी गवाही दिलाएगा,
और
तुम्हारा नाम लिखी खाली बोतल
किसी समुद्री बीच पर
चुपके से
तुम्हारे पैरो को चूम लेगी
मेरे आँसुओ से नमकीन हुई हवा
उसी समय,
एक हलके झोंके से तुम्हारा गाल छू लेगी
और शायद
ये वही पल होगा
मेरे प्रेम,
जब पलभर को ही सही,
पर
तुम्हे मेरी याद आएगी



एक दुनिया अभी बन रही है

एक चेहरा कौंधता है !
हर वक्त बार-बार
सोचता हूँ वह चेहरा सोचा जाये बार-बार
और
बिना बोले,
कह दी जाये वह बात,
जो बात अभी ख्यालो में किसी ख्वाब सी उग रही है
जो,
एक दुनिया अभी बन रही है
वह दुनिया तुमसे उम्र भर की सांसे उधार मांगती है
और
ये सुन कर तुम,
किसी आकाशगंगा सी हँस दोगी,
और बस मैं
एक अदना सा ग्रह बन जाऊँगा तुम्हारे किसी कोने में,
सुनो.....मैं तुममे खोना चाहता हूँ
चाहता हूँ न मैं कभी मरूँ न तुम कभी मरो,
हम इस ब्रह्माण्ड में प्रेम के सबसे बड़े सबूत बनेंगे,
लोग कहेंगे
देखो
दो लोगो ने प्रेम किया,
और वह आकाशगंगा बन गए
देखो-देखो
वह दूर एक प्रेमी टिमटिमा रहा है
वह तारा नहीं, एक ग्रह है
उसने फैसला किया था
उसकी 'ऑर्बिट' उसकी प्यारी आकाशगंगा से कभी-भी बाहर नहीं जायेगी



प्रेम में जीना

एक सफ़र को अपने,
कुछ कदम मांगता हूँ वक्त के
और चाहता हूँ दिन भर भटकी चिड़िया का बटोरा हुआ खाना,
पहाड़ से साँस भर ठंडी हवा,
और पगलाई बरसाती नदी का उतावलापन,
आखिरी में,
सफ़र की वक्त गुजारी को मैं लेता हूँ
प्रेम की कुछ कतरने,
और एक कभी न पूरी होने वाली उदास कविता !
अब चाहता हूँ
उम्र भर की भटकन,
और एक कभी न मिल पाने वाली नशीली मंजिल मांगता हूँ
चाहता तो ये भी हूँ
दूर किसी अजनबी टापुओं के देश में
किसी बूढ़े रिफ्यूजी को अपनी प्रेम कविताये सुनाऊँ
और
वह सब बताऊँ
जो 'उससे' कभी न कह सका,
भाषा, रंग और बोली से परे वह बूढ़ा भी कभी प्रेम में होगा
हमारी भटकने साझा होंगी,
हम दोनों की आँखे एक जैसी तेजी से चमक उठेंगी
और शायद वह बूढ़ा कह ही उठे
नवजवान !
प्रेम में जीना इसे ही कहते है...
और ये सुन कर शायद
एक बार फिर जर्मनी की दीवार टूट जाये
सभी ध्रुवीय महाद्वीप एक बार फिर से मिल जाये,
और
हम दोनों बूढ़े और जवान,
एक साथ ये ऐलान कर सके
दुनिया भर के नाकाम प्रेमियों,
सुनो
प्यार पाने का नाम नहीं !
देखो देखो,
हमने सिर्फ प्यार किया,
हमे कोई फर्क नहीं पड़ा कि हमसे किसी ने प्यार नहीं किया,
और तब यक़ीनन,
वह उदास शाम अचानक से एक गुलाबी रंगत ओढ़ लेगी !
और ये
वह समय होगा,
जहाँ से उस बूढ़े की प्रेम कविताओ का वाचन प्रारम्भ होगा
एकल श्रोता,
एकल वाचक के काव्यपाठ में मग्न है !



सातवाँ तल
सातवें तल में छुपे किसी चोरी के सामान की तरह,
तुम बने ही रहे मुझमे
और उगती रही 
एक सूफी आवाज सी तुम
मेरे कानो में,
मेरे पैरो में नास्त्रेदमस की अफवाह बंधी रही !
और मैं डरता रहा 
तुम्हारे न मिलने के डर से,
मेरे प्रेम,
कोलंबस की समुद्री यात्रा से सौ गुना ज्यादा भारी रहा 
उस सातवे तल तक का सफ़र
चाहा था पृथ्वी के गुरुत्व से लड़ कर दूर आकाश में भाग जाना,
मुझे साँस मिलती थी उस सातवे तल पर
मैं किसी स्तनधारी सा
बार-बार लौटता रहा अपनी साँस के लिए,
उसी सातवे तल पर !



 लेखक परिचय
नाम: वीरू सोनकर

जन्म स्थान: कानपुर

संपर्क: veeru_sonker@yahoo.com

फ़ेसबुक के सौ कवियों के साझा संकलन - "शतदल" में रचनाएँ प्रकाशित।